बहस में गुस्सा क्यों बढ़ता है:  पहचान पर चोट लगे तो जिद बनती है ढाल, असहमति को दिमाग अपमान समझता है; दूसरों की राय बदलनी है तो पहले खुद बदलें
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बहस में गुस्सा क्यों बढ़ता है: पहचान पर चोट लगे तो जिद बनती है ढाल, असहमति को दिमाग अपमान समझता है; दूसरों की राय बदलनी है तो पहले खुद बदलें

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आपने कई बार गौर किया होगा कि परिवार या दोस्तों के साथ किसी सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक मुद्दे पर बहस करते समय अचानक गला सूखने लगता है। गुस्सा बढ़ने लगता है। ऐसा क्यों होता है? मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि इसकी वजह ​हमारा दिमाग है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक कीथ बेलिजी के अनुसार, असहमति को दिमाग खतरे की तरह लेता है। जब हमारी मान्यता या विश्वास को चुनौती मिलती है, तो दिमाग उसे हमला मान लेता है और मस्तिष्क रक्षात्मक (सर्वाइवल मोड) हो जाता है, जिससे जिद हमारी ढाल बन जाती है। होप कॉलेज के मनोवैज्ञानिक डेरिल वैन टोंगेरेन बताते हैं कि हर व्यक्ति की राय अकसर सिर्फ विचार नहीं, बल्कि उसकी पहचान का हिस्सा होती है। जैसे- ये सोच कि मैं अच्छा इंसान हूं या मेरी विचारधारा श्रेष्ठ है। पहचान से जुड़ी होती हैं राय कई बार विचार सिर्फ राय नहीं होते, वे हमारी पहचान और आत्मसम्मान से जुड़े होते हैं। इसलिए विरोध होने पर भावनाएं तीखी हो जाती हैं। ऐसे में जब विश्वास को चुनौती मिलती है, तो व्यक्ति खुद को खतरे में मानने लगता है। इसी कारण लोग तथ्यों के सामने आने पर गलती मानने के बजाय आक्रामक हो जाते हैं। इसे ‘बैकफायर इफेक्ट’ कहते हैं। जिद एक मानसिक बचाव तंत्र है मनोवैज्ञानिक डेरिल वैन टोंगेरेन बताते हैं कि जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी सोच पर हमला हो रहा है, तो वह और अधिक अपनी बात पर अड़ जाता है। यही कारण है कि सीधे आंकड़े या प्रमाण देने से अकसर राय नहीं बदलती है, बल्कि सामने वाला और जिद पकड़ लेता है। ऐसे में सुरक्षित और सम्मानजनक संवाद जरूरी है। ऐसा माहौल जहां व्यक्ति बिना डर के अपनी बात रख सके, जिद को कम करता है। ऐसे मामलों में खुले सवाल जैसे- आप ऐसा क्यों सोचते हैं, ज्यादा कारगर होते हैं। ये बातचीत को आगे बढृाते हैं और टकराव से समझदारी की ओर ले जाते हैं। बेलिजी कहते हैं कि विनम्रता से ही बदलाव की शुरुआत की जा सकती है। खुले सवाल पूछिए- ‘आप ऐसा क्यों सोचते हैं’ कुछ स्टडी से पता चला है कि किसी को गलत साबित कर शर्मिंदा करना उसे आपसे दूर तो कर सकता है, लेकिन उसकी सोच नहीं बदल सकता। विशेषज्ञों ने कुछ तरीके सुझाए हैं। तथ्य बनाम भावना: केवल आंकड़े देने से बात नहीं बनती। सामने वाले की भावनाओं को समझना और उसे सुरक्षित महसूस कराना जरूरी है। सुरक्षित माहौल: बदलाव तभी संभव है, जब बातचीत का माहौल डराने वाला न हो। सुरक्षित महसमस होने पर ही व्यक्ति का दिमाग नए विचारों को स्वीकार करता है।



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