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भारतीय गेंदबाज ने टी-20 विश्वकप में अपने फॉर्म में वापसी की है, उनके अपने खेल के जुनून से जुड़ी खास बातें, उन्हीं की जुबानी… जब छोटा था, तब कभी नहीं लगा कि मैं अलग हूं। मैं बस तेज गेंद फेंकना चाहता था। विकेट लेना चाहता था। लोगों को असहज करना चाहता था। बाद में जब जूनियर कैंप में अपनी बॉलिंग का वीडियो देखा, तब समझ आया कि मेरा एक्शन अलग है। लेकिन वही अलगपन आज मेरी सबसे बड़ी ताकत है। हम अक्सर सोचते हैं कि हमें दूसरों जैसा बनना चाहिए। पर अगर आप अपने हुनर को पहचान लें और उसे स्वीकारें, तो दुनिया आपको स्वीकार करती है। कई लोगों को लगा था मेरा एक्शन बदलना चाहिए, लेकिन खुशकिस्मती से किसी कोच ने मुझे बदलने की कोशिश नहीं की क्योंकि असली सफलता नकल में नहीं, अपनी पहचान में छिपी होती है।
मैंने बचपन में टीवी पर कई गेंदबाजों को देखा। कोई बाएं हाथ का, कोई दाएं हाथ का। मैं हर हफ्ते किसी को कॉपी करता था। मुझे बड़े स्कोर या चौके-छक्के आकर्षित नहीं करते थे, सिर्फ तेज गेंदबाजी से प्यार था। शायद मुझे भी नहीं पता कि वह स्विच कब ऑन हुआ, लेकिन जब हुआ तो कभी ऑफ नहीं हुआ। गर्मी की दोपहरी में, जब मां सोती थीं, मैं घर के अंदर ही स्कर्टिंग बोर्ड पर गेंद मारकर अभ्यास करता था। वहां गेंद लगती तो आवाज नहीं होती। नहीं पता था कि यही अभ्यास आगे चलकर मेरी यॉर्कर को धार देगा। उस वक्त मैं एक बच्चा था, जिसके पास बहुत ऊर्जा थी और एक सपना था। यही जिंदगी का सच है कि कई बार आप जो आज छोटे-छोटे प्रयास कर रहे होते हैं, वही कल आपकी सबसे बड़ी पहचान बनते हैं।
क्रिकेट ने मुझे सिखाया कि गुस्सा जरूरी है, लेकिन नियंत्रण के साथ। शुरू में सोचता था कि तेज गेंदबाज को गुस्से में रहना चाहिए, बल्लेबाज से कुछ कहना चाहिए। लेकिन जल्द समझ आया कि असली ताकत शोर में नहीं, फोकस में है। मैं गुस्सा आज भी होता हूं क्योंकि मैं विकेट चाहता हूं, बल्लेबाज को असहज करना चाहता हूं लेकिन अपने जोन से बाहर नहीं जाना चाहता। जब आप अपना संतुलन खो देते हैं, तो खेल हाथ से निकल जाता है।
हार तकलीफ देती है। बड़े मंच पर हार का दर्द ज्यादा होता है। जब आप फाइनल तक पहुंचते हैं और जीत नहीं पाते, तो दिल टूटता है। टूटना भी चाहिए। दर्द नहीं होगा, तो जुनून कैसे जागेगा? वहीं से आगे बढ़ने की ताकत आती है। छह महीने बाद एक नया टूर्नामेंट होगा, एक नया मौका होगा। जिंदगी रुकती नहीं है। आप भी मत रुकें। लोग पूछते हैं क्या आक्रामक टीमों से डर लगता है? मैं कहता हूं, नहीं। अगर कोई टीम तेज खेलती है, तो वह मुझे भी खेल में बनाए रखती है। हर चुनौती अपने साथ एक अवसर लेकर आती है। जिंदगी में खुद को साबित करना पड़ता है
मैं एक ऐसी पीढ़ी से आता हूं, जिसमें टेस्ट क्रिकेट ही किंग है। भले ही मैंने आईपीएल से शुरुआत की, सीमित ओवर्स में सफलता पाई, लेकिन असली परीक्षा टेस्ट क्रिकेट में ही होती है। वहां आपको 20 विकेट लेने होते हैं और वह किस्मत से नहीं मिलते। वहां धैर्य चाहिए, कला चाहिए, निरंतरता चाहिए। जिंदगी भी टेस्ट मैच जैसी है, यहां शॉर्टकट नहीं चलते, यहां आपको खुद को साबित करना ही पड़ता है।
(तमाम इंटरव्यू में)
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