एन. रघुरामन का कॉलम:  दूसरे की बर्बादी से हासिल की गई सम्पत्ति एक खोखली जीत की तरह है
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एन. रघुरामन का कॉलम: दूसरे की बर्बादी से हासिल की गई सम्पत्ति एक खोखली जीत की तरह है

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2 घंटे पहले

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एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु

एक बार एक व्यक्ति ने एक गोरैया को पकड़ लिया। गोरैया ने उससे जीवन की भीख मांगी और कहा कि बदले में वह उसे तीन ऐसी सीख देगी, जो उसके जीवन को बेहतर बना देंगी। गोरैया ने चहकते हुए कहा पहली सीख मैं तुम्हें तब दूंगी जब तुम मुझे मुक्त करोगे, दूसरी जब मैं उस सामने वाले पेड़ पर बैठूंगी और तीसरी जब मैं आकाश में उड़ जाऊंगी। व्यक्ति ने उत्सुकता से उसे छोड़ दिया।

गोरैया पास की एक बाड़ पर जा बैठी और उसे पहली सीख दी : बीते हुए पर कभी दु:ख मत करो; यह समय की बर्बादी है। व्यक्ति ने कंधे उचकाते हुए कहा कि वह ऐसी बातें पहले से जानता है। फिर गोरैया उड़कर एक ऊंची डाल पर जा बैठी और दूसरी सीख दी : किसी पर भी विश्वास मत करो, चाहे वह कितना ही निकट क्यों न हो, जब तक तुम अपनी आंखों से सत्य न देख लो।

इस बार भी व्यक्ति ने इसे सामान्य बात समझकर टाल दिया। तब पक्षी ने नीचे झांककर कहा, तुमने एक बड़ी भूल कर दी। मेरे शरीर के भीतर दो विशाल हीरे हैं। यदि तुमने मुझे मार दिया होता, तो तुम धरती के सबसे धनी व्यक्ति होते। उस व्यक्ति ​का दिल बैठ गया। वह विलाप करते हुए अपनी भूल पर पछताने लगा। फिर उसने ऊपर देखा और तीसरी सीख के लिए याचना की, यह उम्मीद करते हुए कि कम से कम वही उसके लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

पक्षी ने कहा- मैं तुम्हें तीसरी सीख क्यों दूं? तुमने पहली दो सीखों को तुरंत अनदेखा कर दिया। तुमने बीती हुई बात पर दु:ख जताया और असम्भव पर भी विश्वास कर लिया कि एक गोरैया के भीतर दो विशाल हीरे हो सकते हैं। मनुष्यों ने अपनी प्रगति के लिए ज्ञान अर्जित किया था और भौतिक सम्पदा इकट्ठा की थी, लेकिन उसे उपयोग में लाने का विवेक उसने गंवा दिया है। यह कहकर पक्षी उड़ गया। इस बोधकथा की याद मुझे इस शुक्रवार बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय को पढ़ते समय आई।

मामला एक ऐसे पुत्र से संबंधित था, जिसने “हीरों’ जैसी पैतृक सम्पत्ति के लालच में अपने पिता की सम्पत्ति के एक-तिहाई हिस्से पर दावा ठोक दिया। जब पिता ने प्रतिरोध किया तो पुत्र ने तर्क देने या पारिवारिक कर्तव्य की आड़ लेने के बजाय कानून के अपने ज्ञान को हथियार बना लिया और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (एमएचए) के प्रावधानों को लागू कराने के लिए याचिका दायर की। उसने एक स्वतंत्र मूल्यांकन की मांग की, ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि उसके पिता मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं और इस प्रकार उसे चुनौती देने की उन वृद्ध व्यक्ति की कानूनी क्षमता तक छीन ली जाए।

मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति फरहान दुबाश ने इस चाल को भांप लिया। उन्होंने कहा कि पुत्र की याचिका कानूनी प्रतिरोध की जड़ पर प्रहार करने की साफ कोशिश थी। एमएचए को कमजोर और असुरक्षित व्यक्तियों की रक्षा के लिए ढाल के रूप में बनाया गया था। लेकिन पुत्र ने उसे अपने पिता की कानूनी स्थिति को समाप्त करने के लिए तलवार की तरह इस्तेमाल करने का प्रयास किया।

पुत्र के लिए पिता अब अभिभावक नहीं रहे थे, बल्कि सम्पत्ति के मार्ग में एक बाधा भर थे और उस​के तमाम हथकंडे लालच से उत्पन्न हुए थे। यह कानूनी संघर्ष उस पक्षी की चेतावनी की पुष्टि करता है कि मनुष्य ने भौतिक प्रगति के लिए ज्ञान तो पा लिया है, पर अपनी सूझबूझ खो दी है। गोरैया हो या कोई और पक्षी, वो अपने बच्चों को पालने के लिए कभी किसी अन्य पक्षी का घोंसला नष्ट नहीं करते।

लेकिन जब एक पुत्र अपने पिता की सोच में कानूनी खामी तलाशने लगता है और परिवार की विरासत को हथियाने योग्य सम्पत्ति के रूप में देखने लगता है, तो वह सिद्ध कर देता है कि वह पक्षी सही था। 10 मार्च 1876 को ग्राहम बेल ने टेलीफोन का आविष्कार किया था। 1887 में जर्मन-अमेरिकी आविष्कारक एमिल बर्लिनर ने फ्लैट डिस्क ग्रामोफोन बनाया था। 3 अप्रैल 1973 को मोटोरोला के इंजीनियर मार्टिन कूपर ने पहला हैंडहेल्ड मोबाइल फोन विकसित किया था।

आवाज के क्षेत्र में ये सभी आविष्कार इसलिए सम्भव हुए थे, क्योंकि मानव प्रजाति के पास ज्ञान था। लेकिन जब उसी मानव प्रजाति का एक पुत्र उसी घर में रह रहे पिता की आवाज सुनने में नाकाम हो जाता है, तो एक गोरैया भी समझ जाती है कि हमने अपनी बुद्धि खो दी है।

फंडा यह है कि धन का लोभ सबसे “शिक्षित’ व्यक्ति को भी क्षण भर में बुनियादी तर्कशीलता और नैतिक सिद्धांतों के प्रति अंधा बना सकता है।

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