2 घंटे पहले
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आज (शनिवार, 10 अक्टूबर) पितृ पक्ष का अंतिम दिन सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या है। इस बार यह अमावस्या शनिवार को पड़ने से शनिश्चरी अमावस्या का संयोग बन रहा है। आज सूर्य और चंद्रमा कन्या राशि में हैं, इन पर वक्री शनि की दृष्टि है। शनि अपने स्वामित्व वाले उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में गोचर कर रहा है। शनि के साथ सूर्य-चंद्र के इस योग की वजह से शनिश्चरी अमावस्या का महत्व बढ़ गया है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, 2026 से पहले 1996 में भी 12 अक्टूबर को इसी तरह का योग बना था। करीब 30 साल बाद बन रहे इस योग में पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध-तर्पण करने के साथ शनि की अनुकूलता के लिए पूजा-पाठ और दान-पुण्य कर सकते हैं। मान्यता है कि आज किए गए धर्म से पितरों को तृप्ति मिलती है और वे अपने कुटुम्ब के लोगों को आशीर्वाद देकर अपने दाम पितर लोक लौट जाते हैं।
आज करें ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के लिए श्राद्ध
सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या पितृ पक्ष की अंतिम तिथि है। इस दिन घर-परिवार के उन सभी पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म किया जाता है। इस साल जिन मृत लोगों का पितृ पक्ष में किसी कारणवश श्राद्ध नहीं हो पाया है, उनके लिए भी आज श्राद्ध-तर्पण कर सकते हैं।
दोपहर करीब 12 बजे पितरों के निमित्त धूप-ध्यान, तर्पण और अन्य श्राद्ध कर्म करना चाहिए, इसे कुतुपकाल कहते हैं, यह समय पितरों के निमित्त धर्म-कर्म करने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। धूप-ध्यान करते समय मन की शुद्धता, संयम और घर में शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखना चाहिए।
अब जानिए श्राद्ध करने के लिए जरूरी चीजें और श्राद्ध करने की विधि…
जरूरी चीजें- गाय के गोबर से बने कंडे, धूप देने के लिए हवन कुंड या अन्य कोई बर्तन, घी, काले तिल, चावल, गुड़, कर्पूर, जल से भरा तांबे का लोटा, फूल, बैठने के लिए आसन। अगर ये सभी चीजें उपलब्ध न हो, तो जल, तिल, कंडे के अंगारे और गुड़-घी से भी श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण करके धूप-ध्यान किया जा सकता है। आप चाहें तो खीर-पुड़ी भी बना सकते हैं। खीर-पुड़ी से भी धूप दिया जाता है।

गाय, कुत्ते और कौए को भोजन कराने की परंपरा
इस दिन श्राद्ध कर्म करने के साथ सेवा और दान को भी विशेष महत्व दिया गया है। छोटे बच्चों को भोजन कराने, जरूरतमंदों को धन या खाद्य सामग्री देने और रोगियों को दवाइयां और फल दान करने जैसे शुभ काम करना चाहिए। गाय, कुत्ते और कौए को भोजन कराना भी पितृ पक्ष की मुख्य परंपरा है। कौए को पितरों का प्रतीक मानकर भोजन कराया जाता है। भक्त चाहें तो आज किसी पवित्र नदी में स्नान कर पितरों के निमित्त तर्पण कर सकते हैं।
शनिदेव की पूजा के लिए करें यह शुभ काम
शनिश्चरी अमावस्या पर शनि की अनुकूलता के लिए स्नान के बाद एक कलश में काले तिल, जौ, कच्चा दूध और जल भरें। कलश को घर के मंदिर में स्थापित कर दीपक जलाएं और ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। इसके बाद कलश का जल-दूध पीपल के वृक्ष की जड़ में अर्पित करने की परंपरा है। शनिवार को शनि मंदिर जाकर शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित किया जा सकता है। साथ ही काले तिल, काली उड़द और काला वस्त्र चढ़ाने की भी परंपरा है।
हनुमान जी की पूजा से भी शनि से जुड़े दोष शांत होते हैं, इसलिए आज हनुमान जी के सामने दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ किया जा सकता है।
11 अक्टूबर से शुरू होगी शारदीय नवरात्रि
पितृ पक्ष के बाद अगले दिन, 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि शुरू होगी। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है।







