My brother brought the common man revolution in the ad world. | ‘पीयूष पांडे के जाने से हम अनाथ महसूस कर रहे’: इला अरुण बोलीं- भाई ने देश का नाम रोशन किया; प्रह्लाद कक्कड़ ने भी सुनाए किस्से
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My brother brought the common man revolution in the ad world. | ‘पीयूष पांडे के जाने से हम अनाथ महसूस कर रहे’: इला अरुण बोलीं- भाई ने देश का नाम रोशन किया; प्रह्लाद कक्कड़ ने भी सुनाए किस्से

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4 मिनट पहलेलेखक: अमित कर्ण

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एड गुरु पद्मश्री पीयूष पांडे का 23 अक्टूबर को 70 साल की उम्र में निधन हो गया। राजस्थान से आने वाले पीयूष अपने कल्चर को लेकर बेहद सजग थे और उनकी एड कैंपेन में भी इसकी झलक देखने को मिलती थीं। पीयूष को हर कोई अपने तरीके से याद कर रहा है।

दिग्गज एड फिल्ममेकर प्रह्लाद कक्कड़ ने कहा पीयूष पांडे जैसी शख्सियत के बारे में बात करना मेरे लिए हमेशा गर्व की बात रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि पीयूष जी एड इंडस्ट्री में वह क्रांतिकारी बदलाव लाए, जिसके बाद आज भारत में 98% विज्ञापन क्षेत्रीय भाषाओं (Regional Languages) में दिखते हैं। वह सिर्फ एक क्रिएटिव नहीं थे, वह हिंदी और क्षेत्रवाद के सच्चे पैरोकार थे।

आगे उन्होंने उनसे जुड़ी कई बातें बताईं।

अंग्रेजी से हिंदी की ओर: पीयूष ने लाया बड़ा बदलाव

मैं आपको बताता हूं, पीयूष जिस बड़े बदलाव के जनक थे, वह था अंग्रेजी भाषा के प्रोफेशनल ऐड को बदलना। वो विज्ञापन उस वक्त देश की केवल 2% आबादी तक ही पहुंच पाते थे! पीयूष ने कमलेश पांडे संग मिलकर न केवल विज्ञापनों को हिंदी में बदला, बल्कि उसे और आगे ले जाते हुए क्षेत्रीय भाषाओं से जोड़ा। चूंकि पीयूष का अपना क्षेत्र राजस्थान था, इसलिए उनके विज्ञापनों में राजस्थानी रंग स्पष्ट दिखता था।

फेविकोल के जो आइकॉनिक ऐड थे—जिनमें लोग ट्रकों और बसों से चिपके रहते थे—उनमें शुद्ध राजस्थानी फ्लेवर और संगीत का प्रभाव साफ़ था। पीयूष वह व्यक्ति थे, जो एडवरटाइजिंग में यह बड़ा बदलाव लाए। आज भारत में 98% विज्ञापन क्षेत्रीय भाषाओं में हैं, जिनमें से अधिकांश हिंदी और बाकी अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में होते हैं।

क्लाइंट के सामने अड़े रहने का ‘जिगर’

पीयूष के व्यक्तित्व की एक और खास बात थी, क्लाइंट्स के सामने अपनी रचनात्मक विचारों के लिए अड़े रहने का उनका गजब का ‘जिगर’। वह क्लाइंट्स के साथ इस हद तक बहस करते थे कि एक बार तो उन्होंने यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि “सॉरी, मैं आपके लिए काम नहीं करूँगा।”

वह इसलिए कि उन्हें अपने ज्ञान पर इतना भरोसा था कि वह क्लाइंट्स को सीधे कहते थे: “आप अंग्रेजी बोलते हैं, आप शहर के हैं, आपको जमीनी हकीकत नहीं पता। अगर आप मुझे एक पेशेवर के तौर पर पैसा दे रहे हैं, तो मेरी सलाह मानिए।” मैं याद करता हूँ अरुण नंदा जैसे दिग्गजों को भी, जो क्लाइंट्स से कह देते थे कि अगर वे विशेषज्ञ की सलाह नहीं मानेंगे तो वह बिज़नेस छोड़ देंगे।

थर्ड क्लास डब्बे में मिली शिक्षा

पीयूष की रचनात्मकता का राज उनके सफर में छिपा था। जब वह राजस्थान के लिए रणजी ट्रॉफी खेलते थे, उस समय टीम थर्ड क्लास के डब्बे में सफर करती थी, क्योंकि तब रणजी में उतना पैसा नहीं था, जितना आज है। उनके लिए वही थर्ड क्लास डब्बा उनके देश के बारे में सबसे बड़ी शिक्षा था। उनके मुताबिक, “जो उन्होंने उस डब्बे में सीखा, वह न कॉलेज में सीखा, न स्कूल में।” वहाँ उन्होंने जीवन को पास से देखा. लोगों की आदतें, उनकी नजाकत, उनके विचार. उन्होंने वहाँ बोलना नहीं, बल्कि सुनना सीखा, और यही अवलोकन उनके विज्ञापनों का संदर्भ बिंदु बना।

प्रह्लाद कक्कड़ और पीयूष पांडे साथ में।

प्रह्लाद कक्कड़ और पीयूष पांडे साथ में।

30 सेकंड का विज़न और मूंछें

पीयूष अपने अंदाज के लिए भी खास थे। वह राजपूत थे, और उनकी घनी मूंछें उनके ‘राजपूत’ होने का प्रतीक थीं। रचनात्मकता की बात करें तो पीयूष जी पूरी तरह से ‘आउट एंड आउट एड मैन’ थे। वह फिल्म मेकर नहीं थे। उनका जीवन 30 सेकंड के फॉर्मेट को समर्पित था, जहाँ उन्हें अपनी पूरी कहानी प्रभाव के साथ कहनी होती थी।

हंसी की जुगलबंदी और विरासत

हम दोनों बहुत हँसते थे! वह इंडस्ट्री में शायद अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जो मेरी हँसी को मैच कर पाते थे, और हमारे बीच हँसी की ‘जुगलबंदी’ चलती थी। पीयूष का विज़न खुद तक सीमित नहीं था। उनका मानना था, “मैंने जो किया है, अब मुझे अपने नीचे और लोगों को तैयार करना है ताकि वे इस विरासत को आगे बढ़ा सकें।” इसीलिए, आज एडवरटाइज़िंग की दुनिया के 80% से ज़्यादा बड़े क्रिएटिव्स कहीं न कहीं पीयूष पांडे के मार्गदर्शन से होकर गुजरे हैं।

वह न केवल महान एड क्रिएटर थे, बल्कि महान क्रिएटिव लोगों को बनाने वाले भी थे। वह वाकई में एक जिंदादिल इंसान थे, जिन्होंने जीवन को पूरा निचोड़ कर जिया। उनके जैसा दिल खोलकर हंसने वाला, और बिना हिचकिचाए अपनी बात रखने वाला व्यक्ति मिलना मुश्किल है।

वहीं, अपने भाई पीयूष पांडे को याद करते हुए उनकी बहन सिंगर और एक्ट्रेस इला अरुण ने कहा…

पीयूष पांडे उन चंद ऐड मेकर्स में से थे, जिन्होंने सही मायनों में इंडिया का नाम रोशन किया, वह देश के ‘ऐड गुरु’ थे।क्रिकेटर जो ऐड गुरु बना: वह जयपुर में सात बहनों के भाई और पांडे खानदान के कुलदीपक थे। प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज के भी वह पास आउट रहे। वह एक बेहतरीन रणजी प्लेयर और क्रिकेट कैप्टन भी थे। यही वजह थी कि वह हमेशा अपने ऐड और बातचीत में कहते थे, “फ्रंट फुट से खेलो” और “टीम इज़ मोर इम्पोर्टेन्ट दैन दी कैप्टन।” उनका यही टीम-स्पिरिट उनके काम में भी नज़र आता था।

विज्ञापन की दुनिया में ‘कॉमन मैन’ की क्रांति: पीयूष पांडे के आने से पहले भारत में विज्ञापन का काम मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा में हुआ करता था। लेकिन पांडे जी ने भारतवर्ष की मानसिकता को समझा। उन्होंने माना कि जब चीजें गाँव-गाँव में बिकती हैं, तो उनके लोगों की सोच को समझना ज़रूरी है।

उन्होंने जोर देकर बताया कि उनके एड (जैसे ‘मेरा वाला ब्लू’ पेप्सी का ऐड या फेविकोल) में कोई फिल्मी स्टार नहीं होता था, बल्कि अधिकतर ‘कॉमन मैन’ होते थे, ताकि आम आदमी उनसे जुड़ाव महसूस करे। बाद में एक अकाउंट्स एग्जीक्यूटिव के तौर पर शुरुआत करने वाले व्यक्ति को ‘ऐड गुरु’ कहलाने का श्रेय उनके इसी जमीनी जुड़ाव को जाता है।

संस्कृति और जड़ों से गहरा लगाव: इला अरुण ने कहा कि पीयूष पांडे की कला में उनके माता-पिता और परिवार के सांस्कृतिक मूल्यों की छाप थी। चाहे एशियन पेंट्स का प्रसिद्ध विज्ञापन हो या उनकी कोई अन्य रचना, वह हमेशा संस्कृति से जुड़े रहने की बात करते थे। ‘हर घर कुछ कहता है’ लाइन का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पीयूष पांडे हमेशा मानते थे कि घर दीवारों से नहीं, बल्कि व्यक्तियों से बनते हैं।

मूंछें थी आन-बान-शान: पीयूष पांडे एक योद्धा की तरह थे, रोमांटिक नहीं। उनके लिए मूछें उनकी आन, बान और शान थीं और वह राजस्थान के नाम के साथ जुड़े ‘मूंछ मोस्ट पर्सन’ के तौर पर जाने जाते थे। उनके जीवन में मां का बहुत गहरा असर था।

30 सेकंड का आदमी: पीयूष पांडे कभी भी फिल्म मेकर नहीं थे, जैसा कि उनके छोटे भाई प्रसून पांडे हैं। पीयूष पांडे सोते-उठते-बैठते आउट एंड आउट एड मैन थे। उनका जीवन 30 सेकंड के फॉर्मेट के लिए समर्पित था, जहाँ उन्हें अपनी पूरी कहानी कहनी होती थी। वह 30 सेकंड का आदमी था।

आज, पीयूष पांडे के जाने से हमारा परिवार खुद को अनाथ महसूस कर रहा है, लेकिन उनका जीवन एक प्रेरणा है। उन्होंने हमेशा “झंडे गाड़ते चलो, कल्चर से जुड़े रहो” का संदेश दिया। अपने जीवनकाल में उन्होंने जयपुर फुट जैसे सामाजिक कार्यों के लिए गुमनाम रूप से कई डोनेशन किए, क्योंकि वह बेहद विनम्र और लो-प्रोफाइल व्यक्ति थे।

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