आरती जेरथ का कॉलम:  ‘आप’ नेताओं की रिहाई के बाद कांग्रेस क्यों चिंतित है?
टिपण्णी

आरती जेरथ का कॉलम: ‘आप’ नेताओं की रिहाई के बाद कांग्रेस क्यों चिंतित है?

Spread the love




दिल्ली के कथित शराब घोटाला मामले को ट्रायल कोर्ट द्वारा खारिज किया जाना आम आदमी पार्टी के नेताओं अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के लिए एक अहम मोड़ पर आया है। 2027 में पंजाब, गोवा और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीनों राज्यों में आप का सियासी दखल है- खासकर पंजाब में, जहां उसे अपनी सरकार बचानी है। ऐसे में अदालत का यह फैसला पार्टी के लिए मनोबल बढ़ाने वाला है। इससे कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा आएगी और पार्टी नैतिक बढ़त का दावा करते हुए तीनों राज्यों में आक्रामक चुनावी मुकाबले की तैयारी करेगी। इसका असर सीधे कांग्रेस पर पड़ेगा। कांग्रेस को पहले ही अपने घटते जनाधार की चिंता है। वह पंजाब और गोवा में वापसी की उम्मीद कर रही थी और गुजरात में भाजपा को कड़ी टक्कर देने की रणनीति बना रही थी। इस घटनाक्रम पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया में बेचैनी साफ झलक रही थी। पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने यह कहते हुए कि चुनाव से ठीक पहले आप नेताओं को राहत मिलना महज संयोग नहीं हो सकता, भाजपा पर आरोप लगाया कि वह कांग्रेस को कमजोर करने के लिए उसके प्रतिद्वंद्वियों को खड़ा कर रही है। उनकी यह थ्योरी भले अतिरंजित लगे, लेकिन हकीकत यह है कि अगर आप दोबारा उभरती है, तो उसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हो सकता है- और अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा को। पंजाब में कांग्रेस इस उम्मीद पर दांव लगाए बैठी है कि आप सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी और अंदरूनी खींचतान उसे स्वाभाविक बढ़त देगी। भाजपा फिलहाल राज्य में हाशिये की खिलाड़ी है। जब तक वह अपने पूर्व एनडीए सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के साथ कोई ठोस गठबंधन नहीं कर पाती, तब तक अगले चुनाव में उसकी बढ़त सीमित ही रहने की संभावना है। हालांकि, अगर नतीजा त्रिशंकु विधानसभा के रूप में सामने आता है, तो भाजपा को ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने की उम्मीद होगी। यह वही रणनीति है, जिसने पूर्वोत्तर के उन कई राज्यों में उसे सफलता दिलाई है, जहां आज वह क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन में एक जूनियर पार्टनर के रूप में सत्ता में है। गोवा और गुजरात में भी पिछले विधानसभा चुनावों में आप ने कांग्रेस की कीमत पर ही अपनी पैठ बनाई थी, जिससे दोनों राज्यों में भाजपा की आसान जीत का रास्ता साफ हुआ। ऐतिहासिक रूप से, त्रिकोणीय मुकाबला हमेशा भाजपा के लिए फायदेमंद रहता है, क्योंकि इससे विपक्षी वोट बंट जाते हैं। अदालती फैसले ने केजरीवाल को जैसे नया जीवन दे दिया है। वे इस मौके को पूरी ताकत से भुनाना चाहते हैं, ताकि चार साल तक चले भ्रष्टाचार के दाग और कानूनी लड़ाई के बाद राजनीतिक वापसी की जमीन तैयार की जा सके। लेकिन इस फैसले ने सीबीआई की साख पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया है कि क्या जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हथियार की तरह किया जाता है। आरोप खारिज करते समय अदालत की भाषा बेहद सख्त थी। सीबीआई को फटकार लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि पेश सबूत प्रथम दृष्टया मामला तक नहीं बनाते, गंभीर संदेह तो दूर की बात है। इतना ही नहीं, अदालत ने टिप्पणी की कि पूरी आबकारी नीति का मामला न्यायिक जांच की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और पूरी तरह से अविश्वसनीय साबित होता है। अदालत ने चार्जशीट तैयार करने वाले सीबीआई जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की भी सिफारिश की। एक कमजोर मामले ने केजरीवाल को 150 दिन और सिसोदिया को 530 दिन जेल में रखा। इस दौरान भाजपा और कांग्रेस ने उनकी साख पर हमले किए। अंततः आप ने दिल्ली की सत्ता गंवाई और तब से राजनीतिक रूप से दबाव में नजर आ रही थी। चार साल इस मुकदमे की भेंट चढ़ गए। आप नेताओं के पास इसका विरोध करने का कोई ठोस तंत्र भी नहीं है। न्याय की मांग है कि उन्हें सीबीआई के खिलाफ मानहानि, उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना का मुकदमा दायर करने की अनुमति मिले, खासकर तब, जब अदालत स्वयं जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का संकेत दे चुकी है। लेकिन अभी तो उलटे सीबीआई ही उच्च अदालत में पुनर्विचार याचिका दायर करने पर विचार कर रही है। कांग्रेस को पहले ही अपने घटते जनाधार की चिंता है। वह पंजाब और गोवा में वापसी की उम्मीद कर रही थी और गुजरात में भाजपा को कड़ी टक्कर देने की रणनीति बना रही थी। लेकिन अब कांग्रेस में बेचैनी साफ झलक रही है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *