Waqf Amendment Bill Protests: वक्फ (संशोधन) बिल को लेकर संसद से सड़क तक जोरदार हंगामा हो रहा है। संसद में भारी शोर-शराबे और बहस के बीच विपक्ष के साथ ही मुस्लिम संगठनों की ओर से इस बिल का पुरजोर विरोध किया जा रहा है। इस बिल को लेकर सबसे बड़ी चर्चा इसी बात की है कि क्या एनडीए में शामिल कुछ दलों को इस बिल का समर्थन करने की वजह से राजनीतिक नुकसान हो सकता है? चर्चा यह भी है कि मोदी सरकार इस बिल के मामले में पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ी।
मोदी सरकार जब वक्फ (संशोधन) बिल को लोकसभा में लाने की तैयारी कर रही थी तो सबसे बड़ा सवाल यह उठा था कि एनडीए में शामिल और ‘सेक्युलर’ राजनीति करने वाली तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू), राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) क्या इस बिल का समर्थन करेंगी? लेकिन इन सभी दलों ने वक्फ बिल पर सरकार का खुलकर साथ दिया और लोकसभा में यह बिल पारित हो गया।
एक ओर जहां इंडिया गठबंधन में शामिल और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने भी वक्फ बिल को मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों और संविधान पर हमला बताया है तो केंद्र की एनडीए सरकार की अगुवाई कर रही बीजेपी और उसके सहयोगी दलों का स्पष्ट रूप से कहना है कि यह बिल गरीब और पिछड़े मुसलमानों की भलाई के मकसद से लाया गया है।
इस बिल को लेकर तमाम तरह की चर्चाओं का दौर सोशल मीडिया पर भी चल रहा है और माहौल पूरी तरह ‘गर्म’ है।
वक्फ बिल को लेकर मोदी सरकार ने अपनी तैयारी को पूरी तरह चाक-चौबंद रखा। सरकार की ओर से संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया और इसमें विपक्षी दलों के सांसदों को भी शामिल किया गया। इसके अलावा मुस्लिम संगठनों के साथ ही विपक्षी दलों से भी सुझाव मांगे गए। कुल मिलाकर सरकार ने वक्फ बिल को लेकर आम सहमति का माहौल बनाने की कोशिश की और इस बात का पूरा ध्यान रखा कि विपक्ष को CAA-NRC, कृषि कानूनों के मुद्दे की तरह इस पर राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने का मौका ना मिले।
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बीजेपी ने जोर देकर कहा कि इस बिल के आने से मुस्लिम महिलाओं और पसमांदा समाज के लोगों के हितों की रक्षा होगी। बीजेपी ने यह भी दिखाया कि भले ही एनडीए की सरकार सहयोगी दलों पर निर्भर हो (क्योंकि बीजेपी के पास केंद्र में अपने दम पर बहुमत नहीं है) लेकिन फिर भी पार्टी इस मुद्दे पर मजबूती से आगे बढ़ेगी। अब कुछ बात इस बिल का चुनावी राज्यों पर कितना राजनीतिक असर क्या हो सकता है, उस पर करते हैं।
बिहार- बंगाल में होने हैं चुनाव
याद दिलाना होगा कि इस साल के अंत में बिहार जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं और अगले साल पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में भी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को टीएमसी का मुकाबला करना है। इन दोनों ही राज्यों में मुस्लिम समुदाय बेहद ताकतवर है और इन दोनों ही राज्यों के चुनाव में वक्फ बिल के मुद्दे का असर होने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता।
बिहार में सीधा-सीधा मुकाबला एनडीए बनाम महागठबंधन यानी इंडिया गठबंधन के बीच है। वक्फ बिल को लेकर जिस तरह मुस्लिम संगठनों ने जोरदार विरोध किया है, ऐसे में बिहार में बीजेपी के साथ एनडीए में शामिल जेडीयू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) को मुस्लिम वोटों को अपने साथ रखने में मुश्किल पेश आ सकती है। याद दिलाना होगा कि हाल ही में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी का कुछ मुस्लिम संगठनों की ओर से बहिष्कार कर दिया गया था।
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दूसरी ओर, इसी तरह पश्चिम बंगाल में बीजेपी को ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस से दो-दो हाथ करने हैं। ममता बनर्जी ने भी वक्फ बिल को लेकर केंद्र के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी है और यहां तक कह दिया है कि अगर केंद्र में विपक्ष की सरकार बनी तो इस बिल को रद्द कर दिया जाएगा।
हिंदू वोट बैंक का मिलेगा साथ?
बीजेपी वक्फ बिल को लेकर मुस्लिम समुदाय को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि यह बिल उनके खिलाफ नहीं है। इस बिल के कानून बनने के बाद वक्फ की जमीनों के मैनेजमेंट में पारदर्शिता आएगी और इसका सीधा-सीधा फायदा गरीब मुसलमानों को होगा। पार्टी ने अपने कई मुस्लिम चेहरों को भी इस बिल के समर्थन में आगे किया है। ऐसा भी दिखाई दे रहा है कि वक्फ बिल को लेकर जो चर्चा हो रही है, उससे बीजेपी के हिंदू वोट बैंक में इजाफा हो सकता है।
यहां याद दिलाना होगा कि CAA-NRC के मुद्दे पर विपक्ष देश भर में एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने में कामयाब रहा था। बीजेपी सरकार ने थोड़ा रुकने के बाद CAA को तो लागू कर दिया लेकिन वह NRC के मुद्दे पर आगे नहीं बढ़ी। इसी तरह साल 2020 में जब मोदी सरकार तीन कृषि कानून लाई थी तो इसे लेकर भी देश भर में किसान संगठनों के साथ ही विपक्षी राजनीतिक दलों ने जोरदार आंदोलन खड़ा कर दिया था। तब हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने दिल्ली के सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर डेरा डाल दिया था। यह आंदोलन इतना जबरदस्त था कि बीजेपी को बैक फुट पर आना पड़ा था और मोदी सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए थे।
यह साफ दिखाई देता है कि पिछले एक साल में इंडिया गठबंधन और अन्य विपक्षी राजनीतिक दल वक्फ बिल के मसले पर ऐसा जोरदार राजनीतिक माहौल नहीं बना पाए जिसमें मोदी सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़े। इसे निश्चित रूप से बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार की जीत और विपक्ष की हार कहा जा सकता है।
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