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मनोज जोशी का कॉलम: यूएस और इजराइल के चुनावों से तय होगी युद्ध की तस्वीर

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5 घंटे पहले

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मनोज जोशी विदेशी मामलों के जानकार - Dainik Bhaskar

मनोज जोशी विदेशी मामलों के जानकार

अमेरिका और इजराइल कथित तौर पर नवंबर की शुरुआत में ईरान पर नए सिरे से हमले की योजना बना रहे हैं। अब तक ईरानी सेना को भारी नुकसान पहुंचाने और नौसैनिक नाकेबंदी के जरिए दबाव बनाने के बावजूद अमेरिका ईरान से अपनी मांगें नहीं मनवा पाया है। अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि नए हमलों से क्या हासिल हो पाएगा। इससे मध्य-पूर्व में व्यापक तबाही जरूर हो सकती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने हमले पर चर्चा के लिए हाल ही में बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात की थी। इस बीच, अमेरिका ने हमले के लिए बड़ी सेना भी जुटा ली है। लेकिन हमले के लिए ट्रम्प की मंजूरी जरूरी होगी और वे असमंजस में हैं।

नए हमले ईरान के ऊर्जा ढांचों, परमाणु ठिकानों के साथ उसके ड्रोन और मिसाइल भंडारों पर हो सकते हैं। अमेरिका और इजराइल को उम्मीद है कि बड़े पैमाने पर एक और हमला ईरान को आखिरकार उनकी मांगें मानने को मजबूर कर देगा, खासकर परमाणु कार्यक्रम के मसले पर।

इधर ईरान भी साफ कर चुका है कि वह मध्य-पूर्व में अमेरिकी ठिकानों को और आक्रामक तरीके से निशाना बनाएगा, अमेरिकी युद्धपोतों को डुबोने की कोशिश करेगा और सऊदी अरब जैसे देशों के ऊर्जा ढांचे, हवाई अड्डों और तेल पाइपलाइनों पर हमले करेगा, जिससे तेल कीमतें उछल सकती हैं।

वास्तव में, ईरान ने अपने हालिया मिसाइल हमलों में पहले की तुलना में अधिक क्षमता प्रदर्शित की है। इनमें जुलाई में जॉर्डन स्थित मुवफ्फक सल्ती एयरबेस पर किया गया हमला शामिल है। सितंबर के हमलों में तो ईरानी मिसाइलें अमेरिकी युद्धपोतों के काफी करीब पहुंच गई थीं। विश्लेषकों का कहना है ईरान के पास अब भी हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें हैं और उसने इनका उत्पादन फिर शुरू कर दिया है।

अमेरिका अब मान रहा है कि ईरानी हमलों ने उसके एयरबेस, दूतावासों और बहरीन स्थित पांचवें बेड़े के मुख्यालय को काफी नुकसान पहुंचाया है। हमलों में यूएई और कतर के ऊर्जा एवं औद्योगिक ठिकानों तथा दुबई, कुवैत, बहरीन के हवाई अड्डों को भी निशाना बनाया गया। अब ईरान का लक्ष्य पड़ोसी देशों को और नुकसान पहुंचाना होगा।

पिछले हफ्ते इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के एक कमांडर ने कहा कि ईरान होर्मुज के नीचे से गुजरने वाली इंटरनेट केबलों को काट सकता है। इससे ज्यादातर खाड़ी देशों में कनेक्टिविटी ब्लैकआउट हो सकता है, हालांकि कुछ देशों के पास जमीनी रास्तों के जरिए वैकल्पिक नेटवर्क भी हैं।

सऊदी अरब और यूएई में अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के क्लाउड तथा एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रभावित हो सकते हैं। वित्तीय और बैंकिंग लेन-देन धीमे हो सकते हैं। भारत पर भी इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि बैंडविड्थ का एक बड़ा हिस्सा गल्फ-मुम्बई कॉरिडोर से होकर ही गुजरता है।

कुछ ही दिनों पहले ईरान की संसद ने देश के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के प्रमुख योजनाकार मेहरदाद अखलाघी को रक्षा मंत्री नियुक्त किया। पद संभालते ही अखलाघी ने कहा कि उनका फोकस नई तकनीकों पर रहेगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने मीडिया में प्रकाशित एक लेख में कहा है कि ‘नए हमले नागरिकों के जीवन, क्षेत्र के सभी देशों की खुशहाली और अर्थव्यवस्था को जोखिम में डाल देंगे।’

राजनीतिक रूप से देखें तो ये हमले उन परिस्थितियों में होने वाले हैं, जो तेजी से बदल सकती हैं। इजराइल के चुनावों में बेंजामिन नेतन्याहू की हार भी संभव है और अमेरिका में 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों में ट्रम्प को कोई बड़ा नुकसान हुआ तो सत्ता पर उनकी पकड़ कमजोर पड़ सकती है।

बड़ा सवाल यह है कि क्या हमलों का एक और दौर वह नतीजा हासिल कर सकता है, जो महीनों के सैन्य दबाव के बावजूद हासिल नहीं हो पाया? नतीजे में किसी राजनीतिक समझौते के बगैर हुए युद्ध की कीमत बहुत बड़ी होगी। यदि अमेरिका के पास कूटनीतिक समाधान तक पहुंचने की विश्वसनीय योजना नहीं है तो नए हमले से संघर्ष के सुलझने के बजाय और गहराने का जोखिम है। इसकी कीमत पूरे क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ सकती है। हमें याद रखना होगा कि सैन्य श्रेष्ठता अपने आप राजनीतिक जीत की गारंटी नहीं होती।

इजराइल के चुनावों में नेतन्याहू की हार संभव है और अमेरिका में 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों में ट्रम्प को कोई बड़ा नुकसान हुआ तो सत्ता पर उनकी पकड़ भी कमजोर पड़ सकती है। इन परिणामों का मध्य-पूर्व में होने जा रहे आगामी किसी भी युद्ध पर असर पड़ेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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