रूमी जाफरी36 मिनट पहले
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: सलीम और सलमान खान
मेरे हिस्से के किस्से में आज बात सलीम-जावेद की जोड़ी के सलीम खान साहब की। इन्हें मैं प्यार और सम्मान से हमेशा सलीम अंकल ही कहता हूं।
बात शायद 1992-93 की है। मेरे एक दोस्त हैं रफी काजी (जो सलमान खान के बचपन के दोस्त और जॉनी वॉकर के भाई के बेटे हैं)। वे मेरे पास आए और बोले, ‘रूमी भाई, मैंने एक फिल्म शुरू की है। काफी शूटिंग हो चुकी है। फिल्म का नाम था बुलंद। उसके डायरेक्टर शहनवाज हैं और राइटिंग में कुछ आपकी मदद चाहिए। चूंकि स्टोरी सलमान खान की लिखी हुई है, तो आप सलमान के घर चलकर उनसे मिल लीजिए और स्टोरी डिस्कस कर लीजिए।’
रफी मुझे पहली बार सलमान के घर लेकर गए। सलमान के घर में दाखिल होते ही मुझे पहले सलीम अंकल मिले। मैंने सलाम करके बताया कि मैं राइटर हूं, तो उन्होंने मुझे बहुत इज्जत दी। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं भोपाल से हूं तो वे बेहद खुश हुए। मैं सलमान के साथ स्क्रिप्ट डिस्कस करने आया था, लेकिन सलीम अंकल के साथ भोपाल और इंदौर डिस्कस करने लग गया। सलीम अंकल की बड़ी बहन की शादी भोपाल में हुई थी, इसलिए उनका भोपाल में काफी रहना हुआ था। वे मुझे भोपाली किस्से सुनाने लगे और मैं उन्हें। इतने में सलमान आ गए। रफी ने मेरा परिचय सलमान से कराया, तो सलीम अंकल ने कहा, ‘भाई, ये राइटर तो हैं ही, मगर ये भोपाल के हैं और हमारे पूरे खानदान को जानते हैं।’
जिस फिल्म के लिए गया था, वह तो नहीं बनी, मगर खान परिवार से मेरा रिश्ता जरूर बन गया। भोपाली होने का यह फायदा हुआ कि पहली मुलाकात में ही मैं उनका फैमिली मेंबर हो गया और एक हसीन मजाक का रिश्ता बन गया, जो आज तक बरकरार है। इसी बात पर मुझे इब्न-ए-मुफ्ती का एक शेर याद आ रहा है:
सच के धागे से जो बने रिश्ता उम्र भर उस्तवार रहता है।
इन सालों में सलीम अंकल से बहुत कुछ सीखने को मिला है। फिल्म इंडस्ट्री में सबको पता है कि सलीम साहब के घर का दरवाजा हर वक्त खुला रहता है। कोई अपॉइंटमेंट की जरूरत नहीं, कोई पूछताछ नहीं। आप घर में दाखिल हो जाइए। अगर भूख लगी है तो डाइनिंग टेबल पर बैठ जाइए। नौकर अपने आप समझ जाते हैं, खाना लगा देते हैं। आप बैठकर खाना खा लीजिए। यह परंपरा सलीम साहब की जवानी से आज तक जारी है। अभी कुछ कारणों से सिक्योरिटी सख्त हो गई है, मगर खाना-पीना आज भी वैसे का वैसा ही है।
एक बार अरबाज खान के साथ उनके एक दोस्त घर आए। खाना खाया। उन्हें देर हो गई, तो बोले, ‘अब इतनी रात में घर क्या जाऊं, यहीं सो जाता हूं।’ और वे वहीं सो गए। सुबह उठे, सलीम अंकल के साथ वॉक पर गए। लौटे, शाम हो गई, फिर खाना खाया और सो गए। अगले दिन फिर उठे और सलीम अंकल के साथ वॉक पर गए। धीरे-धीरे पूरे परिवार में घुल-मिल गए। वे कुछ घंटों के लिए आए थे, मगर तकरीबन दो महीनों तक घर नहीं गए। उनका कहना था, ‘आपके परिवार में ऐसा लगता ही नहीं कि मैं किसी और के घर पर आया हूं। ऐसा लगता है जैसे अपने ही परिवार में रह रहा हूं।’ आज तक वे परिवार का हिस्सा हैं।
एक बार तो हद तब हो गई, जब सलमान ने सलीम अंकल के नीचे वाला वन बेडरूम हॉल खरीद लिया, जिसमें जिम है। रात को उस फ्लैट में पार्टी चल रही थी। दो लड़के खूब पी रहे थे, मस्ती कर रहे थे। काफी देर बाद लगा कि घर में कोई भी इन्हें नहीं जानता। तब उनसे पूछा गया, ‘आप किसके साथ हैं?’ वे बोले, ‘हमने सुना था कि सलमान के घर चले जाओ, कोई रोकता नहीं है, बल्कि खाने-पीने को मिलता है। इसलिए हम आ गए।’ सचमुच, उन्हें न किसी ने रोका, न खाने पीने से टोका। अब जब पूछा गया, तो सिक्योरिटी वाले गुस्सा होकर उन्हें निकालने लगे। तब सलमान ने कहा, ‘रुको। इन्हें पता था कि यहां खाना-पीना फ्री मिलता है। इनका पीना तो हो गया, अब इनका खाना भी हो जाए, उसके बाद इन्हें रवाना करना।’ इसका क्रेडिट सलीम अंकल को जाता है। उन्होंने घर में ऐसी शिक्षा दी है, ऐसी मेहमाननवाजी सिखाई है। पूरे घर का दिल बहुत बड़ा है और बहुत लोगों को निभाने वाला है। सोचिए, गैरों को भी खिला दिया।
17 फरवरी को सलीम अंकल काफी बीमार हो गए थे। लीलावती अस्पताल में उन्हें एडमिट किया गया। 18 तारीख को उनका ऑपरेशन हुआ। मैं भी अस्पताल में मौजूद था। अब वे बिल्कुल ठीक हैं। मैं दुआ करता हूं कि ऊपरवाला उन्हें लंबी उम्र दे। आने वाले वक्त में उनके बहुत सारे किस्से आप लोगों के साथ साझा करूंगा। एक बात और बता दूं, सलीम अंकल के करीबी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें गाना गाने का शौक है और वे बहुत अच्छा गाते हैं। खास तौर पर रफी साहब का एक ऊंची रेंज वाला गाना वे बखूबी गा लेते हैं : ‘ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले…।’ हम लोगों ने कई बार उनसे यह गाना सुना है। आज आप लोग भी सलीम अंकल की पसंद का यह गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।









