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बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त कमजोर होना या शरीर का साथ छोड़ देना अब तय नहीं माना जाएगा। येल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की स्टडी में सामने आया है कि करीब 45% बुजुर्गों में उम्र बढ़ने के बावजूद मानसिक या शारीरिक क्षमता में सुधार हुआ। इनमें 31.9% की कॉग्निटिव क्षमता बेहतर हुई, जबकि 28% लोगों की शारीरिक ताकत बढ़ी। जिन लोगों की स्थिति स्थिर रही, उन्हें भी जोड़ें तो कुल 51% बुजुर्गों में गिरावट का कोई संकेत नहीं मिला। संयुक्त राज्य अमेरिका के येल स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की प्रोफेसर बेक्का लेवी की अगुआई में 65 साल से ज्यादा उम्र के 11 हजार से अधिक लोगों को 12 साल तक ट्रैक किया गया। इस दौरान 13 चरणों के कॉग्निटिव टेस्ट और चलने की गति के जरिए उनकी दिमागी और शारीरिक स्थिति जांची गई। सकारात्मक सोच से ज्यादा फायदा वैज्ञानिकों के अनुसार, बुढ़ापे के प्रति सकारात्मक और उत्साहपूर्ण नजरिया रखने वाले बुजुर्ग मानसिक व शारीरिक रूप से अधिक मजबूत रहते हैं। इसके उलट, नकारात्मक सोच रखने वालों में याददाश्त की कमी, हृदय रोग और अल्जाइमर का खतरा अधिक पाया गया। अध्ययन स्पष्ट करता है कि खुद को उपयोगी मानना बेहतर स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। मसल्स बॉडी ही नहीं, लंबी उम्र का भी हथियार मसल्स को अक्सर लोग जिम और बॉडीबिल्डिंग से जोड़कर देखते हैं, लेकिन रिसर्च बताती है कि मांसपेशियां शरीर का एक एक्टिव अंग हैं। ये हमें चलने-फिरने में मदद करती हैं, ब्लड शुगर कंट्रोल करने में रोल निभाती हैं और शरीर में सूजन घटाने वाले मायोकाइन्स जैसे प्रोटीन छोड़ती हैं। स्टडीज के मुताबिक मसल्स दिल और दिमाग के साथ लगातार संवाद करती हैं। यानी लंबी और हेल्दी जिंदगी के लिए मांसपेशियों की देखभाल किसी महंगी दवा से ज्यादा असरदार हो सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ बफेलो के डॉ. माइकल ला मोंटे ने 63 से 99 साल की 5,000 से ज्यादा महिलाओं पर रिसर्च की। नतीजों में सामने आया कि मांसपेशियों की मजबूती का सीधा संबंध लंबी उम्र से है। उम्र बढ़ने के साथ मसल्स का साथ बने रहना मौत के जोखिम को कम करता है।
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