सोशल मीडिया पर एक लेटर की कॉपी शेयर की जा रही है। पोस्ट में लिखा है कि केरल के एक मेडिकल कॉलेज में अब हर कार्यक्रम से पहले कुरान पढ़ना अनिवार्य है। पोस्ट को शेयर करके दावा किया जा रहा है यह फैसला हाल ही में केरल के एक मेडिकल कॉलेज के प्रशासन द्वारा लिया गया है।
अमर उजाला ने अपनी पड़ताल में इस दावे को गलत पाया है। यह आदेश छह साल पुराना है। हमने पाया कि केरल के कोल्लम के अजीजिया मेडिकल कॉलेज अस्पताल ने 2019 में एक आदेश जारी कर कहा था कॉलेज में किसी भी कार्यक्रम से पहले कुरान पढ़ना अनिवार्य होगा। हालांकि बाद में प्रशासन को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, जिसकी वजह से प्रशासन को अपना आदेश वापस लेना पड़ा।
क्या है दावा
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर कर दावा किया जा रहा है कि केरल के मेडिकल कॉलेज ने अब हर कार्यक्रम से पहले कुरान पढ़ने का आदेश दिया है।
सुनील (@suniljha899) नाम के एक्स यूजर ने लिखा सेक्युलरिज्म का उपहार केरल के एक मेडिकल कॉलेज का आदेश …हर फंक्शन की शुरुआत कुरान के पाठ से होगी …अब इस देश मे धर्मनिरपेक्षता खतरे में नही है???? हे सुपर सरकार सुप्रीम कोर्ट!!! स्वत: संज्ञान लेने की औकात नहीं है या इसे संवैधानिक मानते हैं????” पोस्ट का लिंक आप यहां और आर्काइव लिंक यहां देख सकते हैं।
इसी तरह का एक अन्य दावे का लिंक आप यहां और यहां देख सकते हैं। इसका आर्काइव लिंक आप यहां और यहां देख सकते हैं।
पड़ताल
हमने पोस्ट को ध्यान से देखा तो नजर आया कि आदेश की जो कॉपी वायरल हो रही है उसमें 18 अप्रैल 2019 की तारीख लिखी हुई है। इससे यह साफ होता है कि यह आदेश की कॉपी पुरानी है जिसे हाल फिलहाल का आदेश बताकर शेयर किया जा रहा है।
आगे के पड़ताल के लिए हमने पोस्ट में इस्तेमाल कीवर्ड से सर्च किया। इस दौरान हमें टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट मिली। यह रिपोर्ट 1 मई 2019 को प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि केरल राज्य में एक निजी मेडिकल कॉलेज ने एक परिपत्र जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि सभी प्रमुख आयोजनों में केवल कुरान पढ़ी जानी चाहिए। हालांकि प्रबंधन ने एक दिन के भीतर ही निर्णय वापस ले लिया है।
इसके बाद हमें एजुकेशन मेडिकल डायलॉग की एक रिपोर्ट मिली। इसमें बताया गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित एक निजी मेडिकल कॉलेज में विवाद खड़ा हो गया। कॉलेज प्रशासन ने एक परिपत्र जारी कर कहा कि अब किसी भी कार्यक्रम में कुरान पढ़ना अनिवार्य होगा। इस बीच, बाद में मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने कड़ी आलोचना के बाद परिपत्र वापस ले लिया।
इससे साफ होता है कि आदेश का जो लेटर वायरल हो रहा है वह 2019 में जारी किया गया था। इसका मौजूदा समय से कोई संबंध नहीं है।
पड़ताल का नतीजा
हमारी पड़ताल में वायरल दावा भ्रामक पाया गया है। यह आदेश 2019 में अज़ीज़िया मेडिकल कॉलेज में लाया गया था, जिसे विरोध होने पर उसी समय वापस भी ले लिया गया था।








