- Hindi News
- Opinion
- Beed Ramabai Ranveer Inspiring Story | Mother Struggle For Education
39 मिनट पहले
- कॉपी लिंक

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
महाराष्ट्र के बीड जिले की रामाबाई रणवीर की कहानी सिर्फ त्याग की नहीं है, बल्कि यह बताती है कि 5 हजार रुपए जैसी छोटी रकम की कीमत अलग-अलग हाथों में जाकर कैसे बदल जाती है। 47 वर्षीय रामाबाई, बीड की ध्यानदीप अकादमी के किचन में काम करती हैं। 9 हजार रुपए मासिक सैलरी पर वे रोज 200 से ज्यादा चपातियां बनाती हैं। 2012 में पति की मौत के बाद उन्होंने अपनी दो बेटियों की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए यह काम शुरू किया।
उनकी छोटी बेटी आरती (20) बीएससी कंप्यूटर साइंस की स्टूडेंट है और नांदेड़ में अकेली रहती है। 28 अगस्त को उसने कॉल करके खाने और किराए के लिए पैसे मांगे। रामाबाई के पास पैसे नहीं थे और वह पूरी रात सो नहीं सकीं। उसी शाम रामाबाई ने सुना था कि अगली सुबह होने वाली दौड़ में यदि वह पहले स्थान पर आएं तो 3 हजार रुपए जीत सकती हैं।
उन्हें पता तक नहीं था कि दौड़ का मतलब क्या होता है। उन्होंने इसकी चिंता भी नहीं की कि वह इस लंबी और कठिन दौड़ के लिए ट्रेंड नहीं हैं और बिना जूतों के दौड़ने वाली इकलौती रनर हैं। अगली सुबह विधवा रामाबाई बीड की उस अकादमी में पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के साथ पिकअप में बैठकर निकल पड़ीं, जहां वह काम करती थीं। वह अपनी जिंदगी की पहली दौड़ में हिस्सा लेने जा रही थीं।
वे साड़ी पहन कर दौड़ीं। दौड़ के बीच उनकी चप्पलें भी जवाब दे गईं, लेकिन वह 3 किमी की दौड़ पूरी होने तक दौड़ती रहीं। उनके दिमाग में बस यही था कि अगर वह जीत गईं तो बेटी की पढ़ाई के खर्च की मुश्किल कुछ कम हो जाएगी। आखिरकार, एक मां का यह अडिग हौसला जीत गया।
दौड़ जीतने के बाद उन्होंने लोकल मीडिया से कहा कि ‘मैं ऐसे दौड़ी जैसे मेरी जिंदगी इसी पर निर्भर थी। मुझे नहीं पता था कि यह दूरी पूरी करने के लिए मुझे कितना समय चाहिए। मैं सिर्फ फिनिश लाइन पार करने के बाद ही रुकी।’ उन्हें 3 हजार के बजाय 5 हजार रुपए दिए गए। उन्होंने तुरंत अपनी दूसरी बेटी पूजा के लिए कॉपी-पेन खरीदे और शेष पैसे आरती के लिए बचा लिए।
रामाबाई की तरह पूरे भारत में ऐसे पैरेंट्स हैं, जो रोज अपना ही नामुमकिन-सा गणित लगाते हैं। वे सोचते हैं कि ‘मैं ऐसा क्या टाल सकता हूं, जिससे मेरे बच्चे को अपना सपना न टालना पड़े?’ वर्षों पहले एक कहानी नागपुर के ऑटोरिक्शा ड्राइवर सौनीत्रा इंगले की भी थी, जो महज 2500 रुपए महीना कमाते थे, लेकिन बेटी की पढ़ाई के लिए रोज 20 रुपए अलग रख देते थे।
वे खुद भी मुश्किल हालात में पले-बढ़े थे, इसलिए चाहते थे कि जो मौके उन्हें नहीं मिल पाए, बेटी को मिलें। यह रकम सुनने में बहुत छोटी लगती है, लेकिन इतना कम कमाने वाला रोज 20 रुपए बचा रहा है तो इसका मतलब था कि वह अपनी तात्कालिक जरूरतों से ज्यादा बेटी के भविष्य को प्राथमिकता दे रहे हैं।
इसी साल मार्च में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025-2026 में पहले ही अटेंप्ट में ऑल इंडिया 57वीं रैंक हासिल करने वाली केरल के तिरुवनंतपुरम की जेएस श्रीजा ने अपने पैरेंट्स के त्याग के बारे में बताया। उनके पिता जय कुमार मेसन के हेल्पर के तौर पर दिहाड़ी मजदूरी करते हैं।
वह काम पर आने-जाने के लिए रोज 40 किमी साइकिल चलाते। श्रीजा की पढ़ाई के लिए उन्होंने पत्नी के मंगलसूत्र समेत परिवार का सोना गिरवी रखकर 8 लाख रुपए का लोन लिया। रात में वह रसोई में भी हाथ बंटाते, ताकि श्रीजा पूरी तरह पढ़ाई पर फोकस कर सकें।
छत्तीसगढ़ में ज्योति पाटिल ने पति की मौत के बाद परिवार चलाने और बेटी की पढ़ाई जारी रखने के लिए ऑटोरिक्शा चलाना शुरू किया। बाद में उनकी बेटी वर्तिका रायपुर के सरकारी स्कूल के उन दो स्टूडेंट में शमिल हुई, जिनके वाटर-कंजर्वेशन प्रोजेक्ट की आईआईटी तिरुपति में हुई एक प्रतियोगिता में अंतरराष्ट्रीय जजों ने तारीफ की।
फंडा यह है कि छोटी रकम भी तब छोटी नहीं रह जाती, जब पैरेंट्स सोचते हैं कि ‘आज मैं क्या त्याग सकता हूं, ताकि मेरे बच्चे को कल कोई त्याग न करना पड़े?’ क्योंकि वही छोटी रकम कल उम्मीद, सम्मान और कभी-कभी बच्चे के भविष्य की कीमत बन जाती है।








