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- Arghya Sengupta Swapannil Tripathi’s Column: Authoritarianism Is Possible Even Within The Framework Of The Constitution
2 घंटे पहले
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अर्घ्य सेनगुप्ता स्वपन्निल त्रिपाठी विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में पदाधिकारी
लोकतांत्रिक क्षरण नाटकीय घटनाओं के माध्यम से ही सामने नहीं आता। कई बार कानून की बाहरी संरचना तो बनी रहती है, लेकिन उसका इस्तेमाल इस तरह किया जाता है कि सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ जाए। पिछले एक महीने में दक्षिण एशिया ने इस प्रवृत्ति के दो स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत किए हैं- बांग्लादेश में शेख हसीना को मृत्युदंड देने वाला निर्णय और पाकिस्तान का 27वां संविधान संशोधन, जिसने सेना प्रमुख की शक्तियों को और मजबूत किया है। दोनों घटनाएं दर्शाती हैं कि वैधता का उपयोग शक्ति को सीमित करने के बजाय उसे मजबूत करने के लिए किया जा सकता है।
बांग्लादेश में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण- जिसे मूल रूप से शेख मुजीबुर रहमान ने बनाया था और जिसे उनकी बेटी शेख हसीना ने 1971 के मुक्ति संग्राम में हुए अत्याचारों की जांच के लिए पुनर्जीवित किया था- को फिर पुनर्गठित किया गया, पर इस बार स्वयं हसीना के मुकदमे के लिए।
यह मुकदमा पिछले वर्ष छात्र प्रदर्शनों के बाद भड़की उस हिंसा से जुड़ा था, जिसमें 1,400 से अधिक नागरिकों की मृत्यु हुई थी और जिसके परिणामस्वरूप हसीना को पद छोड़ना पड़ा था। इन कार्यवाहियों में हसीना और तत्कालीन गृह मंत्री असदुज्जमान खान को फांसी की सजा सुनाई गई।
यदि यह वास्तव में एक निष्पक्ष और गैर-पक्षपातपूर्ण जांच होती, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत करती और यह दिखाती कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। लेकिन इसके विपरीत, इस निर्णय को व्यापक रूप से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को न्यायिक माध्यमों से समाप्त करने का प्रयास माना गया है।
बांग्लादेशी राजनीति के पर्यवेक्षकों तथा कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने मुकदमे की गंभीर प्रक्रियागत कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया- अपनी पसंद का वकील न मिलने देना, साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर न देना और अदालत द्वारा नियुक्त वकील का यह स्वीकारना कि उसने मुकदमे के दौरान हसीना से मिलना तक जरूरी नहीं समझा।
नतीजा पहले से तय दिखाई देता था। यह वही स्थिति है, जहां वैधता आवरण बन जाती है- कानून का बाहरी रूप बना रहता है, लेकिन उसकी मूल भावनाएं- निष्पक्षता और संस्थागत स्वतंत्रता- धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं।
पाकिस्तान का 27वां संविधान संशोधन इसी प्रवृत्ति की दूसरी छवि प्रस्तुत करता है, भले ही अलग रूप में। इसे संवैधानिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन वास्तव में यह राज्य के भीतर शक्ति-संतुलन को बुनियादी रूप से बदल देता है।
रक्षा बलों के प्रमुख नामक एक नए पद की स्थापना- जो स्थायी रूप से सेना प्रमुख के पास रहेगा और नौसेना तथा वायुसेना के प्रमुखों से ऊपर होगा- से सैन्य नेतृत्व को अभूतपूर्व संवैधानिक अधिकार मिल जाते हैं। इसके साथ ही एक नया संघीय संवैधानिक न्यायालय बनाने का प्रस्ताव है, जो सर्वोच्च न्यायालय के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र को सीमित कर देगा और सैन्य मामलों की न्यायिक समीक्षा को कमजोर करेगा।
यह सब संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के भीतर ही हो रहा है। लेकिन इनका संयुक्त प्रभाव यह है कि सैन्य प्रभुत्व को संवैधानिक रूप मिल जाता है, न्यायपालिका की शक्ति घटती है, और नागरिक सरकार की भूमिका और सीमित हो जाती है।
आपातकाल के दौरान भारत में भी इमरजेंसी की घोषणा, प्रेस पर नियंत्रण, अधिकारों का निलंबन और व्यापक संवैधानिक संशोधन- ये सब संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर ही किए गए थे। कानून की भाषा का उपयोग संवैधानिकता को कमजोर करने के लिए किया गया था।
प्रेस, नागरिक समाज और राजनीतिक विपक्ष के भीतर मौजूद छोटे-छोटे प्रतिरोध-केंद्रों ने न्यूनतम लोकतांत्रिक स्थान बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन इसे स्वाभाविक या स्थायी सुरक्षा समझना गलत होगा। ये अनुभव महत्वपूर्ण सबक देते हैं।
संवैधानिक लोकतंत्र बेहद नाजुक व्यवस्था है। जब संस्थाएं अपनी स्वतंत्रता और लोग संतुलन खो देते हैं, तब कानून दमन का औजार बन जाता है। कोई भी संविधान- चाहे कितना ही विस्तृत क्यों न हो- अपने आप लोकतांत्रिक स्थिरता सुनिश्चित नहीं कर सकता। संवैधानिक सुरक्षा तभी तक बनी रहती है, जब तक सतर्कता बनी रहे।
बांग्लादेश में हसीना को मृत्युदंड और पाकिस्तान का 27वां संविधान संशोधन, जिसने सेना प्रमुख की शक्तियों को और मजबूत किया है- ये दोनों घटनाएं दर्शाती हैं कि वैधता का उपयोग शक्ति को सीमित करने के बजाय उसे मजबूत करने के लिए किया जा सकता है।
(ये लेखकों के अपने विचार हैं)








