Waqf Bill News: लोकसभा में बुधवार को वक्फ (संशोधन) विधेयक पेश करने के दौरान मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रीजीजू ने बेहद अहम तथ्य को सामने रखा। केंद्रीय मंत्री ने मार्च, 2014 में तत्कालीन यूपीए सरकार के उस फैसले का जिक्र किया जिसमें दिल्ली की 123 प्रमुख संपत्तियों को डीनोटिफाई कर उन्हें वक्फ बोर्ड को देने का फैसला किया गया था। लेकिन अहम बात यह है कि उस दौरान क्या हुआ था।
आइए, इस बारे में जानते हैं।
केंद्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने उस समय 123 संपत्तियों को डिनोटिफाई करने और दिल्ली वक्फ बोर्ड को मालिकाना हक ट्रांसफर करने के लिए एक ड्राफ्ट कैबिनेट नोट तैयार किया था। इसमें 1911-1915 में ब्रिटिश सरकार द्वारा इन संपत्तियों के किए गए अधिग्रहण को ‘रद्द’ कर दिया गया था। इनमें से कुल 61 संपत्तियां भूमि और विकास विभाग के पास थीं जबकि बची हुईं दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के।
इन संपत्तियों को मार्च 2014 में ट्रांसफर किया गया और ऐसा लोकसभा चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता के लागू होने से एक रात पहले किया गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत हुई थी।
वीएचपी ने हाई कोर्ट में दायर की थी याचिका
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के द्वारा इन 123 संपत्तियों को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका दायर किए जाने के बाद एनडीए सरकार ने 123 संपत्तियों को ट्रांसफर किए जाने की जांच शुरू की और दावा किया कि ऐसा करने के पीछे “राजनीतिक वजह” थी।
‘मॉरीशस जैसे 2, सिंगापुर जैसे 5, मालदीव जैसे 12 देशों के बराबर…
वीएचपी ने याचिका में क्या कहा था?
वीएचपी ने याचिका में कहा था कि जिन संपत्तियों का अधिग्रहण किया गया, कब्जा होने के बाद वे सरकार के पास आ गई हैं। उन्हें Land Acquisition Act की धारा 48 का इस्तेमाल करते हुए अधिग्रहण से मुक्त नहीं किया जा सकता।
इनमें से ज़्यादातर संपत्तियां कनॉट प्लेस, मथुरा रोड, लोधी रोड, मानसिंह रोड, पंडारा रोड, अशोका रोड, जनपथ, संसद भवन, करोल बाग, सदर बाज़ार, दरियागंज और जंगपुरा में और उसके आस-पास स्थित हैं। याचिका में कहा गया था कि हर संपत्ति में एक मस्जिद है जबकि कुछ में दुकानें और घर हैं।
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कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का नाम
तत्कालीन शहरी विकास मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने 2015 में The Indian Express से कहा था, “पिछले साल अपने पद से हटने से पहले, उन्होंने (कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद) वोट बैंक की राजनीति को ध्यान में रखते हुए इन संपत्तियों के ट्रांसफर में अहम भूमिका निभाई थी।”
यहां बताना जरूरी होगा कि जनवरी, 2013 में तत्कालीन अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने उस वक्त की UPA सरकार को सलाह दी थी कि संपत्तियों के ट्रांसफर का प्रस्ताव कानूनी रूप से ठीक नहीं है, जिसके बाद अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने Central Waqf Council के तहत विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया था। लेकिन इस समिति ने संपत्तियों के ट्रांसफर का प्रस्ताव का समर्थन किया था जिसके बाद वाहनवती सहमत हो गए थे।
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