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- Boria Majumdar Column | India Must Look Beyond Asian Commonwealth Games
7 घंटे पहले
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बोरिया मजुमदार सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा के सहलेखक और खेल पत्रकार
भारतीय एथलेटिक्स महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और ओलिम्पियन डॉ. एडिल जे. सुमरिवाला ने भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन का स्तर उठाने के लिए एक अच्छा सुझाव दिया है, जिस पर ध्यान देना चाहिए। वे कहते हैं कि हमें राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में पदक जीतने पर नकद प्रोत्साहन राशि देनी बंद कर देनी चाहिए।
अब हमारा लक्ष्य ओलिम्पिक खेल होने चाहिए। उनका यह सुझाव ऐसे समय आया है, जब हाल के राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए सरकारों द्वारा भारी-भरकम पुरस्कारों की घोषणाओं की खबरें सामने आई हैं।
एडिल कहते हैं, ऐसा नहीं है कि हमारे खिलाड़ियों का ध्यान नहीं रखा जाता। खेल मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं के तहत उन्हें पर्याप्त सुविधाएं और सहायता दी जाती हैं। अगर उन्हें कोई प्रोत्साहन राशि दी भी जानी है, तो वह ओलिम्पिक और हर दो साल में होने वाली विश्व चैम्पियनशिप के लिए ही दी जानी चाहिए। ये ही सर्वोच्च स्तर की प्रतियोगिताएं हैं और हमें इन्हें ही लक्ष्य बनाना चाहिए। हमें अब अपना स्तर ऊंचा उठाकर राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों से आगे बढ़ना चाहिए।
इस बात में तो कोई संदेह नहीं हो सकता कि वैश्विक प्रतियोगिताओं में श्रेष्ठ प्रदर्शन ही खेलों में हमारा सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। अगर ओलिम्पिक के लिए प्रोत्साहन राशि बढ़ा दी जाती है तो भी कोई हर्ज नहीं। लेकिन हमारा मानक ओलिम्पिक ही होना चाहिए, उससे कम कुछ नहीं।
एडिल का सुझाव इसलिए क्रांतिकारी है, क्योंकि इसका मकसद उत्कृष्टता के वास्तविक स्तर तक पहुंचना है। हम देख रहे हैं कि भारतीय खिलाड़ियों के लिए अब राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में पदक हासिल करना उतना मुश्किल नहीं रह गया है।
वे इन प्रतियोगिताओं में अपनी क्षमता साबित कर चुके हैं और इनमें जीतने का पर्याप्त अनुभव भी हासिल कर चुके हैं। अगर उन्हें वास्तव में अपनी उपलब्धियों को निर्णायक बनाना है, तो ओलिम्पिक स्तर पर ऐसा करके दिखाना होगा।
कुछ खिलाड़ियों के चोटिल होकर प्रतियोगिता से हट जाने के मामलों की भी गहराई से जांच करके यह पता लगाया जाना चाहिए कि आखिर गड़बड़ी कहां हुई। साथ ही, खिलाड़ियों तथा कोचों को अधिक जवाबदेह बनाना भी जरूरी है।
सवाल यह है कि क्या एशियाई खेलों में पदक जीतने के लिए खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि के रूप में नगद पैसा दिए जाने की जरूरत है? आज तो खिलाड़ियों को एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों में सिर्फ प्रतिस्पर्धा करने के लिए भी प्रोत्साहन राशि मिल रही है।
इसके चलते यह भी देखा जाता है कि कुछ खिलाड़ी चोटिल होने के बावजूद अपनी खराब फिटनेस को छिपाते हैं और प्रतियोगिता में हिस्सेदारी करते हैं। उनके कोच इस पर जोर देते हैं कि चोट मामूली है और प्रतियोगिता से पहले खिलाड़ी अपनी फिटनेस पा लेगा। हाल ही में जापान के नागोया में हुए एशियाई खेलों में भी यह देखा गया था। यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि इसकी पुनरावृत्ति न हो।
यह भी देखा जाता है कि खिलाड़ी पर्याप्त मेहनत से प्रशिक्षण नहीं लेते और एशियाई खेलों या राष्ट्रमंडल खेलों के स्तर पर जीत हासिल करके ही संतुष्ट रहते हैं। दरअसल, हमारे कुछ विदेशी कोचों ने यह शिकायत भी की है कि हमारे खिलाड़ी अगले एशियाई खेलों के लिए अभी से खुद को बचाकर रखने की कोशिश में जुट जाते हैं। जबकि खिलाड़ी के लिए सबसे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का सम्मान होना चाहिए।
मैं राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में केवल भाग लेने के लिए खिलाड़ियों को पैसे न देने और पुरस्कारों की राशि घटाने के उपरोक्त सुझावों से पूरी तरह सहमत हूं। इससे खिलाड़ियों को चोट के बावजूद प्रतियोगिता में जाने का मामूली-सा जोखिम लेने से रोका जा सकेगा।
यदि खिलाड़ी और कोच जानते हों कि वहां कोई पैसा नहीं मिलने वाला है और इसके उलट चोटिल होने के बावजूद प्रतियोगिता में जाने पर खिलाड़ी और कोच से जवाब-तलब भी किया जा सकता है, तो जापान में ज्योति याराजी और प्रवीण चित्रवेल के मामले में जो हुआ, उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी। इन दोनों ही खिलाड़ियों ने जापान पहुंचने के बाद चोटों के कारण खेलने में असमर्थता जता दी थी!
देखा जाता है कि खिलाड़ी एशियाई या राष्ट्रमंडल खेलों के स्तर पर जीत हासिल करके ही संतुष्ट रहते हैं। यह शिकायत भी मिली है कि खिलाड़ी अगले एशियाई खेलों के लिए अभी से खुद को बचाकर रखने की कोशिश में जुट जाते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








