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- MP Funds Usage: Parliamentarians Need Better Fund Utilization Learnings
8 घंटे पहले
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संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार
हाल में कुछ सांसदों द्वारा स्थानीय क्षेत्र विकास योजना यानी एमपी लैड निधि के उपयोग-दुरुपयोग का मामला सामने आया है। संसद के दोनों सदनों में भी सांसद निधि के औचित्य पर सवाल उठाए गए।
पहली बार यह मुद्दा तब उठा था, जब राजस्थान में झुंझुनूं के सांसद ने 25 लाख रुपए, चूरू सांसद ने 50 लाख रुपए और भरतपुर सांसद ने 45 लाख रुपए अपनी-अपनी सांसद निधि से हरियाणा के कैथल जिले में विकास कार्यों के लिए आवंटित करने की सिफारिश की। मामला तब फिर गरमाया, जब जम्मू-कश्मीर से भाजपा के राज्यसभा सांसद गुलाम अली खटाना ने भी अपने राज्य के बजाय यूपी के लिए बड़ी राशि आवंटित कर दी।
जब राजस्थान के कांग्रेस सांसदों ने अपने राज्य के बजाय हरियाणा में विकास कार्यों के लिए राशि दी तो भाजपा ने आरोप लगाया कि यह एमपी लैड के मूल उद्देश्य के खिलाफ है। इस योजना का मकसद ही सांसद के अपने क्षेत्र में विकास जरूरतों को पूरा करना है।
फिर राज्य के बाहर पैसा खर्च करने का क्या औचित्य? भाजपा ने इसे राजनीति से प्रेरित बताते हुए कहा कि कैथल रणदीप सुरजेवाला के पुत्र का विधानसभा क्षेत्र है। उधर खटाना द्वारा भी यूपी में धनराशि के इस्तेमाल करने की पीडीपी प्रवक्ता ने आलोचना की।
झुंझुनूं सांसद बृजेन्द्र सिंह ओला ने कहा कि आवंटन एमपी लैड गाइडलाइन और सरकारी आदेशों के तहत ही किया गया है। नियमों के अनुसार 50 लाख रुपए तक अपने निर्वाचन क्षेत्र के बाहर के कार्यों में दिए जा सकते हैं और विशेष परिस्थितियों में 1 करोड़ रुपए तक की अनुशंसा भी अनुमत है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पहले भाजपा सांसद भी आपत्तिजनक उद्देश्यों के लिए एमपी लैड राशि इस्तेमाल कर चुके हैं। इधर खटाना ने कहा कि वे मनोनीत सांसद हैं तो नियमानुसार देश के किसी भी हिस्से में विकास कार्यों की सिफारिश कर सकते हैं।
यदि सांसदों ने अपने राज्य के बाहर विकास के लिए राशि आवंटित की है तो उन्होंने ऐसा नियमों के तहत ही किया होगा। लेकिन चूंकि यह धारणा है कि सांसद अपनी निधि का समुचित उपयोग नहीं कर रहे हैं, इसलिए ये घटनाएं हमें इस बड़े सवाल पर चर्चा का अवसर देती हैं कि आखिर एमपी लैड राशि को बरकरार रखने का औचित्य क्या है?
इस पर दो समानांतर तर्क सामने आते हैं। पहला, यह निधि खत्म होनी चाहिए, क्योंकि बड़ी संख्या में सांसद विकास कार्यों के लिए पूरी राशि का उपयोग नहीं कर पाते। इसका विरोधी तर्क यह है कि सांसदों को विकास कार्यों के लिए ऐसी निधि की आवश्यकता है, इसलिए यह बरकरार रहनी चाहिए।
एमपी लैड योजना में हर सांसद कुछेक अपवादों को छोड़ प्रति वर्ष 5 करोड़ रुपए तक के विकास कार्यों की सिफारिश कर सकता है। 17वीं लोकसभा के दौरान लगभग 4837.87 करोड़ रुपए एमपी लैड के लिए आवंटित किए गए थे, जिनमें से कथित तौर पर 3639.53 करोड़ रुपए खर्च हुए। कुल 96211 कार्यों की सिफारिश की गई, जिनमें से 41143 कार्य पूरे हुए।
हालांकि यह आंकड़ा बताता है कि लगभग आधे कार्य पूरे नहीं हो सके, लेकिन कुल आवंटित बजट का लगभग 75% विकास कार्यों पर खर्च हो गया। वर्तमान लोकसभा में अब तक 5486 करोड़ रुपए आवंटित हो चुके हैं, जिनमें से 1453.69 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं और कई विकास कार्य अभी प्रगति पर हैं।
यह सही है कि एमपी लैड पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार 17वीं लोकसभा (2019-2024) के दौरान कुल आवंटित बजट का 16.24% हिस्सा खर्च नहीं हो पाया। लेकिन ऐसा मुख्यत: कोविड के कारण हुआ, जब विकास परियोजनाएं स्थगित कर दी गई थीं। लेकिन पिछली कुछ लोकसभाओं के दौरान एमपी लैड निधि का इस्तेमाल अपेक्षाकृत बेहतर हुआ है।
16वीं लोकसभा (2014-2019) में केवल 8.7% निधि खर्च नहीं हो पाई, 15वीं (2009-2014) में यह आंकड़ा 3.47% था। 14वीं (2004-2009) में तो यह और भी कम मात्र 0.99% ही रहा था। हो सकता है कुछ सांसद अपनी निधि का पूरा उपयोग नहीं कर पाए हों, लेकिन इसे व्यापक चलन नहीं कहा जा सकता। बेहतर यह होगा कि छोटी कार्यशालाओं और विशेषज्ञों के जरिए सांसदों को इस बात की ट्रेनिंग दी जाए कि वे विकास कार्यों में सांसद निधि का सबसे बेहतर उपयोग कैसे कर सकते हैं।
हो सकता है कि कुछ सांसद अपनी निधि का पूरा उपयोग नहीं कर पाए हों, लेकिन इसे व्यापक चलन नहीं कहा जा सकता। ऐसे कई उल्लेखनीय उदाहरण भी हमारे सामने हैं, जहां सांसदों ने अपने पूरे आवंटित कोश का इस्तेमाल किया। (ये लेखक के अपने विचार हैं)









