रूमी जाफरी2 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

फिल्म ‘जलवा’ के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन, पंकज पाराशर और सतीश कौशिक।
सतीश कौशिक मेरे बहुत करीबी दोस्त, बेहतरीन कलाकार और सबसे बढ़कर, बेहतरीन इंसान रहे हैं। आज जब मैं सतीश कौशिक की बात कर रहा हूं तो मुझे पंकज पाराशर याद आ रहे हैं। दूरदर्शन का सबसे मशहूर सीरियल करमचंद उन्होंने ही बनाया था। जलवा व चालबाज जैसी यादगार फिल्में बनाईं। पंकज पाराशर ने ही सतीश कौशिक को पहली बार कैमरे के सामने चांस दिया था।
पंकज जी ने बताया कि जब वो एफटीआईआई में पढ़ रहे थे, जब 1975 में वहां एक्टिंग का कोर्स बंद हो गया। 1977 में हमें एक प्रोजेक्ट मिला, जिसमें एक फिल्म बनानी थी। मगर एफटीआईआई में एक्टर नहीं थे। तो हमने दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) से एक्टर बुलाए। 10-15 एक्टर आए। मुझे एक गाना करना था, जिसमें लड़का-लड़की और एक माली का रोल था। माली के रोल के लिए मैंने अनुपम खेर को फाइनल कर लिया। सुबह शूटिंग थी और हम रात को सोने चले गए। रात को अचानक मेरे दरवाजे पर खटखट हुई। किसी ने खोला तो सिर पर गमछा बांधे, हाथ में कैंची लिए और धोती-कुरता पहने सतीश कौशिक खड़े थे। वो बोले, देखो साहब मैं परफेक्ट माली हूं। इसे कहते हैं माली। वो कश्मीरी है, खूबसूरत गोरा-चिट्टा। इतना खूबसूरत माली कैसे हो सकता है। आप मुझे माली लो। खैर, हमने सतीश को माली का रोल दे दिया।
जिस गार्डन में हमने शूटिंग की, वहां से एफटीआईआई तक की तकरीबन एक घंटे की ड्राइव थी। जब हम लोग वापस लौटे, तब पता लगा कि सतीश कौशिक ने अनुपम खेर से कह दिया था कि 9 बजे बस जाएगी, जबकि सतीश कौशिक माली का रोल करने के लिए खुद बस में बैठकर 6 बजे ही चल दिए थे। इसी बात पर मुझे वसीम बरेलवी साहब का एक शेर याद आ रहा है:
जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा किसी चराग का अपना मकां नहीं होता
वक्त गुजरा। 8-10 साल के बाद पंकज पाराशर ने फिल्म ‘जलवा’ शुरू की। बकौल पाराशर, मैंने सतीश को उसमें सब-इंस्पेक्टर रामू घड़ियाली के रोल में लिया। शूटिंग गोवा में थी। तो हम लोग बस से आते-जाते थे। जॉनी लीवर भी शुरुआत कर रहे थे। बस में जॉनी लीवर ने अशोक कुमार की बड़ी कमाल की एक्टिंग करके दिखाई तो मैंने कहा, अरे इसको तो फिल्म में डाल दो। फिर कुछ और सुनाया तो मैंने अपने असिस्टेंट से कहा कि ये भी फिल्म में डाल दो। रात को सतीश ने मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया। मैंने पूछा, क्या हुआ तो वो बोले कि यार तुम उसका रोल बढ़ा रहे हो, मेरा रोल नहीं बढ़ा रहे। मैंने कहा, भाई तुम्हारा रोल परफेक्ट है, तो वो बोले कि मैंने एक सीन बनाया है। बहुत शानदार, फिल्म में डालो। देखना बहुत बड़ा हिट होगा। बस, किसी बड़े स्टार को गेस्ट में ले आओ। मैंने कहा, अब अनुपम खेर बहुत बड़ा स्टार बन गया है, उसी को ले लेते हैं। तो वो बोले नहीं, अमिताभ बच्चन को लाओ। उनके साथ ये सीन करूंगा। मेरी गारंटी है सीन हिट होगा।
मैंने अपने प्रोड्यूसर गुल आनंद को इस बारे में बताया तो वे बोले कि देखो मैं अमिताभ बच्चन को ला नहीं सकता, लेकिन तुम्हारी उनसे मीटिंग करवा सकता हूं। तो मीटिंग फिक्स हो गई। वे फिल्म सिटी में फिल्म ‘शहंशाह’ की शूटिंग कर रहे थे। हम लोग फिल्म सिटी पहुंच गए। अमित जी मिले तो मैंने कहा कि सर आपसे एक छोटा-सा गेस्ट अपीयरेंस करवाना है। सीन पूछा तो बताया कि सतीश कौशिक फेंकता रहता है कि अमिताभ बच्चन मेरे दोस्त हैं और एक दिन आप आ आएंगे और बस ‘नो’ कहकर चले जाएंगे। वे राजी तो हो गए, लेकिन फिर बोले कि मेरे पास डेट्स नहीं हैं। 18 दिन तो मैं यहां शहंशाह की शूटिंग कर रहा हूं। तो मैंने कहा कि सर एक काम करेंगे। हम यहां कैमरा लेकर आ जाएंगे। आपको बस पीछे से 2 मिनट के लिए आना है, ‘नो’ बोलना है और चले जाना है।
अगले दिन हमने रिहर्सल की। इसमें सतीश ने अपना डायलाग बोला और फिर इम्प्रोवाइज करने से वो पूरे एक पेज का सीन बन गया। इसके अगले दिन 11 बजे खबर आई कि अमित जी आ रहे हैं। शॉट रेडी कर लो। हमने शॉट रेडी कर लिया। अमित जी आए तो मुझसे बोले कि चलो, कर लेते हैं, ‘नो’ तो कहना है। मैं बोला, सर एक पूरा सीन है। एक पूरे पेज का सीन देखकर बच्चन साहब ने मना कर दिया। मगर वो सीन हुआ और इसका क्रेडिट जाता है सतीश कौशिक को, क्योंकि जैसे ही बच्चन साहब ने ‘नो’ बोला, सतीश कौशिक आगे बढ़े और बोले कि आप पढ़िए मत, मैं आपको एक्टिंग करके दिखाता हूं। इसके बाद सतीश कौशिक एक्टिंग करने लगे। अमित जी की स्टाइल में उनका डायलाग भी बोला। अमित जी ने भी गौर से देखा। फिर उन्होंने पेज लिया, देखा और पूछा- क्या दोगे मुझे? मैं बोला, गुलाब का फूल। अमित जी ने कहा चलो टेक करो। फिर अमित जी ने एक टेक में शॉट ओके कर दिया। इस तरह ‘जलवा’ के इस जबरदस्त सीन का क्रेडिट सतीश कौशिक को जाता है। इसी बात पर उनकी याद में उनकी फिल्म ‘जलवा’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।
देखो देखो ये है जलवा…








