Fact Check: भ्रामक है एक मालगाड़ी के तीन साल से अधिक की देरी से अपने गंतव्य पर पहुंचने का दावा, पढ़ें पड़ताल
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Fact Check: भ्रामक है एक मालगाड़ी के तीन साल से अधिक की देरी से अपने गंतव्य पर पहुंचने का दावा, पढ़ें पड़ताल

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सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम से उत्तर प्रदेश के बस्ती तक एक उर्वरक मालगाड़ी को अपने गंतव्य तक पहुंचने में तीन साल से ज्यादा का समय लगा।  

अमर उजाला ने अपनी पड़ताल में उस दावे को गलत पाया है। हमारी पड़ताल में सामने आया कि इस दावे में किसी तरह की कोई सच्चाई नहीं है। इसके साथ ही सरकार की नोडल एजेंसी पीआईबी ने भी इस दावे का खंडन किया है। 

  क्या है दावा 

  इस पोस्ट को शेयर करके दावा किया जा रहा है कि विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) से बस्ती (उत्तर प्रदेश) तक एक उर्वरक मालगाड़ी को अपने गंतव्य तक पहुंचने में तीन साल से अधिक का समय लगा।

  Knowledgedays नाम के एक इंस्टाग्राम अकाउंट ने इस पोस्ट को शेयर करके लिखा, “विशाखापत्तनम से बस्ती जाने वाली मालगाड़ी भारतीय रेलवे के इतिहास में सबसे अधिक विलंबित यात्रा का रिकॉर्ड रखती है। 2014 में अपनी निर्धारित 42 घंटे की यात्रा शुरू करने के बाद, यह लगभग चार साल की देरी से चली। उर्वरक ले जा रही इस ट्रेन का मार्ग तकनीकी समस्याओं के कारण बदल दिया गया था और कथित तौर पर 2018 में पहुंचने से पहले ही इसका पता नहीं चल पाया था, जिससे इसका माल खराब हो गया था।” पोस्ट का लिंक और आर्काइव लिंक आप यहां और यहां देख सकते हैं। 

 

  इस तरह के कई और दावों के लिंक आप यहां और यहां देख सकते हैं। इसके आर्काइव लिंक आप यहां और यहां देख सकते हैं। 

  पड़ताल 

  इस दावे की पड़ताल करने के लिए हमने इस पोस्ट को कीवर्ड के माध्यम से इंटरनेट पर सर्च किया। यहां हमें यहां हमें इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट मिली। इस रिपोर्ट में हमें पता चला कि पूरी ट्रेन नहीं, बल्कि केवल एक बोगी देरी से पहुंची थी। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के बस्ती निवासी रामचंद्र गुप्ता नामक एक व्यापारी ने 2014 में इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) के माध्यम से उर्वरक बुक किया था। आईपीएल ने विशाखापत्तनम से बस्ती तक 1,316 बैग डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) उर्वरक ले जाने के लिए एक वैगन बुक किया था। 1,400 किलोमीटर की इस यात्रा में लगभग 42 घंटे 13 मिनट लगते हैं, लेकिन इस वैगन को अपने गंतव्य तक पहुँचने में तीन साल से ज्यादा का समय लगा। 

पूर्वोत्तर रेलवे जोन के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी संजय यादव ने कहा, “कभी-कभी जब कोई वैगन या बोगी सिक (परिवहन के लिए अनुपयुक्त) हो जाती है, तो उसे यार्ड में भेज दिया जाता है और ऐसा लगता है कि इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है।”

  आगे सर्च करने पर हमें सरकार की नोडल एजेंसी पीआईबी ने इस बारे में एक्स पर पोस्ट करके इसे गलत बताया था। पीआईबी ने पोस्ट करके लिखा “कई समाचार रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है कि एक मालगाड़ी को अपने गंतव्य तक पहुंचने में तीन साल से ज़्यादा का समय लगा। यह दावा #भ्रामक है। भारतीय रेलवे में किसी भी मालगाड़ी को अपने गंतव्य तक पहुंचने में इतना समय नहीं लगा है। 

  पड़ताल का नतीजा 

  हमारी पड़ताल में यह साफ है कि पूरी ट्रेन का अपने गंतव्य तक तीन वर्ष की देरी से पहुंचने का दावा फर्जी है। 

 





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