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युद्ध, भू-राजनीतिक उथल-पुथल और आर्थिक तंगी के दौर में यह बड़ी आसानी से मान लिया जा सकता है कि प्रकृति का संरक्षण जरूरी तो है, लेकिन उसकी तत्काल कोई अनिवार्यता नहीं। इसे तो शांतिकाल में भी किया जा सकता है। यह सोच घातक है। इन सर्दियों में जब दुनिया के नेता संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों के लिए जुटेंगे तो उन्हें याद रखना चाहिए कि दुनिया की आधी से अधिक जीडीपी प्रकृति और उससे मिलने वाली सेवाओं पर निर्भर है। 9.5 ट्रिलियन डॉलर की ग्लोबल फूड इंडस्ट्री गुणवत्तापूर्ण मिट्टी पर टिकी है। 1.5 अरब लोगों की आजीविका वनों पर निर्भर है। नदियां बाढ़ के पानी को खुद में समेटकर परिवहन के महत्वपूर्ण नेटवर्क को बनाए रखती हैं। प्रकृति वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इसकी रक्षा करना राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पर्यावरण से जुड़े प्रश्न मध्य-पूर्व और यूक्रेन में युद्ध खत्म होने तक इंतजार नहीं करेंगे। इस गर्मी में यूरोप में सूखे के कारण 2 से 3 अरब डॉलर की फसलें खराब हुईं। यह किसानों के लिए दोहरी मार थी, क्योंकि इससे पहले होर्मुज बंद होने से फर्टिलाइजर की कीमतों में भी 71% की बढ़ोतरी हो गई थी। युद्ध और चरम-मौसम की घटनाओं के मिले-जुले असर ने वैश्विक खाद्य कीमतों को 2022 के बाद के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पारिस्थितिकी तंत्र के आंशिक रूप से ध्वस्त होने के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल 2.7 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। भू-राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद हम उन प्राकृतिक प्रणालियों को कमजोर करने का जोखिम नहीं उठा सकते, जिन पर हमारी अर्थव्यवस्थाएं निर्भर हैं। ‘30 बाय 30’ की पहल आज पहले से कहीं अधिक अहम हो गई है। इसके तहत 2030 तक दुनिया की कम से कम 30% भूमि और समुद्री क्षेत्र की रक्षा एवं संरक्षण का लक्ष्य है। प्रकृति की रक्षा करना संकटों को झेलने के सामर्थ्य और एकजुटता में निवेश करने जैसा है। यह खाद्य और जल सुरक्षा को सुदृढ़ करता है तथा जलवायु संकट से उबरने की क्षमता बढ़ाता है। साथ ही आजीविका, जनस्वास्थ्य और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को बनाए रखता है। वर्ष 2022 में सरकारों द्वारा ऐतिहासिक ‘कुनमिंग-मॉन्ट्रियल बायो-डायवर्सिटी फ्रैमवर्क’ के तहत अपनाया गया ‘30 बाय 30’ लक्ष्य यह मानता है कि प्रकृति का संरक्षण सार्वजनिक हितों से जुड़ी सुविधाएं मुहैया कराने में बुनियादी अहमियत रखता है। ‘30 बाय 30’ लक्ष्य की दिशा में दुनिया ने बीते चार वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। ‘कैम्पेन फॉर नेचर’ के नए विश्लेषण से पता चलता है कि अब भूमि और देशों की सीमाओं के भीतर स्थित जल क्षेत्रों (इनलैंड वॉटर्स) के 20% हिस्से को ‘प्रोटेक्टेड या कंजर्व्ड’ के तौर पर निर्धारित कर दिया गया है। मौजूदा प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह लागू किया तो 2030 तक यह हिस्सा बढ़कर लगभग 27% हो सकता है, जो लक्ष्य के काफी करीब होगा। हालांकि समुद्र के मामले में प्रगति काफी धीमी रही है। महासागरों के केवल 10% हिस्से को औपचारिक रूप से संरक्षण के लिए निर्धारित किया गया है। मौजूदा प्रतिबद्धताओं के अनुसार 2030 तक यह हिस्सा 12% तक ही बढ़ पाएगा। इससे भी बुरा यह है कि ‘टुगेदर फॉर द ओशन’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार समुद्र के केवल 3.5% हिस्से को ही प्रभावी रूप से संरक्षित माना गया है। ‘30 बाय 30’ लक्ष्य हासिल करने के लिए अब केवल चार साल बचे हैं। लेकिन फिर भी दुनिया के पास इस लक्ष्य को पूरा करने का अवसर है। यह इस दशक की सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक प्रतिबद्धताओं में से एक है। लेकिन सवाल है कि बीते समय की भरपाई के लिए हमें क्या करना होगा? सबसे पहले तो यही कि सरकारों को प्रकृति के संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी करनी होगी। ‘30 बाय 30’ लक्ष्य को पूरा करने के लिए हर साल लगभग 100 से 180 अरब डॉलर की जरूरत होगी, जबकि फिलहाल इस दिशा में सालाना केवल 24 अरब डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। हमें समझना होगा कि यह खर्च महज लागत नहीं, बल्कि एक निवेश है।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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