आगरा रेल मंडल में ट्रेनों की लेटलतीफी यात्रियों के लिए बड़ी परेशानी का सबब बन गई है। पिछले महीनों के मुकाबले जुलाई में ट्रेनों के समय पालन (पंचुअलिटी) का ग्राफ लुढ़ककर 89.63 प्रतिशत पर पहुंच गया है। अप्रैल से शुरू हुए इस वित्तीय चरण में जुलाई का महीना सबसे खराब साबित हुआ, जहां एक तरफ 500 से अधिक ट्रेनें देरी से चलीं, वहीं 41 ट्रेनों को एक घंटे से अधिक का विलंब झेलना पड़ा। देरी से चलने वाली ट्रेनों ने यात्रियों की परेशानी बढ़ाई। कनेक्टिंग ट्रेन छूटने, स्टेशन पर इंतजार और गंतव्य तक देर से पहुंचने जैसी समस्याओं का यात्रियों को सामना करना पड़ा।
जुलाई में मेल-एक्सप्रेस की 5628 ट्रेनें शेड्यूल थीं। इनमें 178 अपवाद रहे और 5450 ट्रेनें वास्तविक शेड्यूल हुईं। 52 ट्रेनों की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी। 5398 ट्रेनों में 4838 समय पर पहुंचीं, जबकि 560 ट्रेनें देरी से चलीं। इन 560 देरी से चलने वाली ट्रेनों में 331 ट्रेनें 1 से 15 मिनट, 115 ट्रेनें 16 से 30 मिनट, 53 ट्रेनें 31 से 45 मिनट, 20 ट्रेनें 46 से 60 मिनट और 41 ट्रेनें 60 मिनट से अधिक देरी से चलीं। यानी जुलाई में 41 ट्रेनों को एक घंटे से अधिक की देरी का सामना करना पड़ा। अप्रैल से जुलाई तक समय पालन में 2.54 प्रतिशत अंक की गिरावट आई। अप्रैल में 92.17 प्रतिशत ट्रेनें समय पर चली थीं, जो जुलाई में घटकर 89.63 प्रतिशत रह गईं। मई में 94.07 प्रतिशत के साथ समय पालन सबसे बेहतर रहा था, लेकिन इसके बाद लगातार दो महीनों में गिरावट दर्ज हुई।
विभागों का समन्वय है जरूरी
ट्रेन को समय पर चलाने में करीब 16 विभागों का सामंजस्य महत्वपूर्ण होता है। लोको पायलट को ट्रेन लेकर रवाना होने से पहले एक परिपत्र दिया जाता है, जिसे कॉशन कहा जाता है। इसमें ट्रेन की निर्धारित गति, किन स्थानों पर कम, सामान्य या ज्यादा रखी जा सकती है? किन स्थानों पर काम चल रहा है, आदि की जानकारी दी जाती है।
रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी संजय कुमार गौतम ने बताया कि कई बार सिग्नल समय पर नहीं मिलने, तकनीकी खामी, ओएचई में दिक्कत, मौसम समस्या या ट्रैक पर चल रहे कार्य के कारण भी ट्रेन को निर्धारित गति से कम चलाना पड़ता है। इन सभी परिस्थितियों का सीधा असर ट्रेन की पंचुअलिटी पर पड़ता है।






