नीरजा चौधरी का कॉलम:  सिंदूर की प्रतीकात्मकता ने स्त्रियों के मर्म को छू लिया है
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नीरजा चौधरी का कॉलम: सिंदूर की प्रतीकात्मकता ने स्त्रियों के मर्म को छू लिया है

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4 घंटे पहले

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नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार

कुछ ऐसी छवियां होती हैं, जो लोगों के दिलो-दिमाग में हमेशा के लिए अंकित हो जाती हैं- और अक्सर किसी राष्ट्र के अस्तित्व के एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण को कैद कर लेती हैं। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में सिर्फ 25 हिंदू पुरुषों की ही हत्या नहीं की गई थी, बल्कि उनका धर्म जानने के बाद उनकी हत्या की गई थी।

यह हिंदू महिलाओं के ‘सुहाग’ पर भी हमला था! किसी भी हिंदू विवाहित महिला को दिया जाने वाला सबसे बड़ा आशीर्वाद आमतौर पर ‘सदा सुहागन रहो’ ही होता है।

बिहार में छठ पूजा के समय पवित्र सिंदूर माथे से लेकर नाक तक लगाया जाता है- इसे एक आशीर्वाद के रूप में देखा जाता है। पश्चिम बंगाल में भी ‘सिंदूर खेला’ एक प्रसिद्ध पर्व है, जो दुर्गापूजा के अंतिम दिन मनाया जाता है।

पूरे भारत में महिलाएं सिंदूर को अपनी वैवाहिक पहचान के प्रतीक के रूप में पहचानती हैं और पति के परिवार में स्वीकृति के रूप में भी। कुछ लोग इसे पितृसत्ता के प्रतीक के रूप में देख सकते हैं, लेकिन विवाहित महिलाओं के एक बड़े समूह के लिए यह उनकी मूल पहचान का प्रतीक है।

इसी सिंदूर पर आतंकवादियों ने प्रहार किया था। इसके जवाब में जब भारत द्वारा पाकिस्तान और पीओके में स्ट्राइक की गई तो उसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम दिया गया। ऐसा करके भारत की सेना और सरकार ने हिंदू महिलाओं सहित पूरे देश के साथ एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव स्थापित कर लिया है।

आखिरकार, पहलगाम में आतंकवादियों ने पति के साथ उसे भी मार डालने की गुहार लगाने वाली एक महिला से कहा था कि ‘हम तुम्हें नहीं मारेंगे, तुम जाकर मोदी को बता देना।’ 25 में से अनेक विवाहित महिलाओं ने अपने पतियों को अपनी आंखों के सामने मरते हुए देखा। उनका सिंदूर- जो सबसे पहले विवाह समारोह के दौरान उनके पति द्वारा लगाया जाता है- कुछ ही क्षणों में मिटा दिया गया।

यही कारण था कि पहलगाम के बाद देश में जैसा गुस्सा था, वैसा हाल के दिनों में अन्य आतंकी हमलों के बाद नहीं देखा गया। ऐसे में ऑपरेशन सिंदूर के इस नामकरण को भारत की महिलाओं की सुरक्षा, उनके नुकसान का बदला लेने तथा दुःख की घड़ी में उनके साथ खड़े होने की शपथ के रूप में देखा जा रहा है।

लेकिन ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ पीड़ित हिंदू महिलाओं के बारे में ही नहीं था, यह भारत के विचार के बारे में भी था- जो पाकिस्तान के एक मजहबी-राष्ट्र की पहचान से अलग था। पहलगाम हमले से ठीक पहले पाक सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने विदेश में रह रहे पाकिस्तानियों से आग्रह किया था कि वे कभी न भूलें पाकिस्तान का जन्म दो राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर हुआ था और हिंदू और मुसलमान कभी एक साथ नहीं रह सकते।

लेकिन 8 मई को जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर की अधिकृत सूचना देश को दी तो इसके लिए दो महिलाओं को चुना गया- थलसेना में कर्नल सोफिया कुरैशी और वायुसेना में विंग कमांडर व्योमिका सिंह। एक मुस्लिम और एक हिंदू थीं!

उन्हें 6 और 7 मई की दरमियानी रात को 25 मिनट तक चले भारत के सैन्य अभियान के बारे में देश और दुनिया को बताने के लिए चुना गया। उनके साथ विदेश सचिव विक्रम मिस्री भी बैठे थे, जो अधिक तथ्यात्मक और संतुलित तरीके से अपनी बात कह रहे थे।

22 अप्रैल को पहलगाम में भारत की महिलाओं के स्त्रीत्व की क्षति हुई थी! जब भारत ने उसका प्रतिशोध लिया तो ये भारत की सैन्य महिलाएं ही थीं, जो उनके साथ खड़ी नजर आई थीं- और आगे बढ़कर देश का नेतृत्व कर रही थीं।

वे यह संकेत भी दे रही थीं कि भारत एक गौरवशाली, बहुलतावादी राष्ट्र है। यह एक ऐसा विचार है, जिस पर यह देश आधारित था और जिससे इसे शक्ति मिलती है। ऑपरेशन सिंदूर- जिसने भारत की महिलाओं के विश्वासों- और शक्ति- को गहराई से छुआ है- आतंकवादियों और उनके समर्थकों को ‘बस बहुत हो गया’ का संकेत दे गया है। यह राजनीति और उसके नतीजों के बारे में बात करने का समय नहीं है, लेकिन सिंदूर की प्रतीकात्मकता से पूरे भारत में महिलाओं के मर्म को जैसे छुआ गया है, उसका प्रभाव निकट भविष्य में तो कम होने की संभावना नहीं है।

ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की महिलाओं के विश्वासों और शक्ति को गहराई से छुआ है। यह राजनीति और उसके नतीजों पर बात करने का समय नहीं है, लेकिन सिंदूर की प्रतीकात्मकता ने पूरे भारत में महिलाओं के मर्म को स्पर्श किया है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं।)

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