चुनावी और सांगठनिक समीकरण बनाने में माहिर माने जाने वाले भाजपा के यूपी के नए स्थायी प्रभारी विनोद तावड़े के सियासी कौशल की असली परीक्षा राज्य में होगी। भाजपा ने उन्हें बिहार के बाद यूपी की सियासत साधने की बड़ी जिम्मेदारी दी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब छह-सात महीने पहले उन्हें चुनावी तैयारियों की कमान सौंपी गई है। यूपी की चुनौती बिहार से कहीं अधिक बड़ी मानी जा रही है।
उन्हें सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं बनानी। संगठन और सरकार के नेताओं के बीच चल रहे शीतयुद्ध पर विराम लगाना भी बड़ी चुनौती है। इस स्थिति पर केंद्र और प्रधानमंत्री की सीधी नजर है। कार्यकर्ताओं में आपसी खींचतान से भी पार पाना होगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था। पार्टी 2019 की 62 सीटों के मुकाबले 33 सीटों पर सिमट गई। 2027 विधानसभा चुनाव संगठन के लिए वापसी का बड़ा अवसर है। तावड़े को कमजोर क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में पार्टी की पकड़ मजबूत करनी होगी।
सरकार-संगठन के बीच तालमेल बड़ी चुनौती
तावड़े के सामने पहली चुनौती सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है। प्रदेश के कई जिलों में कार्यकर्ताओं की अधिकारियों से काम न होने की शिकायतें आती रही हैं। नाराज या निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को चुनावी अवस्था में लाने के लिए संवाद तंत्र बनाना होगा। प्रदेश भाजपा में नेताओं के बीच खींचतान और गुटबाजी की चर्चा होती रही है। विधानसभा चुनाव से पहले टिकट और पद को लेकर दावेदारी बढ़ेगी। सभी धड़ों को साथ लेकर चलना और असंतोष को सार्वजनिक होने से रोकना बड़ी परीक्षा होगी।