टिपण्णी

एन. रघुरामन का कॉलम: ग्रेट आइडिया के लिए खुला दिमाग चाहिए, लाखों डॉलर लैब की जरूरत नहीं

Spread the love


  • Hindi News
  • Opinion
  • Innovation Success: Bengaluru Professor Saji Varghese Coconut Leaf Idea

37 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

2017 में दुनिया जब सिंगल यूज प्लास्टिक की समस्या से जूझ रही थी और रेस्तरां इसके बेतुके से विकल्प तलाश रहे थे तो प्रोफेसर साजी वर्गीज क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु के हरे-भरे कैंपस में रोज की तरह टहल रहे थे। उनकी नजर घास पर पड़े नारियल के एक सूखे पत्ते पर पड़ी।

भारत में ये पत्ते हर जगह मिलते हैं और आमतौर पर एग्रीकल्चर वेस्ट समझकर जला दिए जाते हैं। एक पत्ता उठाकर उन्होंने अंगुलियों के बीच घुमाया तो कुछ अजीब महसूस हुआ। इसकी सतह चिकनी और चमकदार थी। पेड़ से टूटने के बावजूद यह न तो सड़ा और न ही नम हुआ था। उन्होंने विचार किया कि ‘सूखा पत्ता पानी को क्यों रोकता है?’

जिज्ञासा में वे कुछ पत्ते लैब में ले गए। उन्हें पता चला कि प्रकृति पहले ही इंजीनियरिंग कर चुकी है। पत्ते पर नेचुरल और फूड-सेफ एपिक्यूटिकुलर वैक्स की परत चढ़ी थी। जब इसे कसकर ट्यूब के जैसे रोल किया तो वैक्स की परत ने स्वाभाविक रूप से लिक्विड को दूर रखा।

प्रोफेसर साजी समझ गए कि उनके हाथ में गार्डन-वेस्ट नहीं, बल्कि एक बेहतरीन बायोडिग्रेडेबल स्ट्रॉ का ब्लूप्रिंट है। उन्हें लगा कि यह कागज और प्लास्टिक से बेहतर है। इस आइडिया को हकीकत बनाने के लिए प्रोफेसर साजी ने अपने स्टूडेंट्स के साथ काम किया और अंतत: ‘ब्राउन रीड एग्री वेस्ट इनोवेशंस’ कंपनी बनाई, जिसने ‘सनबर्ड स्ट्रॉज’ लॉन्च किए।

उन्होंने मल्टी-लेयर्ड स्ट्रॉ बनाई, जिसने मौजूदा विकल्पों की कई खामियों को दूर किया। प्राकृतिक रूप से प्लास्टिक स्ट्रॉ को खत्म होने में 500 साल से ज्यादा लगते हैं। यह बहुत टिकाऊ होती है, लेकिन पेट्रोलियम कॉम्पोनेंट होने के कारण जहरीली भी है। वहीं, पेपर स्ट्रॉ के लिए जिंदा पेड़ काटने पड़ते हैं। सिंथेटिक ग्लू और ब्लीच के इस्तेमाल के बावजूद यह 20 मिनट में गीली हो जाती है।

इसके उलट, कोकोनट ट्री स्ट्रॉ 100% गिरी हुई पत्तियों से बनती है और केमिकल-फ्री होती है। यह गर्म और ठंडे ड्रिंक में 3-4 घंटे चलती है। इस इनोवेशन की खूबसूरती इसके कच्चे माल में है। नारियल का पेड़ (कोकोस न्यूसीफेरा) भारत के ताने-बाने में रचा-बसा है।

केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गोवा के तटीय इलाकों में 2 मिलियन हेक्टेयर से ज्यादा नारियल की प्लांटेशन है। एक पेड़ हर साल 12 से 15 पत्ते गिराता है। इन पत्तों को जलाने के बजाय- जिससे पर्यावरण में कार्बन रिलीज होता है- सनबर्ड स्ट्रॉज इस एग्रीकल्चर बाय-प्रोडक्ट को कीमती उत्पाद में बदलती है। इससे स्टूडेंट्स को निम्न सीख मिलती हैं।

साधारण चीजें देखिए: नारियल के पत्ते हजारों साल से गिर रहे हैं, लेकिन इन्हें प्रोडक्ट की तरह देखने के लिए पारखी नजर चाहिए थी। दुनिया में क्या नहीं है, इसकी बजाय यह देखिए कि क्या इग्नोर किया गया है।

‘क्यों’ और ‘ऐसा हो तो’ जैसे सवाल पूछिए: गीली होने वाली पेपर स्ट्रॉ जैसी रोजमर्रा की समस्या या वाटर-रेपेलेंट पत्ते जैसी प्राकृतिक घटना दिखे तो सवाल पूछिए। जिज्ञासा ही प्रॉब्लम और पेटेंट के बीच का पुल है।

जो है, उसी से प्रोटोटाइप बनाएं: प्रोफेसर साजी ने शुरुआत के लिए बड़ी फंडिंग का इंतजार नहीं किया। उन्होंने कैंपस के कमरे में हाथ से पत्तों की रोलिंग शुरू की। अपने आइडियाज को साधारण तरीके से और जल्दी आजमाइए।

कैंपस से कॉरपोरेट जाने के रास्ते खोजिए: प्रोजेक्ट पर काम कर रहे छात्रों ने जब देखा कि कारोबारी पेपर स्ट्रॉ से परेशान हैं, जबकि कानून ने प्लास्टिक स्ट्रॉ बैन कर दिए हैं तो वे ठीक उसी समय बेहतर प्रोडक्ट लेकर बाजार में उतरे, जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।

इकोसिस्टम सपोर्ट का फायदा उठाइए: टीम ने अकेले यह नहीं किया। उन्होंने बिजनेस मेंटरशिप, लीगल फ्रेमवर्क और इन्वेस्टर नेटवर्क के लिए आईआईएम बेंगलुरु के एनएसआरसीईएल इनक्यूबेटर के ‘इम्पैक्ट ऑर्बिट प्रोग्राम’ का सहारा लिया। एकेडमिक्स के पास आमतौर पर यह नहीं होता। आज वे 10 देशों में एक्सपोर्ट कर रहे हैं।

फंडा यह है कि अपने टिकाऊ और सोशल इम्पैक्ट प्राेडक्ट को बनाने में ग्रामीण महिलाओं को सशक्त करके कोई व्यक्ति वैश्विक खरीदारों को आकर्षित कर सकता है।

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *