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- Pakistan Army Chief Asim Munir Dictatorship & Power Analysis | Shekhar Gupta
17 मिनट पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
सारे तानाशाह इसलिए उन्मादग्रस्त रहते हैं, क्योंकि वे रिटायर होने की बात कभी सोचते ही नहीं हैं। आज जब वे सत्ता में हैं तब अपनी प्रजा की तकदीर भले तय कर रहे हों, कल जब उनकी सत्ता छिन जाएगी तब उनका क्या हश्र होगा यह वे नहीं तय कर सकते। यही वजह है कि पाकिस्तान के सभी तानाशाह एक समय के बाद उन्मादग्रस्त होने के संकेत देते दिखे हैं।
उन्माद के उभरने में आमतौर पर पांच से सात साल तक का वक्त लगता है। लेकिन आसिम मुनीर के लिए यह ‘टी-20’ वाली रफ्तार से उभर रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद मुनीर चार चरणों में खुद को और ज्यादा अधिकारों और ओहदों से लैस कर चुके हैं। लेकिन हाल ही में पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने सेना से जुड़े दो कानूनों पर जिस तरह मुहर लगाई, उसने इस सत्ता प्रतिष्ठान पर गहरी नजर रखने वालों को भी हैरत में डाल दिया।
पाकिस्तान सरकार के मंत्रिमंडल की बैठक ने ‘नेशनल कमांड अथॉरिटी एक्ट 2010’ में संशोधन और नए ‘डिफेंस फोर्सेस एक्ट 2026’ को मंजूरी दी और इसे सीधे नेशनल असेंबली में पेश किया, जिसे 30 मिनट के अंदर पास करके सदन को स्थगित कर दिया गया। विपक्ष ने सदन से वॉकआउट कर दिया। सत्ताधारी गठबंधन के दूसरे सबसे बड़े घटक पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने आपत्ति की मगर कानूनों के पक्ष में ही वोट दिया। पीपीपी वाले राष्ट्रपति ने फटाफट दस्तखत भी कर दिए।
पाकिस्तानी मामलों के कुछ जानकार कहेंगे कि ये कानून उस 27वें संविधान संशोधन को ही पिछली तारीख यानी 27 नवंबर 2025 से लागू करते हैं, जिसके तहत संविधान को तोड़मरोड़कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) पद बनाया गया था और तय किया गया था कि यह पद केवल सेनाध्यक्ष को ही मिलेगा।
इसने मुनीर का कार्यकाल 30 नवंबर 2030 तक के लिए बढ़ा दिया है, उन्हें आजीवन फील्ड मार्शल बना दिया है और यह व्यवस्था कर दी गई है कि उन पर कभी कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। गहराई से देखें तो मुनीर ने जो अतिरिक्त अधिकार हथियाए हैं, वे भयानक हैं। ये गहरे असुरक्षा-बोध या दहशत से पैदा हुए उन्माद की वजह से ही हासिल किए गए हैं। हर तानाशाह को एक समय बाद अपनी छाया से भी डर लगने लगता है। मुनीर में यह समय से बहुत पहले पैदा हो गया है।
नए कानूनों के तहत मुनीर सैनिकों को मनमर्जी ‘हायर, फायर और रिटायर’ (भर्ती, छुट्टी और सेवानिवृत्त) कर सकते हैं, या उनका कार्यकाल बढ़ा सकते हैं। यह वे वफादार सूबेदार, मेजर या कर्नल के साथ ही नहीं, समकक्ष अधिकारियों के साथ भी कर सकते हैं।
वे अपने किसी भी जनरल, खासकर कोर कमांडर को रिटायर कर सकते हैं या उनका कार्यकाल बढ़ा सकते हैं। इससे एक तो यह होगा कि ये लोग उनसे डरने लगेंगे, दूसरा, वे लालची बन सकते हैं। कोर कमांडरों के बीच बेचैनी और कानाफूसी और आला अफसरों में अदृश्य बाधाओं से झल्लाहट के संकेत मिलने लगे हैं।
मुनीर सबके ऊपर जा बैठे हैं और उत्तराधिकारी बनने का रास्ता बंद हो गया। आप खुद को कितना असुरक्षित महसूस कर सकते हैं कि आपको हर कुछ महीने के बाद अपनी स्थिति को मजबूती देने के लिए नये तरीके, कानून, ओहदे, पुरस्कारों की खोज करनी पड़े?
पुरानी मान्यता है कि सभी तानाशाह एकाकी और डरे हुए होते हैं। मुनीर जिस डर से ग्रस्त हैं, उसे ‘एक्रोफोबिया’ यानी ऊंचाई से डर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। वे बहुत जल्दी बहुत ऊंचाई पर जा बैठे हैं और उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि अब और ऊपर कहां जाएं, या कहीं अब इससे नीचे न गिर पड़ें।
पाकिस्तान की राष्ट्रीय शक्ति तो घटती जा रही है। यह सिर्फ उसकी सेना पर ही आधारित रही है। उसकी अर्थव्यवस्था मर चुकी है और उसमें जान डालने की कोशिश तक नहीं की जा रही है, सिवाय इसके कि सऊदी अरब से भारी मदद कैसे हासिल की जाए। लेकिन सऊदी अरब खुद कर्जे में है और वह एक-दो अरब डॉलर से ज्यादा नहीं दे सकता, वह भी सैन्य सेवाओं के एवज में आभार के तौर पर।
वैसे भी, उम्मीद को योजना नहीं माना जा सकता। सेना की सीमाएं हैं। वह पश्चिमी सीमा पर उभरी बगावतों से नहीं निपट सकती, या भारत से सैन्य मामले में बढ़त नहीं ले सकती। वह जब-तब कोई बखेड़ा खड़ा करने के सिवाय कुछ नहीं कर सकती।
मुनीर की महारत सैन्य मामलों में नहीं है, लेकिन वे सेना की गिरफ्त में फंसे अपने मुल्क की भ्रष्ट शाही सियासत की गहरी समझ रखते हैं। उन्हें जोखिमों का भी अंदाजा है। यह सामान्य सियासत नहीं है। इसके लिए मैं तीन शब्द सुझा सकता हूं- गलाकाट, पीठ में छुरा भोंकने वाली या बेरहम। मुनीर अपने भविष्य को पुख्ता नहीं कर सकते। उन्हें अपने वर्तमान को सुरक्षित रखने की फिक्र लगी रहेगी। लेकिन ये नए कानून उनके सीने पर एक और कवच का ही काम करेंगे।
मुनीर 58 साल के हैं और सेनाध्यक्ष के रूप में पांचवें साल में हैं। 30 नवंबर 2030 को जब उनका पांच साल का नया कार्यकाल खत्म होगा, तब वे केवल 62 साल के होंगे। इस उम्र में भारत के सेनाध्यक्ष रिटायर हो जाते हैं। 2030 के बाद वे किधर जाएंगे, यह उनके लिए एक चुनौती होगी।
कई पाकिस्तानियों को लगता है कि इससे काफी पहले ही वे खुद को राष्ट्रपति घोषित कर देंगे। और इस पद पर उनका कोई निश्चित कार्यकाल नहीं होगा। यानी वे आजीवन सत्ता में बने रह सकते हैं। वे शायद सही सोच रहे हैं। लेकिन उनके पूर्ववर्तियों का रिकॉर्ड यही कहता है कि समय किसी के लिए रुका नहीं रहता।
किसी भी पाकिस्तानी तानाशाह के तीन हश्र हो सकते हैं- जेल, देशनिकाला या हत्या। मुशर्रफ मेरी इस भविष्यवाणी के लिए मुझे एक बार ‘फटकार’ भी लगा चुके हैं। दावोस के सम्मेलन में मेरी ओर उंगली उठाते हुए उन्होंने तानाशाहों के तीन हश्र वाले मेरे विश्लेषण की ओर इशारा करते हुए कहा था कि एक समय था जब आपके विश्लेषण की कद्र की जा सकती थी, लेकिन अब नहीं।
उन्होंने कहा था, आप गलत हैं क्योंकि आप मानते हैं कि मैं तानाशाह हूं। मैं तानाशाह नहीं हूं, डेमोक्रेट हूं। दरअसल, तानाशाही और मतिभ्रम साथ-साथ रहते हैं। अगर मैं मुनीर के भविष्य के बारे में अंदाजा लगाऊं तो जो संभावनाएं दिखती हैं, उनमें रिटायर होकर घर में बैठना और गोल्फ खेलकर समय बिताना तो निश्चित ही शामिल नहीं हैं।
मुनीर भी उसी डगर पर हैं… अय्यूब खान और याह्या खान ने 1965 और 1971 में फौजी दुस्साहस करके अपने पतन को बुलावा दिया। जिया-उल- हक सत्ता के शिखर पर ही बदकिस्मती के शिकार हुए। परवेज मुशर्रफ का हश्र यह हुआ कि उन्हें देशद्रोह के आरोप का सामना करना पड़ा। भविष्य मुनीर के साथ अलग तरह से क्यों पेश आएगा?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)








