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- Aarti Jerath’s Column – Congress’s Strategy In UP Politics Is Now Shifting.
3 घंटे पहले
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आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार
यूपी की राजनीतिक बिसात अब आकार लेने लगी है। इसी क्रम में कांग्रेस ने एक दिलचस्प चाल चलते हुए एक ब्राह्मण महिला आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। यह फैसला कांग्रेस का साहसिक दांव है- उस समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश, जो मंडल-कमंडल की राजनीति से यूपी का राजनीतिक परिदृश्य बदलने के बाद से ही भाजपा का मजबूत समर्थक रहा है। कांग्रेस भाजपा के गढ़ में जाकर उसी को चुनौती देने की कोशिश कर रही है।
यूपी में कांग्रेस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में उसका वोट शेयर 2% से थोड़ा ही अधिक था। ऐसे में भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने की उसकी यह कोशिश महत्वाकांक्षी भी है और दुस्साहसी भी। शायद राम मंदिर में चंदे की कथित हेराफेरी से पार्टी का हौसला बढ़ा है। यह देखना बाकी है कि क्या ब्राह्मण समुदाय फिर से उस पार्टी के साथ जाएगा, जिसका उसने अतीत में समर्थन किया था।
जबकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर अगले साल विधानसभा चुनाव में भाजपा हारती है, तो अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में कांग्रेस जूनियर पार्टनर की भूमिका में ही होगी। वास्तव में, कांग्रेस घूम-फिरकर फिर से इंदिरा गांधी की राजनीति की ओर लौटती हुई नजर आ रही है। इंदिरा ने ही ब्राह्मण-दलित-अल्पसंख्यक का मजबूत सामाजिक गठजोड़ तैयार किया था, जिसके सहारे कांग्रेस 1971 में यूपी की सत्ता में वापसी करने में सफल हुई थी।
इससे पहले 1967 में संयुक्त विधायक दल के समाजवादी-जनसंघ गठबंधन ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया था। यह गठजोड़ 1980 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के उभार तक कायम रहा था। लेकिन राम मंदिर आंदोलन ने बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को भाजपा की ओर जाने के लिए प्रेरित किया और उसके बाद से वे पार्टी के साथ बने रहे।
दिलचस्प यह है कि राहुल गांधी ने भाजपा से मुकाबला करने और यूपी में अपनी पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए पहले मंडल की राजनीति को आजमाने का फैसला किया था। उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव में 90 ओबीसी उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, जो कांग्रेस की ओर से अब तक की सबसे बड़ी संख्या थी। लेकिन यह रणनीति काम नहीं आई और अखिलेश यादव ने वह चुनाव जीत लिया।
ओबीसी वोटों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश उन्होंने इसके बाद भी जारी रखी और जाति जनगणना जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया। लेकिन अब लगता है कि उन्हें अपनी इस रणनीति की निरर्थकता समझ में आ गई है और उन्होंने अपनी दादी की राजनीति से सबक लेने का फैसला किया है। यूपी कांग्रेस के नए पदाधिकारियों के चयन में बीडीए सामाजिक गठजोड़ को फिर से खड़ा करने की कोशिश साफ दिखाई देती है।
प्रदेश अध्यक्ष ब्राह्मण हैं, जबकि कार्यकारी अध्यक्ष मुस्लिम (इमरान मसूद) हैं। दो वरिष्ठ उपाध्यक्षों में से एक (आलोक प्रसाद) दलित हैं और पासी समुदाय से आते हैं। दूसरे वरिष्ठ उपाध्यक्ष देविंदर निषाद ईबीसी हैं और नाविक समुदाय से आते हैं। इन नियुक्तियों पर प्रियंका गांधी वाड्रा की छाप भी बहुत साफ दिखाई देती है। अनुराधा मिश्रा ‘मोना’ को उनका करीबी माना जाता है।
उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले चले ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान में प्रियंका के साथ मिलकर काम किया था। इमरान मसूद भी प्रियंका के पसंदीदा नेताओं में हैं। पश्चिमी यूपी के मुसलमानों के बीच उनका काफी प्रभाव भी है।
खबरों की मानें तो प्रियंका गांधी ने अखिलेश यादव को व्यक्तिगत रूप से भरोसा दिलाया है कि अगले साल होने वाले चुनाव से पहले वे इमरान को सपा पर निशाना साधने से रोकेंगी। इन तमाम घटनाक्रमों से यह संदेश जा रहा है कि कांग्रेस के चुनाव अभियान में प्रियंका की भूमिका केंद्रीय बनी रहेगी।
यह भी उल्लेखनीय है कि अखिलेश और डिम्पल के साथ उनके अच्छे संबंध हैं। डिम्पल अब जमीन पर लगातार अधिक सक्रिय दिखाई देने लगी हैं। यह सपा की छवि बदलने की कोशिश का हिस्सा है। पहली बार समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन चुनाव को गंभीरता से ले रहा है। दोनों पक्ष जानते हैं कि उत्तर प्रदेश का 2027 का जनादेश ही 2029 की बड़ी चुनावी लड़ाई की जमीन तैयार करेगा।
- एक तरफ कांग्रेस का बीडीए और समाजवादी पार्टी का पीडीए गठजोड़, तो दूसरी तरफ भाजपा का सवर्णों, ओबीसी और दलितों के एक हिस्से का मजबूत सामाजिक गठजोड़। यह मुकाबला दिलचस्प होने जा रहा है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)







