आज नवरात्रि की पंचमी तिथि:  संतान सुख, ज्ञान, साहस और शांति की कामना से की जाती है देवी स्कंदमाता की पूजा
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आज नवरात्रि की पंचमी तिथि: संतान सुख, ज्ञान, साहस और शांति की कामना से की जाती है देवी स्कंदमाता की पूजा

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9 घंटे पहले

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आज नवरात्रि का छठा दिन है, लेकिन तिथि आश्विन शुक्ल पंचमी है। इस तिथि पर स्कंदमाता की पूजा की जाती है। स्कंदमाता, मां पार्वती का ही एक रूप है, जिनकी गोद में बालरूप कार्तिकेय विराजमान हैं। स्कंद, यानी कार्तिकेय, शिव और पार्वती के पुत्र हैं और उन्हीं के कारण देवी का ये रूप स्कंदमाता कहलाया। इस देवी की पूजा करने से भक्तों को संतान सुख, ज्ञान, साहस और शांति की प्राप्ति होती है।

स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और कल्याणकारी है। देवी का वर्ण शुभ्र यानी सफेद माना गया है, देवी लाल और पीले वस्त्र धारण करती हैं। जानिए स्कंदमाता की पूजा विधि और कथा…

देवी स्कंदमाता का स्वरूप – देवी की चार भुजाएं हैं। देवी के एक हाथ में स्कंद यानी कार्तिकेय हैं। दो हाथों में कमल के फूल हैं। एक हाथ वर मुद्रा में है। देवी का वाहन सिंह है।

स्कंदमाता से जुड़ी पौराणिक कथा

पुराने समय में असुर तारकासुर को वरदान मिला था कि उसे केवल भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता है। वरदान पाकर उसने देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए।

देवताओं ने तारकासुर का अंत करने के लिए शिव जी से मदद मांगी और उन्हें देवी पार्वती से विवाह करने के लिए मनाया। इसके बाद शिव पुत्र कार्तिकेय का पालन पोषण कैलाश पर्वत से दूर कृतिकाओं ने किया था। जब बालक कार्तिकेय थोड़े बड़े हुए, तो शिव-पार्वती ने उन्हें कैलाश पर्वत पर बुलाया। जब कार्तिकेय शिव-पार्वती के पास पहुंचे, उस समय देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और देवी ने कार्तिकेय को तारकासुर से युद्ध करने के लिए तैयार किया।

मां पार्वती ने स्कंदमाता का रूप लेकर अपने पुत्र कार्तिकेय को युद्ध कौशल सिखाया। देवी से प्रशिक्षित होकर कार्तिकेय देवताओं के सेनापति बने और तारकासुर का वध किया।

देवी का संदेश

स्कंदमाता हमें सिखाती हैं कि मातृत्व केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि संतान को योग्य बनाना और समाज की सेवा की प्रेरणा देना भी माता का धर्म है। ये रूप दिखाता है कि एक स्त्री अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी बड़ी जिम्मेदारियां उठा सकती है। देवी की आराधना से संतान सुख, मानसिक शांति मिलती है।

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