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रीटा कोठारी का कॉलम: हमारे सामूहिक-विवेक को जगाती थीं पहले की फिल्में

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5 घंटे पहले

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रीटा कोठारी अशोका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर और भाषाविद् - Dainik Bhaskar

रीटा कोठारी अशोका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर और भाषाविद्

बंटवारे पर एक कोर्स पढ़ाते समय मुझे यश चोपड़ा की फिल्म ‘धर्मपुत्र’ (1961) की याद आई और साहिर के गानों को सुनकर उसमें निहित दर्द और क्रोध की भावना को समझा। बंटवारे का साया कई फिल्मों पर दिखाई देता है। फिल्म इंडस्ट्री के बहुत से लोग बंटवारे से सीधे तौर पर प्रभावित हुए थे।

बंटवारे ने जो असर डाला, उसका फिल्मों में हमेशा ऐतिहासिक नजरिए से ही चित्रण नहीं किया गया है। गीतकारों, निर्देशकों और कहानीकारों ने इस उथल-पुथल पर दोस्ती, टूटे रिश्तों, रोमांस, शक-ओ-शुबहा और नफरत से हुई तबाही की कहानियां सुनाकर प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने ऐसे गाने भी बनाए, जो साझा संस्कृति को दिखाते थे। मसलन, ‘धर्मपुत्र’ की ही यह कव्वाली, जिसे बलबीर और महेंद्र कपूर ने गाया था : ‘काबे में रहो या काशी में / निस्बत तो उसी की जात से है / तुम राम कहो के रहीम कहो / मतलब तो उसी की बात से है / यह मस्जिद है वह बुतखाना / चाहे ये मानो चाहे वह मानो!’

इस गाने के विजुअल्स पोस्टरों जैसे हैं, जिनमें कुछ लोग साफ तौर पर मुस्लिम और कुछ साफ तौर पर हिंदू दिखते हैं और बारी-बारी से गाना गाते हैं। हमें बताया जाता है कि काबा और काशी, राम और रहीम, मस्जिद और मंदिर एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, क्योंकि ‘मतलब तो उसी की बात से है।’ आस्था का मकसद एक ही है, चाहे हम किसी को भी मानें। यह आप पर है कि आप किस पर यकीन करते हैं।

इसे बॉलीवुड के उस सेकुलरिज्म के एक रूप के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भावनात्मक जुड़ाव दिखता है। इस तरह के गानों की एक और खासियत यह है कि इन्हें अक्सर सूफी दरगाहों में प्रदर्शित किया जाता है।

इससे सूफीवाद और उसमें मौजूद मिली-जुली संस्कृति की संभावनाओं के बारे में लोगों की सोच को मजबूत करने में काफी मदद मिलती है। उपरोक्त गाना भी कहानी के मौजूदा घटनाक्रम के लिए प्रासंगिक भी है और कहानी को आगे बढ़ाने वाला भी।

मैंने ‘मौजूदा’ शब्द सोच-समझकर इस्तेमाल किया है, क्योंकि फिल्म में दरगाह जाने से ही हुस्न बानो (माला सिन्हा) को अपने प्रेमी जावेद (रहमान) से दोबारा मिलने का मौका मिलता है। दरगाहें ऐसे कई मिलनों की गवाह रही हैं, जो शायद किसी और तरह मुमकिन नहीं हो पाते।

‘धर्मपुत्र’ आचार्य चतुरसेन के इसी नाम के उपन्यास से प्रेरित थी। चतुरसेन इस उपन्यास के बजाय अपने ऐतिहासिक लेखन के लिए ज्यादा जाने जाते थे। उपन्यास और फिल्म, दोनों की पृष्ठभूमि में भारत के 1920 के दशक के बाद के बड़े आंदोलन शामिल हैं। फिल्म की कहानी दिलीप के इर्द-गिर्द घूमती है।

वह एक मुस्लिम बच्चा है, जिसे हिंदू माता-पिता ने पाला-पोसा है। यह यश चोपड़ा की ही एक और फिल्म ‘धूल का फूल’ (1959) में दिखाए गए उस हिंदू बच्चे की कहानी का ठीक उल्टा है, जिसे एक मुस्लिम माता-पिता ने पाला था। लेकिन दिलीप बड़ा होकर ऐसा नौजवान बनता है, जिसे मुसलमानों से नफरत है।

वह हमें रबीन्द्रनाथ ठाकुर के किरदार ‘गोरा’ की याद दिलाता है, जो अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानता था और मजेदार बात यह है कि वह अपने पालक हिंदू माता-पिता से भी ज्यादा कट्टर हिंदू था। अंत में, फिल्म हमें विभाजन के रक्तपात और दिलीप के खून के प्यासे गिरोहों में शामिल होने की ओर ले जाती है।

इकबाल के ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ और खिलाफत के दौरान ‘हिंदू मुस्लिम भाई-भाई’ के नारों से शुरू होने वाली यह फिल्म 1930 और 1940 के दशक के चरम ध्रुवीकरण को दर्शाती है। एकजुटता का आह्वान करने वाले गीतों से लेकर सह-अस्तित्व का आग्रह करने वाले गीत तक, फिल्म का अंत एक ऐसे गीत से होता है, जो अपने शब्दों और संगीत में विभाजन की भयावह हिंसा को समाहित करता है।

यह गीत पूछता है कि किसका खून बहा, किसका घर जला- नफरत के मलबे में क्या हम यह भी जान सकते हैं? क्या आप बता सकते हैं कि मुस्लिम खून हिंदू खून से अलग है? संगीत की लय और भी प्रबल हो जाती है, ताल और भी प्रभावशाली हो जाती है और साहिर के शब्द हमसे पूछते हैं- ‘ये किसका लहू है कौन मरा?’

इन गीतों को सुनकर मन भर आता है। बंटवारे के खून-खराबे के बावजूद हिंदी फिल्मों ने बुनियादी सवाल उठाकर हमारे विवेक को जगाया था। लेकिन आज वही बॉलीवुड नफरत और मर्दानगी के विषम कॉम्बिनेशन वाली फिल्में बनाता है और हमारे अंदर के दानवों को प्रोत्साहित करता है। असल में साहिर का विषाद हमारा सामूहिक विषाद है। गीतों के जरिये हम उसे याद करें, यह कमजोरी नहीं, दरअसल आज के वक्त में यह भी बगावत है!

किसका खून बहा, किसका घर जला- नफरत के मलबे में क्या हम यह भी जान सकते हैं? क्या आप बता सकते हैं कि मुस्लिम खून हिंदू खून से अलग है? साहिर के शब्द हमसे यही सवाल पूछते हैं- ‘ये किसका लहू है कौन मरा?’ (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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