SC बिल्डिंग पर राष्ट्रीय प्रतीक लगाने की मांग, याचिका खारिज:  CJI बोले- यह मामला न्यायिक नहीं, प्रशासनिक स्तर पर देखा जाएगा
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SC बिल्डिंग पर राष्ट्रीय प्रतीक लगाने की मांग, याचिका खारिज: CJI बोले- यह मामला न्यायिक नहीं, प्रशासनिक स्तर पर देखा जाएगा

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नई दिल्ली15 मिनट पहले

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तस्वीर- फाइल फोटो - Dainik Bhaskar

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की बिल्डिंग के गुंबद पर राष्ट्रीय प्रतीक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यह मामला न्यायिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर विचार का विषय है।

यह याचिका बदरवाड़ा वेणुगोपाल उर्फ बरा खतरनाक की तरफ से दायर की गई थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने याचिका पर सुनवाई की।

CJI ने सुनवाई के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट की नई बिल्डिंग बन रही है और इस मुद्दे पर उस समय विचार किया जा सकता है। याचिकाकर्ता ने मौजूदा भवन पर राष्ट्रीय प्रतीक लगाने की मांग की। इस पर कोर्ट ने आश्वासन दिया कि इसके बारे में सोचा जाएगा, लेकिन ऐसे मामलों को याचिका के जरिए नहीं उठाया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने बताया- मई 2025 में लेटर लिखकर भेजा था

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे इस मामले को लेकर प्रशासनिक स्तर पर लिखित अपील करें। याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने मई 2025 में इस मुद्दे पर लेटर लिखा था, जिस पर नवंबर 2025 में जवाब मिला था कि सुप्रीम कोर्ट अपना अलग प्रतीक इस्तेमाल करता है।

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि वह जवाब उनके कार्यकाल से पहले का है और अब इस पर विचार किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सचिव जनरल को निर्देश दिया कि इस मामले पर एक नोट तैयार कर सक्षम प्राधिकारी के सामने रखा जाए।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि अगर गुंबद पर राष्ट्रीय प्रतीक लगाने के लिए कोई वास्तु या संरचनात्मक व्यवस्था नहीं है, तो जरूरी संस्थागत और तकनीकी कदम उठाए जाएं। यह सब संविधान और राज्य प्रतीक के उपयोग से जुड़े कानूनों के अनुसार किया जाए।

याचिका में यह भी मांग की गई थी कि इस प्रक्रिया को तय समय सीमा में लागू किया जाए। इसके लिए करीब 8 सप्ताह का समय सुझाया गया था। यह मांग State Emblem of India (Prohibition of Improper Use) Act, 2005 और State Emblem of India (Regulation of Use) Rules, 2007 के अनुरूप की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक प्रतीक में अशोक चक्र के नीचे अशोक स्तंभ का सिंह बना है।

सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक प्रतीक में अशोक चक्र के नीचे अशोक स्तंभ का सिंह बना है।

सुप्रीम कोर्ट के प्रतीक में अशोक चक्र और संस्कृत श्लोक

सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक प्रतीक अशोक चक्र के नीचे स्थित अशोक स्तंभ के सिंह को दर्शाता है। इसके नीचे संस्कृत में “यतो धर्मस्ततो जयः” (जहां धर्म है, वहां विजय है) लिखा है।

यह प्रतीक 26 जनवरी 1950 को अपनाया गया था, जिस दिन सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई थी। यह सारनाथ के सिंह स्तंभ से प्रेरित है, जो न्याय, धर्म और देश की सर्वोच्च अदालत की अधिकारिता का प्रतीक है।

वहीं भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ स्थित सम्राट अशोक के लायन कैपिटल (सिंह स्तंभ) से लिया गया है। इसमें चार एशियाई शेर पीठ से पीठ मिलाकर खड़े हैं। सामने से केवल तीन शेर दिखाई देते हैं, चौथा पीछे होता है।

नीचे एक गोलाकार आधार होता है, जिस पर सिंह, बैल, घोड़े और हाथी की आकृतियां उकेरे गए हैं। इसके बीच में अशोक चक्र होता है और नीचे “सत्यमेव जयते” (सत्य की ही जीत होती है) लिखा होता है। राष्ट्रीय प्रतीक देश की करेंसी और सरकारी दस्तावेजों पर इस्तेमाल होता है।

2022 में नई संसद भवन पर राष्ट्रीय प्रतीक पर भी विवाद हुआ

नई संसद भवन पर लगाए गए राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर 2022 में बड़ा विवाद खड़ा हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 जुलाई 2022 को संसद की नई इमारत की छत पर अशोक स्तंभ आधारित राष्ट्रीय प्रतीक का अनावरण किया था। यह कांस्य (ब्रॉन्ज) से बना लगभग 6.5 मीटर ऊंचा और करीब 9,500 किलोग्राम वजनी है।

विवाद की वजह प्रतीक में बने शेरों का स्वरूप बना। विपक्षी दलों और कई लोगों ने आरोप लगाया कि नए प्रतीक में शेर अधिक आक्रामक और ‘गरजते हुए’ दिख रहे हैं, जबकि मूल अशोक स्तंभ (सारनाथ) में शेर शांत और गंभीर मुद्रा में हैं। उनका कहना था कि इससे राष्ट्रीय प्रतीक की मूल भावना—सत्य, शक्ति और शांति—प्रभावित होती है।

वहीं सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कोण (एंगल) और आकार के कारण शेरों की अभिव्यक्ति अलग दिख रही है, लेकिन डिजाइन पूरी तरह से मूल प्रतीक के अनुरूप ही है। सरकार के मुताबिक, जमीन से 33 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित इस प्रतीक को नीचे से देखने पर उसका प्रभाव अलग नजर आता है।

यह मामला अदालत तक भी पहुंचा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। इसके बाद भी यह मुद्दा राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना रहा।

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