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- Abhay Kumar Dubey’s Column Will 40 To 45% Hindu Votes Be Mobilized In UP?
8 घंटे पहले
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अभय कुमार दुबे, अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर
आगरा को उत्तर भारत में दलितों की राजनीतिक राजधानी माना जाता है। 1956 में यहां की सबसे बड़ी जाटव बस्ती में बुद्ध विहार का उद्घाटन करते समय दिया गया आम्बेडकर का भाषण आज भी आगरा की 30% दलित आबादी की राजनीतिक विरासत है।
इसके बावजूद वहां के चुनावों में भाजपा की सफलता से संदेश यही मिलता रहा है कि हिंदुत्ववादी राजनीति ने दलितों को अपने आगोश में समेटने का फॉर्मूला खोज लिया है। वही आगरा अब दलित नेतृत्व के खिलाफ लहराए जा रहे भगवा झंडों के मुकाबले दलितों के नीले झंडों की प्रतियोगिता का नजारा दिखा रहा है।
इस बार नीले झंडों का मतलब दलितों की पारम्परिक पार्टी बसपा का प्रभाव नहीं है। उनके साथ सपा के कार्यकर्ताओं की मौजूदगी एक नए समीकरण का संदेश दे रही है। पिछली बार 1993 में यह समीकरण दिखाई पड़ा था, जब बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बावजूद सपा के यादवों और बसपा के जाटवों ने मिलकर भाजपा विरोधी चुनावी मुहिम का नेतृत्व किया था।
उस चुनाव के नतीजे से हिंदू राजनीतिक एकता का तेजी से बनता मानचित्र बिगड़ गया था। लेकिन, वह उभार मुख्यत: बसपा का था, जिसका लाभ उसे 2012 तक मिलता रहा। उसके बाद पलड़ा भाजपा के पक्ष में झुक गया।
जरूरी नहीं कि 2027 के चुनाव तक ऐसा ही मूड कायम रहे। बगल में ही अलीगढ़ है, जहां संघ प्रमुख मोहन भागवत की तरफ से दिया गया संदेश (एक मंदिर, एक कुआ, एक श्मशान) सुनाई पड़ रहा है। यह संदेश समरसता कायम करने के लिए है।
लेकिन इस बार ऐसा लग रहा है कि 2014 के बाद जिस बारीकी और कुशलता से हिंदू राजनीतिक एकता के दायरे में दलित मतदाताओं को जोड़ा गया था, वह कारीगरी कहीं गायब हो गई है। यूपी की कसौटी पर हिंदुत्व के दलित अध्याय को लगातार परीक्षा देनी पड़ती है।
दरअसल, होना इसका उल्टा चाहिए था। क्योंकि बसपा की दलित मतदाताओं पर से पकड़ ढीली होती जा रही है। जो दलित मतदाता-मंडल मायावती के नेतृत्व के प्रति जबर्दस्त निष्ठा दिखाता रहा है, वह उनकी लगातार निष्क्रियता के कारण अनमना होता जा रहा है। 2022 के चुनावों में भाजपा ने कम से कम पश्चिमी यूपी में इसका लाभ भी उठाया था।
किसान आंदोलन के कारण जाट वोटों में जो कमी आई थी, समझा जाता है कि उसकी भरपाई कुछ जाटव वोटों ने की थी। पिछले ढाई साल में यह दलित वोटर और भी फ्लोटिंग हुआ है। एक तरह से यह माना जा सकता है कि यूपी के इतिहास में पहली बार आम्बेडकरवादी राजनीति की खुराक पर पला दलित समुदाय हिंदुत्व द्वारा अपनी ओर खींचे जाने के लिए खुल गया है। इस परिस्थिति के बावजूद भाजपा इस अंदेशे का सामना कर रही है कि कहीं यह वोटर भाजपा की तरफ झुकने के बजाय कांग्रेस-सपा गठजोड़ को न पसंद कर बैठे।
यूपी में योगी को मुख्यमंत्री बनाया जाना हिंदुत्ववादी राजनीति में एक खास तरह के प्रयोग की तरह था। योगी की राजनीति को हिंदुत्व के साथ सामाजिक न्याय के पहलू जोडने में दिलचस्पी नहीं है। लेकिन आक्रामक हिंदुत्व से केवल “द्विज’ मानस वाले 18 से 20% मतदाताओं का ही समर्थन मिलता है।
दलित जातियां इससे चौंक जाती हैं। समाजवादी पृष्ठभूमि का ओबीसी समाज भी इससे शंकित हो जाता है। संभवत: संघ ने तय किया है कि 2027 में योगी के नेतृत्व में विशुद्ध भगवा प्रयोग करके देखा जाए। इससे पता चलेगा कि जातिगत मांगों की परवाह किए बिना की गई राजनीति के बावजूद ऊंची जातियों के साथ दलित और ओबीसी वोटर कितनी संख्या में जुड़ते हैं।
क्या यूपी की भाजपा 40 से 45% की हिंदू राजनीतिक एकता हासिल कर सकती है? ध्यान रहे लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 49.6 से घट कर 41.4% तक आ गया था। अगर अखिलेश यादव अपना “पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक एकता) बना ले गए तो यूपी में भाजपा संकट में आ सकती है।
2014 के बाद जिस कुशलता से हिंदू राजनीतिक एकता के दायरे में दलित मतदाताओं को जोड़ा गया था, वह कारीगरी कहीं गायब हो गई है। यूपी की कसौटी पर हिंदुत्व के दलित अध्याय को लगातार परीक्षा देनी पड़ती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








