बदल रही है ‘मर्दानगी’ की परिभाषा, पुरुष अब सौम्य-संवेदनशील:  ग्रूमिंग, बराबरी और भावनात्मक खुलेपन के साथ जनरेशन जी गढ़ रही है मर्द की नई पहचान
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बदल रही है ‘मर्दानगी’ की परिभाषा, पुरुष अब सौम्य-संवेदनशील: ग्रूमिंग, बराबरी और भावनात्मक खुलेपन के साथ जनरेशन जी गढ़ रही है मर्द की नई पहचान

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सुबह के आठ बजे हैं। बेंगलुरु के सरजापुर रोड में रहने वाले 35 वर्षीय आईटी इंजीनियर आदित्य मेहरा आईने के सामने स्किन क्रीम लगा रहे हैं। उनकी ड्रेसिंग टेबल पर बीबी क्रीम, फेशियल और सनस्क्रीन जैसे कई आइटम हैं जिन्हें वे नियमित इस्तेमाल करते हैं। आदित्य ने दफ्तर के लिए तैयार होने से पहले अपनी पत्नी और खुद के लिए ब्रेकफास्ट बनाया, बेटी का टिफिन तैयार किया और उसे स्कूल बस तक छोड़कर भी आए। उनकी पत्नी निशा भी आईटी कर्मचारी हैं जो इस दौरान लैपटॉप पर अपना जरूरी काम कर रही थीं। आदित्य बदलते भारतीय पुरुष वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सिर्फ ‘रफ एंड टफ’ नहीं, बल्कि सजग और आत्मविश्वासी भी है। सिनेमा – ‘मर्द’ की नई छवि जिसे दर्द होता है और रोता भी है फिल्में समाज का आईना हैं। एक समय था जब अमिताभ बच्चन की फिल्मों में ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसे संवाद पुरुषत्व का प्रतीक थे। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। शाहरुख खान जैसे अभिनेता संवेदनशील, भावनात्मक पुरुष के किरदार में लोकप्रिय हो रहे हैं। अब मर्द को दर्द भी होता है और मर्द रोता भी है। धुरंधर फिल्म में आक्रामक रणवीर सिंह भी रोते नजर आए हैं। मिलेनियल डैड – अब निभा रहे घर की जिम्मेदारी में साझेदारी भारत के ‘मिलेनियल डैड’ के बीच व्यवहार और जिम्मेदारियों में भी बदलाव दिख रहा है। मुंबई स्थित पोद्दार इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन के सर्वे और अर्थशास्त्री अश्विनी देशपांडे की एक स्टडी के मुताबिक पुरुष घर के कामों और बच्चों की परवरिश में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक विशेष रूप से कोविड-19 के बाद भारतीय पुरुष घरेलू कामों में पहले से ज्यादा समय दे रहे हैं। ग्रूमिंग अब शौक नहीं, पुरुषों की नियमित दिनचर्या का हिस्सा भारतीय पुरुषों के बीच पर्सनल ग्रूमिंग रोजमर्रा की जरूरत बन रही है। एक सर्वे के मुताबिक देश में 15 से 59 वर्ष के पुरुष पर्सनल केयर पर महिलाओं से सप्ताह में औसतन 43 मिनट ज्यादा खर्च करते हैं। गोदरेज प्रोफेशनल के नेशनल टेक्निकल हेड शैलेश मूलया कहते हैं, ‘अब पुरुष सनस्क्रीन, नाइट क्रीम, हेयर वैक्स और स्किन ट्रीटमेंट जैसी एडवांस केयर को भी अपनी दिनचर्या में शामिल कर रहे हैं।’ कठोर और बेपरवाह मर्द से देखभाल करने वाले पुरुष तक, असली मर्द की परिभाषा में आ रहा बड़ा बदलाव भोपाल स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. विनय मिश्रा कहते हैं, ‘समाज ने कुछ ऐसे आदर्श बना दिए हैं, जैसे- मर्द को दर्द नहीं होता या आंसू बहाना औरतों का काम है। इससे पुरुषों के बीच मर्दानगी की गलत परपंरा पनपती है। लेकिन आज की पीढ़ी इससे बाहर निकलकर पुरुषों की पारपांरिक छवि को तोड़ रही है।’ आधुनिक भारतीय पुरुष – मानसिक स्वास्थ्य को महत्व देता है। – परिवार में बराबरी का माहौल बनाता है – भावनाओं को व्यक्त करने से नहीं डरता – महिलाओं की स्वतंत्रता को स्वीकारता है – अपने सपनों के साथ-साथ परिवार के सपनों का भी ख्याल रखता है इप्सॉस इंडिया की हेड ऑफ क्वालिटेटिव रिसर्च गीतिका सिंह बताती हैं कि आज के दौर में मर्दानगी के अनेक रूप उभर रहे हैं। आधुनिक पुरुष महत्वाकांक्षा, आत्म-देखभाल, शक्ति और संवेदनशीलता, तथा अधिकार और साझेदारी के बीच संतुलन बना रहा है। सजने-संवरने में अधिक रुचि आत्म-अभिव्यक्ति में आत्मविश्वास को दर्शाती है, वहीं घरेलू कार्यों में बढ़ती भागीदारी अधिक समतावादी संबंधों का संकेत देती है। भावनात्मक रूप से भी पुरुष तनाव, कमजोरी और दुख को स्वीकार करने में अधिक सहज महसूस कर रहे हैं। महिलाओं की नजर में घर की देखभाल करने वाले आदर्श पुरुष बदलती मर्दानगी का सबसे स्पष्ट संकेत महिलाओं की पसंद में भी दिखता है। मार्केट रिसर्च फर्म इप्सोस के हालिया सर्वे के मुताबिक, ‘महिलाएं पुरुषों में लचीलेपन, जिम्मेदारी और शक्ति के साथ-साथ सहानुभूति और देखभाल जैसे गुणों को महत्व देती हैं। जो पुरुष बच्चों की देखभाल करते हैं या घर के कामों में सहभागिता करते हैं, उन्हें अक्सर अधिक आकर्षक माना जाता है।



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