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बेंगलुरु की अनामिका बिष्ट 2016 में अपनी व्यस्त कॉरपोरेट लाइफ छोड़कर कुछ सुकूनभरा करना चाहती थीं, और वह थी खेती। वे चाहती थीं कि लोग फिर से मिट्टी को अनुभव करें। इसी भाव से ‘विलेज स्टोरी’ का जन्म हुआ, जो आज भारतीय सिलिकॉन सिटी का सबसे प्रख्यात कम्युनिटी फार्मिंग एक्सपेरिमेंट है। कुछ वर्कशॉप्स से शुरू हुई यह पहल जल्द ही किसान बाजारों, कम्पोस्टिंग सत्रों और कम्युनिटी फार्मिंग तक पहुंच गई। कम्युनिटी गार्डन आज दुनिया में तेजी से बढ़ता कॉन्सेप्ट है। कई लोगों ने अपने खाली प्लॉट कम्युनिटी फार्मिंग के लिए किराए पर देना शुरू किया है। मैं 2024 में अमेरिका के बोस्टन दौरे के दौरान इसी कॉलम में इस कॉन्सेप्ट को लेकर लिख चुका हूं। बेंगलुरु में यह विचार जंगल की आग की तरह फैल चुका है। शहर के बाहरी इलाकों में कुछ किसान अपने बड़े प्लॉट या खेत को 20X20 वर्ग फीट के छोटे प्लॉट में बांटकर लोगों को उनकी पसंद की फसल उगाने के लिए किराए पर देते हैं।आप वीकेंड में जाकर पौधे लगा सकते हैं। किसान नियमित तौर पर उनकी सुरक्षा और सिंचाई करते हैं और अगले वीकेंड्स में या जब किसान कहे कि पौधे तैयार हैं, आप अपनी फसल काटने आ सकते हैं। आजकल बागवानी एक नया पास-टाइम बन गया है। पुणे की यात्रा करें तो यह एहसास और बढ़ जाएगा। कभी आरामपसंद लोगों का शहर माना जाने वाला पुणे अब बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों के चलते कंक्रीट का जंगल बन चुका है। लेकिन इस कंक्रीट के बीच आप गहराई से देखें तो पाएंगे कि शहर में अपनी छतों, बालकनियों और बैकयार्ड्स को छोटे खेतों में बदलने वाले होम गार्डनर्स तेजी से बढ़ रहे हैं। वे ड्रैगन फ्रूट, पैशन फ्रूट और एवोकाडो से लेकर रोजमेरी, थाइम, बेसिल और ओरिगेनो जैसे विदेशी फल और हर्ब्स तक उगा रहे हैं। बीते एक दशक में अपनी छतों को हरा-भरा बनाने वाले और खिड़कियों की चौखट जैसी छोटी जगहों का भी इस्तेमाल करने वाले बागवानी के शौकीन लोग अब अंतरराष्ट्रीय खान-पान से जुड़ी फसलों पर भी प्रयोग कर रहे हैं। अगर आपको लगता है कि चूंकि आप फ्लैट में रहते हैं तो ये जानकारियां आपके काम की नहीं, तो बेंगलुरु के कोरमंगला स्थित प्रथम् गार्डन से सीख लीजिए, जिसने बादलों भरे मौसम को भी उत्साह पर हावी नहीं होने दिया। अपनी कॉलोनी में एक खाली प्लॉट पर उन्होंने केला, मोरिंगा और गुड़हल की पैदावार से शानदार ऑर्गेनिक गार्डन बनाया है। कम्युनिटी गार्डन अब रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन, एनजीओ और खुली जगहों वाले स्कूलों का नया जुनून बन रहे हैं। अगर आप किसी सिंगल बिल्डिंग में रहते हैं, जहां ऐसी गतिविधियों के लिए बड़ी जगह नहीं है तो फिर ‘माइक्रोगार्डनिंग’ के कॉन्सेप्ट में आपका स्वागत है। शायद यह शब्द आपको बहुत छोटे बगीचों, बौनों और परियों की याद दिलाए, लेकिन हकीकत इसके उलट है। खिड़की की चौखट या बालकनी जैसी छोटी जगहों से भी आपको बेहतर उपज मिल सकती है। नियम बस यही है कि पौधे सही तरीके से लगाएं। और इस महीने से बेहतर समय क्या होगा जब बारिश धीरे-धीरे हमारे राज्यों की ओर बढ़ रही है और सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। अधिकतम उपज पाने का एक तरीका है कि जल्दी तैयार होने वाली फसलें लगाएं। इसके लिए माइक्रोग्रीन्स सबसे उपयुक्त हैं। ये घर में ही बहुत जल्दी अंकुरित हो जाते हैं। पुणे और बेंगलुरु के लोगों की तरह आप भी किसी कम गहरे पात्र में बीज बिखेर दें, फिर कुछ दिनों तक इसे धूप में रखें और मिट्टी को नम बनाए रखें। जब अंकुरों में दूसरी जोड़ी पत्तियां निकल आएं, जिन्हें असली पत्तियां कहते हैं (पहली पत्तियां ‘कोटिलेडोन्स’ कहलाती हैं), तो कैंची से उन्हें मिट्टी की सतह के पास से काट लीजिए। फिर उन्हें स्मूदी, सलाद, सैंडविच या स्टिर-फ्राई में इस्तेमाल कीजिए। बागवानी के शौकीन कहते हैं कि लगातार आपूर्ति के लिए हर कुछ दिनों में नए बीज बोते रहें। पुदीना, धनिया, बेसिल और लेट्यूस ऐसी फसलें हैं, जो कम जगह में भी अच्छी उगाई जा सकती है। फंडा यह है कि खेती को लेकर दीवानगी दिखाना एक हेल्दी जोखिम है। प्रकृति आपको शायद उपज कम दे, लेकिन धोखा कभी नहीं देगी। कम से कम वह आपको कीटनाशक-मुक्त हरी सब्जियां जरूर देगी, जो आपकी और आपके परिवार की सेहत बेहतर रखेंगी।
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