मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:  अमेरिका से ट्रेड डील में अब सूत्र हमारे हाथों में आ गए हैं
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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम: अमेरिका से ट्रेड डील में अब सूत्र हमारे हाथों में आ गए हैं

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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा मनमाने टैरिफ को अवैध घोषित करने से ट्रम्प नाराज हैं। इधर भारत की व्यापार वार्ता टीम ने लंबे समय से लम्बित ट्रेड डील को अंतिम रूप देने के लिए प्रस्तावित वॉशिंगटन यात्रा रद्द कर दी है। ये देरी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में भारत के लिए परोक्ष तौर पर फायदेमंद हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रम्प टैरिफ को अवैध ठहराने के बाद अब व्हाइट हाउस को मजबूरन 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 का इस्तेमाल कर दुनिया के हर देश पर 15% टैरिफ लगाना होगा। धारा 122 अधिकतम 150 दिनों के लिए ही ऐसे टैरिफ की अनुमति देती है। इस अवधि में ट्रम्प प्रशासन उन देशों की जांच करेगा, जिन पर संदेह है कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा का उल्लंघन किया या अनुचित व्यापार व्यवहार अपनाया। यदि ट्रम्प प्रशासन अपने सबूतों से अदालत को संतुष्ट नहीं कर पाया तो 24 फरवरी 2026 से लागू 15% टैरिफ 24 जुलाई 2026 को समाप्त हो जाएंगे। इसके बाद अलग-अलग देशों पर लगाया टैरिफ घटकर उसी औसत दर पर आ जाएगा, जो अमेरिका ऐतिहासिक रूप से विदेशी निर्यातकों से वसूलता रहा है। ट्रम्प प्रशासन यह भी जांच रहा है कि क्या वह महामंदी के दौरान पारित 1930 के एक कानून की धारा 388 को लागू कर सकता है, जिसके तहत अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुंचाने के लिए अनुचित शुल्क लगाने वाले किसी देश पर 50% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। यह कानून पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है और इसे अदालत में चुनौती मिलनी तय है। उम्मीद के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भी ट्रम्प ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सोशल मीडिया पर भड़ास निकाली है। लेकिन ट्रम्प के सामने रिफंड की समस्या भी है। अमेरिकी सरकारी खजाने के अनुमान के अनुसार पिछले वर्ष से वसूले गए और अब अवैध घोषित हुए टैरिफ की कुल रिफंड राशि 175 अरब डॉलर से अधिक है। यह रिफंड किसे मिलेगा? ट्रम्प ने टैरिफ वॉर को अपने ‘मागा’ समर्थकों के बीच उन देशों के लिए दंड के तौर पर पेश किया था, जिन्होंने क​थित तौर पर ‘दशकों तक अमेरिका को लूटा था।’ उन्होंने ऐसा बताया जैसे ये टैरिफ विदेशी निर्यातक चुका रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि लगभग सभी टैरिफ अमेरिकी आयातकों ने चुकाए और इसका थोड़ा-बहुत बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी डाला। इसीलिए हाल के महीनों में अमेरिकी मॉल्स और रिटेल स्टोर्स में किराना और एफएमसीजी महंगे हो गए। ऐसे में रिफंड भी अमेरिकी आयातकों को ही मिलना चाहिए, जिसके लिए वे पहले ही निचली अदालतों में याचिकाएं दायर कर चुके हैं। भारत काफी हद इस मनमाने टैरिफ से अछूता रहा है। भारत पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ की अनुमानित राशि लगभग 450 मिलियन डॉलर है, जिसका लगभग पूरा भुगतान अमेरिकी आयातकों ने किया है। ये 450 मिलियन डॉलर, 175 अरब डॉलर की रिफंड राशि का मात्र 0.3% ही है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत की ट्रेड टीम को मजबूत हैसियत के साथ मोल-भाव का एक मौका देता है। पहले ट्रम्प ने रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर 25% अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ की तलवार लटका रखी थी। मनमाना प्रे​सिडेंशियल टैरिफ अवैध घोषित होते ही यह धमकी अब बेअसर हो गई है। भारत अब बिना किसी दबाव के उचित और समान शर्तों पर अमेरिका से बातचीत कर सकता है। इस फैसले के बाद अमेरिकी वार्ताकार अधिक सतर्क दिख रहे हैं। यूएस ट्रेड रिप्रजेंटेटिव ट्रेड डील को अंतिम रूप देने के लिए मार्च में भारत आ सकते हैं। यह अप्रैल से लागू हो सकती है। इस बीच भारत ट्रम्प के अगले कदम का इंतजार करेगा। बौखलाए ट्रम्प अभी कह रहे हैं कि ‘मैं जो चाहूं कर सकता हूं। किसी भी देश से आयात पर प्रतिबंध लगा सकता हूं।’ लेकिन वे जानते हैं कि उन्हें उसी कंजर्वेटिव सुप्रीम कोर्ट ने मात दे दी है, ​जिसे बनाने में उन्होंने मदद की थी। 2017-21 के अपने पहले कार्यकाल में ट्रम्प ने ही सुप्रीम कोर्ट में दक्षिणपंथी विचारधारा के इन न्यायाधीशों को नियुक्त किया था। यह संयोग ही है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसी दिन आया, जब भारत ‘पैक्स सिलिका’ का सदस्य बना। यह अमेरिका के नेतृत्व में ऐसे देशों का एक समूह है, जो एआई और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में चीन को चुनौती देने के लिए एक वैश्विक इको-सिस्टम तैयार कर रहे हैं। इसके अलावा दिल्ली में हुई एआई समिट की सफलता और भारत की तकनीकी क्षमता ने भी अमेरिका से ट्रेड डील के लिए हमारे वार्ताकारों को अतिरिक्त बढ़त दी है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारत की ट्रेड टीम को मजबूत हैसियत के साथ मोल-भाव का एक मौका देता है। मनमाना टैरिफ अवैध घोषित होते ही भारत अब बिना किसी दबाव के उचित और समान शर्तों पर बात कर सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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