प्रियदर्शन का कॉलम:  चुप्पी में भी धीरे-धीरे कोई प्रतिरोध शामिल होना चाहिए
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प्रियदर्शन का कॉलम: चुप्पी में भी धीरे-धीरे कोई प्रतिरोध शामिल होना चाहिए

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नेटफ्लिक्स पर इन दिनों चल रही वेब सीरीज “द नाइट एजेंट’ के तीसरे सीजन में सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति और उनकी पत्नी संदेह और आरोपों से घिरे हैं। पता चलता है कि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के लिए ऐसे संदिग्ध लोगों से पैसे लिए हैं, जिनका वास्ता आतंकी धमाकों से भी है। अमेरिका के मनोरंजन उद्योग में इन दिनों ऐसी और भी फिल्में या वेब सीरीज हैं, जिनमें सर्वोच्च स्तर के नेता, अफसर या खुफिया अधिकारी अपने ही देश से गद्दारी करते नजर आते हैं। उस अमेरिका में ये फिल्में या सीरीज बन रही हैं, जिसे दुनिया का सबसे कामयाब लोकतंत्र माना जाता है। जाहिर है, आम अमेरिकियों में लोकतांत्रिक प्रणाली से निकले नेतृत्व को लेकर मोहभंग है, जिसकी अभिव्यक्ति इन फिल्मों या सीरीज में दिखती है। ट्रम्प के दौर में इस व्यवस्था में श्वेत नस्लवाद, सैन्य वर्चस्ववाद, कुंठित मर्दवाद का जो नया त्रिकोण विकसित होता दिख रहा है, उस पर फिल्में बननी शायद अभी बाकी हैं। ईरान पर अमेरिकी हमले के बीच एप्स्टीन फाइलों से खुल रहा सिहरा देने वाला सच बताता है कि हम सभ्यता के कितने भयावह पाखंड के बीच रह रहे हैं। एप्स्टीन फाइलों में शामिल नामों पर एक सरसरी निगाह भी बताती है कि किस तरह दुनिया के ताकतवर लोग- राजनीतिक, आर्थिक व बौद्धिक मानक बनाने वाले भी- इस काली-घिनौनी सूची में शामिल हैं और तब भी कोई व्यवस्था उनका बाल बांका तक नहीं कर पा रही। उल्टे वे अपने कुकृत्य छुपाने या उनकी चर्चा मंद करने के लिए ईरान पर हमले कर रहे हैं, संसदों की कार्यवाहियां ठप्प होने दे रहे हैं और मामले अदालतों में लम्बित होने की दुहाई दे रहे हैं। मगर ये ताकतवर लोग एक-दूसरे के मित्र बने हुए हैं, एक-दूसरे की कार्रवाइयों को समर्थन दे रहे हैं और चुपचाप इस व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं, जो उनके किले को और अभेद्य बना सके। क्या यह आधुनिक लोकतंत्र की विफलता है? क्या यह उस विराट पूंजीवाद की विकृति है, जो किसी समांतर व्यवस्था के अभाव में अपनी अपरिहार्यता का गुमान करता सारे पाप कर रहा है? क्या यह उस नई उपभोक्तावादी प्रवृत्ति का प्रतिफलन है, जिसमें सबकुछ उपभोग, मनोरंजन, निजी तुष्टि और तृप्ति के लिए है? इन प्रश्नों में सरलीकरण लग सकता है, लेकिन यह सच है कि ये सारी व्यवस्थाएं अंततः दुनिया को तथाकथित विकास की चमकीली पन्नियों में लपेट कर युद्ध और विध्वंस के मुहाने पर ही ले जा रही हैं। इस विध्वंस से पहले जो कुछ है, वह भयावह विषमता है- अगर दुनिया में नहीं तो अपने देश में जरूर- जितने अरबपति बढ़ रहे हैं, उतने ही गरीब भी बढ़ते जा रहे हैं। सवाल और भी हैं। क्या हम इस स्थिति से निजात पा सकते हैं? या क्या हम इससे निजात पाना भी चाहते हैं? अपने देश के संदर्भ में देखें तो एक तरफ विकास की लुभाती हुई कहानी है, जिसके कुछ आयाम चमचमाते बाजारों, फ्लाई ओवरों और तरह-तरह की कारों में दिखते हैं और दूसरी तरफ कट्टरता, कठमुल्लेपन, घृणा-पोषित साम्प्रदायिकता की ओर बढ़ते समाज की हकीकत है, जिसमें मंदिर-मस्जिद, मजार, बाबा, साधु-संत-महंत और मठ सबसे ज्यादा चर्चा व स्वीकृति हासिल कर रहे हैं। इनके बीच एक खाता-पीता उपभोक्ता वर्ग है, जिसे हर तरह की मलाई अपने लिए चाहिए। यह टिप्पणी निराशाजनक लग रही हो तो इसमें आशा की किरण कहां खोजें? बेशक वह कहीं होगी जरूर, क्योंकि इतनी पुरानी सभ्यता और संस्कृति के रंध्रों में इतनी रोशनी फिर भी बची होती है कि वह कोई रास्ता दिखा सके। क्या यह गांधी का रास्ता है? क्या यह संयम और पश्चाताप से बन सकता है? मगर क्या हम उस संयम और पश्चाताप के कहीं आसपास भी हैं? इस चुप्पी में भी धीरे-धीरे कोई प्रतिरोध शामिल होना चाहिए। डॉ. लोहिया यों ही नहीं कहते थे कि निराशा के भी कर्तव्य होते हैं! (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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