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हड़प्पा सभ्यता की एक विशिष्टता यह थी कि वह वजन और मापन को बहुत महत्व देती थी। इस सभ्यता में व्यापार का महत्वपूर्ण स्थान था और विवाद से बचने के लिए सही तौल पर विशेष ध्यान दिया जाता था। लेकिन वजन और मूल्य एक ही बात नहीं हैं। बाद के साहित्य में इस अंतर को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।
खाद्य का मूल्य हमारी भूख पर निर्भर करता है। जितनी अधिक भूख होती है, भोजन का मूल्य उतना अधिक लगता है। बौद्ध, जैन और हिंदू परंपराओं में इस विचार को शिबि राजा की कहानी से समझाया गया है। कथा के अनुसार एक दिन राजा ने एक पंडुक (जंगली कबूतर) को गरुड़ का शिकार बनने से बचा लिया। तब गरुड़ ने राजा से कहा कि वे उसे भोजन दें, क्योंकि प्रकृति के नियम के अनुसार पंडुक उसका आहार था। इस पर राजा ने कहा कि वे गरुड़ को पंडुक के वजन के बराबर अपना मांस दे देंगे। राजा अपना मांस काटकर तराजू पर रखते गए, लेकिन उसका वजन पंडुक के बराबर नहीं हुआ। अंत में जब उनके शरीर में केवल हड्डियां ही बचीं, तब भी पंडुक का वजन अधिक ही रहा। कहानी के अंत में सभी लोग राजा के बलिदान की प्रशंसा करते हैं। लेकिन अक्सर लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते कि राजा का मांस गरुड़ की भूख को मिटा नहीं सका। राजा को उम्मीद थी कि इसके बाद गरुड़ पंडुक का शिकार करना छोड़ देगा। लेकिन गरुड़ ने राजा के मांस को मूल्यवान नहीं माना, क्योंकि वह मांस केवल एक बार की भूख मिटाने के लिए पर्याप्त था, हमेशा के लिए नहीं।
भागवत पुराण की एक कथा के अनुसार नारद मुनि ने कृष्ण की पत्नियों से कहा कि वे उन्हें कृष्ण दे दें। सभी पत्नियों ने यह मांग अस्वीकार कर दी। तब नारद मुनि ने उनसे कहा कि वे कृष्ण के बराबर मूल्य की कोई वस्तु दे दें। कृष्ण को तराजू के एक पलड़े पर और पत्नियों के गहनों को दूसरे पलड़े पर रखा गया। सत्यभामा ने अपने सारे गहने उस पलड़े में रख दिए, लेकिन वह सोना कृष्ण के बराबर भारी नहीं हुआ। तब रुक्मिणी ने तुलसी के पत्तों की एक टहनी रखी और कहा कि यह टहनी कृष्ण के प्रति उनके प्रेम का प्रतीक है। आश्चर्य की बात यह थी कि वह तुलसी की टहनी कृष्ण से भी भारी हो गई। इस कथा का अर्थ यह है कि रुक्मिणी के प्रेम का प्रतीक बनी वह तुलसी की टहनी सोने से अधिक मूल्यवान थी। इससे स्पष्ट होता है कि किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति हमारा प्रेम कई बार उस वस्तु या व्यक्ति से भी अधिक मूल्यवान हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि रुक्मिणी का कृष्ण के प्रति प्रेम स्वयं कृष्ण से भी श्रेष्ठ है। हम चाहे कितनी ही संपत्ति क्यों न प्रस्तुत करें, वह किसी व्यक्ति या वस्तु के वास्तविक मूल्य के बराबर नहीं हो सकती। भोजन के लिए हमारी भूख और प्रेम के लिए हमारी लालसा ऐसी चीजें हैं जिनका कोई निश्चित मूल्य तय नहीं किया जा सकता। भारत में जन्मी धार्मिक परंपराओं में निर्वस्त्र ‘दिगम्बर’ को सर्वोच्च माना गया है। इसका कारण यह है कि उसके लिए संपत्ति का कोई महत्व नहीं होता और वह कुछ पाने की इच्छा भी नहीं रखता। लेकिन आधुनिक दुनिया संतुष्टि को नहीं, उपभोग को अधिक महत्व देती है। इसलिए आधुनिक समाज के लिए ऐसी सोच को समझना कठिन हो जाता है। लेकिन केवल इच्छाओं के पीछे भागने और नई-नई चीजों को मूल्यवान घोषित करने से दुनिया बेहतर नहीं बन सकती। इसके साथ साथ हमें अपनी भूख और इच्छाओं को नियंत्रित करने या उनसे ऊपर उठने का प्रयास भी करना होगा। मनुष्य की कल्पनाशक्ति किसी भी वस्तु को मूल्यवान बना सकती है, चाहे वह सोना हो या फिर कागज का एक साधारण टुकड़ा। लेकिन मनुष्य में यह क्षमता भी है कि वह मूल्य की इस खोज से ऊपर उठ सके। जब तक हम प्रकृति से लगातार अधिक से अधिक मूल्य निकालने की कोशिश करते रहेंगे, तब तक भूखे और असंतुष्ट बने रहेंगे। उपनिषद का महावाक्य ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इसी ओर संकेत करता है कि मूल्य बनाने और उसे पहचानने, दोनों की क्षमता मनुष्य में ही निहित है। बचपन में जो चीजें हमें बहुत मूल्यवान लगती हैं, जैसे परीक्षा का रिपोर्ट कार्ड, वे बुढ़ापे में महत्वहीन हो जाती हैं। यदि हम युवावस्था में धन कमाते हैं, तो वृद्धावस्था में हमें उसी धन को बांटना भी सीखना चाहिए। बचपन में हम गरुड़ की तरह भूखे और इच्छाओं से भरे होते हैं, लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे हमें शिबि की तरह उदार और बुद्धिमान बनना चाहिए। जीवन के किसी चरण में सत्यभामा की तरह सोना महत्वपूर्ण लग सकता है, लेकिन अंततः जीवन हमें उस मोड़ पर ले आता है जहां रुक्मिणी की तुलसी सबसे अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है।
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