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5 घंटे पहले
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नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार
युवाओं के आंदोलनों ने देश में शिक्षा-व्यवस्था की स्थिति बदलने के लिए सरकार पर कार्रवाई का दबाव बढ़ाया है। राहुल गांधी ने 20 जुलाई को युवा प्रदर्शनकारियों पर हुए बलप्रयोग को लेकर आक्रामक रुख अपनाया है। विपक्ष जिस तरह से सत्तापक्ष को घेर रहा है, उससे 2027 की शुरुआत में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की तैयारियों पर सबकी नजरें टिक गई हैं। भाजपा पर भी अब अपनी राजनीतिक बढ़त फिर से हासिल करने का दबाव है।
आगामी चुनावों की तैयारी के पहले कदम के रूप में ही भाजपा ने हाल में अपने संगठन में फेरबदल किया है। भाजपाध्यक्ष नियुक्त होने के आठ महीने बाद नितिन नवीन ने आखिरकार अपनी टीम बनाई। इसमें कुछ चौंकाने वाले नाम भी थे। मसलन, स्मृति ईरानी और राम माधव की वापसी हुई। लेकिन यह बदलाव बहुत नाटकीय नहीं थे।
पार्टी को नई चुनौतियों के मुताबिक नया लुक देने की कोशिश जरूर की गई है। भाजपा के भीतर और संघ परिवार के साथ उसके रिश्तों में संतुलन बनाने, अनुभव और बदलाव को साथ लाने और पार्टी में मौजूद प्रेशर-ग्रुप्स को जोड़ने के प्रयास भी दिखे हैं।
1990 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी ने भाजपा में युवा नेतृत्व को गढ़ने का काम शुरू किया था। उन्होंने सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन, गोविंदाचार्य, वेंकैया नायडू, उमा भारती जैसे युवतर नेताओं को आगे बढ़ाया था। यही सब लोग आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा में उनकी टीम बने। गुजरात से यात्रा शुरू करने में नरेंद्र मोदी ने भी मदद की थी। फिर अरुण जेटली सामने आए। कर्नाटक से अनंत कुमार भी उभरे। पीछे मुड़कर देखें तो भाजपा में नया नेतृत्व तैयार करना आडवाणी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान था।
संगठन के बाद अब लोग यह देखने के लिए संभावित कैबिनेट फेरबदल का इंतजार कर रहे हैं कि 12 साल के शासन के बाद भाजपा कथित असंतोष से निपटने के लिए क्या करती है। क्या पार्टी कोई सर्जिकल रवैया अपनाएगी, या फिर होम्योपैथी जैसे धीमे बदलावों का रास्ता चुनेगी?
दरअसल, चार प्रमुख कारणों से पार्टी संगठन में फेरबदल अनिवार्य हो गया था। पहला कारण था, जेन-जी और जेन-अल्फा की चुनौती। जंतर-मंतर, झारखंड के अलावा देश के कई हिस्सों में स्कूली बच्चों के प्रदर्शनों से यह चुनौती स्पष्ट हो चुकी है।
भाजपा युवा वोटरों का दिल जीतने या उन्हें शांत करने के लिए मशक्कत कर रही है। पारंपरिक राजनीतिक दलों से इतर ये युवा सरकार के साथ किसी समझौते के लिए ‘सौदेबाजी’ के फॉर्मूले में भी रुचि नहीं रखते। अतीत में विपक्षी दल मुद्दे उठाते थे, अपनी बात रखते थे, उससे सियासी लाभ लेते थे और फिर कुछ मांगें मानने पर राजी हुई सरकार से समझौता कर लेते थे। लेकिन जेन-जी और जेन-अल्फा अपनी मांगों को लेकर ज्यादा अडिग हैं।
भाजपा उनसे संपर्क बढ़ाना चाहती है। ऐसा लगता है कि इसका रास्ता सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम के जरिए होकर जाता है, जिसे पार्टी ने अभी तक अनदेखा कर रखा था। वह एक्स और फेसबुक पर अधिक ध्यान दे रही थी।
भाजपा का अपने आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय को हटाना इस तथ्य की स्वीकारोक्ति थी कि जो आक्रामक शैली वे अपना रहे थे, वो अब कारगर नहीं रह गई थी। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी एक वर्ग को लगता है कि संभवत: 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बलप्रयोग का असर उल्टा पड़ा है।
दूसरा कारण स्पष्ट रूप से 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा में होने वाले विधानसभा चुनाव हैं। टीम में शामिल हुए नए चेहरों से उम्मीद है कि वे इन राज्यों में पार्टी के कामकाज में नई ऊर्जा भरेंगे।
आम आदमी पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए सात राज्यसभा सांसदों में से एक संदीप पाठक को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। आम तौर पर यह पद पार्टी में नए लोगों को नहीं दिया जाता। यह दिखाता है कि भाजपा-नेतृत्व पंजाब को कितना महत्व दे रहा है।
2022 में आम आदमी पार्टी की पंजाब की चुनावी जीत में संदीप पाठक ने डेटा डिजाइनिंग, बूथ मैनेजमेंट और सोशल/डिजिटल मीडिया आधारित रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। भाजपा अब इस सीमावर्ती राज्य में अपनी स्थिति बेहतर करने और सरकार बनाने के खेल में खुद को एक मजबूत खिलाड़ी के तौर पर पेश करने के लिए पाठक की विशेषज्ञता का इस्तेमाल करना चाहती है।
‘महिला’ फैक्टर भी स्पष्ट तौर पर 2027 के विधानसभा चुनावों और फिर 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रमुख मंत्र रहने वाला है। प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में इसका संकेत भी दिया था। भाजपा संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए प्रयासरत है, ताकि महिला आरक्षण विधेयक के साथ परिसीमन विधेयक को भी पारित कराया जा सके। स्मृति ईरानी को महासचिव और वसुंधरा राजे को उपाध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी के 15 उपाध्यक्षों में अब छह महिलाएं हैं। 65 सदस्यीय टीम में कुल 12 महिलाएं हैं, यानी 18% से कुछ अधिक।
तीसरा फैक्टर आरएसएस है। संघ ने हमेशा भाजपा संगठन को प्राथमिकता दी है। वह चाहता है कि पार्टी संगठन बनाने में उसकी भूमिका जरूर रहे। बी.एल. संतोष का राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बने रहना दर्शाता है कि पार्टी के संगठनात्मक मामलों में संघ की अहमियत बरकरार है।
फेरबदल के पीछे चौथा कारण यह है कि भाजपा नेतृत्व पार्टी के भीतर अलग-अलग शक्ति-समूहों और संघ परिवार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। पहले हाशिए पर चले गए राम माधव और स्मृति ईरानी की वापसी कराई गई है।
इसे इस संकेत के रूप में पेश किया जा रहा है कि भाजपा की नई टीम केवल अमित शाह की पसंद नहीं है, भले ही टीम में उनके विश्वासपात्र लोगों को अहम पद दिए गए हों। नई टीम में सुनील बंसल भी हैं, जिनकी पहले उत्तरप्रदेश और हाल ही में बंगाल की जीत में अहम भूमिका रही है। विनोद तावड़े भी महत्वपूर्ण महासचिवों में शामिल हैं।
12 साल के राज के बाद अब क्या रवैया रहेगा पार्टी का संगठन के बाद अब लोग यह देखने के लिए कैबिनेट फेरबदल का इंतजार कर रहे हैं कि 12 साल के शासन के बाद भाजपा कथित असंतोष से निपटने के लिए क्या करती है। क्या पार्टी कोई सर्जिकल रवैया अपनाएगी, या फिर होम्योपैथी जैसे धीमे बदलावों का रास्ता चुनेगी? (ये लेखिका के अपने विचार हैं)







