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बचपन में मेरे मामा मुझे कहानी सुनाया करते थे कि ओडिशा के कोणार्क मंदिर के शिखर पर एक चुंबकीय पत्थर हुआ करता था। इस पत्थर की चुंबकीय शक्ति के कारण मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठापित मूर्ति फर्श से कुछ फुट ऊपर तैरती थी। इतना ही नहीं, यह पत्थर जहाजों को भी अपनी ओर खींचता था। इसलिए जहाज चट्टानों से टकराकर डूब जाया करते थे। विदेशी नाविक लगातार अपने जहाज खोने से तंग आ गए और उन्होंने इन घटनाओं की जांच की। अंत में, उन्होंने मंदिर का शिखर तोड़कर चुंबकीय पत्थर चुरा लिया, जिसके बाद मंदिर गिर गया। कई ओडिया यह रोचक लोककथा जानते हैं। सोशल मीडिया पर भी अनेक लोग इस पर विश्वास करते हैं और मानते हैं कि प्राचीन भारत का यह वैज्ञानिक ज्ञान हमने खो दिया है। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, वैसे-वैसे मुझे पता चला कि ओडिशा के बाहर भी इसी प्रकार की कहानियां सुनाई जाती हैं। उदाहरण के लिए, मंदिर के शिखर और फर्श के बीच तैरती देवता की मूर्ति की कहानी गुजरात के सोमनाथ मंदिर के बारे में भी कही जाती है। ऐसी लोकप्रिय काल्पनिक कथाओं को लोग लंबे समय से ऐतिहासिक घटनाएं मानते आए हैं। इसी तरह, यह विचार कि किसी देवता की मूर्ति या मंदिर के शिखर का पत्थर अपनी चुंबकीय शक्ति से जहाजों को आकर्षित करता था और वे डूब जाते थे, भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर भी मिलता है। गुजरात में वाहनवटी अर्थात सिकोतर देवी की कथा प्रचलित है। देवी समुद्र तट से लगे एक पहाड़ के शिखर पर विराजमान थीं। वहां से वे अपनी उग्र दृष्टि समुद्र की ओर डालती थीं, जिसके कारण जहाज डूब जाते थे। इसलिए व्यापारियों ने उनसे शिखर से नीचे उतरकर तल पर आने का निवेदन किया। देवी मान गईं। इस प्रकार, भारत के पूर्वी और पश्चिमी समुद्र तटों पर एक जैसी कहानियां मिलती हैं। दक्षिण भारत के तट पर स्थित कन्याकुमारी देवी की कथा भी इन कहानियों से मिलती-जुलती है। कहा जाता है कि देवी की चमकती हुई नथ से आकर्षित होकर जहाज अपनी दिशा बदल लेते थे और चट्टानों से टकराकर डूब जाते थे। इसे रोकने के लिए मंदिर के द्वार बंद कर दिए गए और जहाज सुरक्षित रहने लगे। यही कहानी श्रीलंका में भी मिलती है। वहां एक पहाड़ के शिखर पर स्थित देवता की मूर्ति जहाजों को अपनी ओर खींच लेती थी, जिससे वे डूब जाते थे। इसलिए पुर्तगाली नाविकों ने मूर्ति को वहां से हटाने की कोशिश की। लेकिन ऐसा करने पर भी जहाज मूर्ति की चपेट में आते रहे। अंततः नाविकों ने देवता की मूर्ति को वापस उसी स्थान पर स्थापित कर दिया। आज वह मूर्ति पहाड़ के शिखर पर नहीं, बल्कि उसके तल पर स्थित है। इस प्रकार, तैरती हुई मूर्तियों और मंदिरों या देवताओं के कारण जहाजों के डूबने की कहानियां भारत के लगभग सभी समुद्र तटों पर मिलती हैं। इससे स्पष्ट है कि ये कथाएं व्यापक रूप से लोकप्रिय थीं। समय के साथ इन्होंने आख्यानों का रूप ले लिया। ध्यान रहे कि इनमें वर्णित घटनाएं वास्तव में नहीं घटी थीं। दरअसल, इन कहानियों के माध्यम से यह दिखाया गया कि प्राचीन काल में भारत की व्यापारिक परंपरा कितनी शक्तिशाली थी। उपनिवेशवाद के दौर में अनेक भारतीयों ने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों को लेकर हीनभावना महसूस की। तब ऐसी कहानियों के सहारे हमने स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए, यह मान्यता प्रचलित है कि विज्ञान यह नहीं समझा सकता कि जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर ध्वज हवा की विपरीत दिशा में क्यों लहराता है, पक्षी शिखर के ऊपर क्यों नहीं उड़ते या मंदिर के शिखर की परछाई धरती पर क्यों नहीं पड़ती। लेकिन वैज्ञानिक इन सभी बातों की व्याख्या सरल वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर करते हैं। ध्वज कभी-कभी विपरीत दिशा में इसलिए लहराता दिखाई देता है क्योंकि उसकी ऊंचाई पर हवा भंवर की तरह घूमती हुई बहती है। पक्षी भी इसी कारण उस क्षेत्र से दूर रहते हैं। इस प्रकार, इन घटनाओं के पीछे कोई जादुई कारण नहीं है। ड्रोन से ली गई तस्वीरों में मंदिर की परछाई स्पष्ट दिखाई देती है। लेकिन चूंकि मंदिर ऊंची दीवारों से घिरा हुआ है, इसलिए यह परछाई अक्सर सामान्य दृष्टि से स्पष्ट नहीं दिखती। इसके बावजूद, लोग साधारण वैज्ञानिक कारणों की अपेक्षा गूढ़ और रहस्यमय व्याख्याओं से अधिक आकर्षित होते हैं। यदि मंदिरों को केवल विज्ञान की दृष्टि से समझा जाए तो वे लोगों को अपेक्षाकृत कम मोहक, कम शक्तिशाली और कम प्रभावशाली लग सकते हैं। फलस्वरूप, मंदिरों में तीर्थयात्रियों की संख्या घटने की आशंका रहती है, जबकि उन्हीं के दान से मंदिरों की अर्थव्यवस्था फलती-फूलती है। जो लोग मंदिरों से लाभ कमाते हैं, वे चाहते हैं कि हमारे देवता असाधारण और अलौकिक प्रतीत हों। आखिर मंदिर निर्माण से जुड़ा विज्ञान, उसका इतिहास, उसकी अद्भुत सौंदर्य कला और वास्तुकला उतनी रोमांचक नहीं लगती, जितनी उससे जुड़ी जादुई कहानियां। इसलिए हम उन कहानियों पर तथ्यों और विज्ञान की अपेक्षा अधिक सहजता से विश्वास कर लेते हैं। यह प्रवृत्ति केवल हिंदू ही नहीं, अन्य धर्मों में भी देखने को मिलती है। ,
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