गुणवंत शाह55 मिनट पहले
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सेलेब्रिटीज अपने जीवन को बिंदास मस्ती में डूबकर जीते हैं। एक ऊंचाई तक पहुंचने के बाद वे हर ‘आई डोंट केयर एटीट्यूड’ के मुहावरे को सार्थक कर देते हैं। शिखर पर रहते हुए निम्नस्तरीय लोक-निंदा उन्हें अधिक परेशान नहीं करती। लोक-निंदा तो मध्यम वर्ग के लोगों को ही नश्तर की चुभती रहती है। याद रखिए, रामायण का धोबी कभी मरता नहीं। पराई पंचायत के कारण मनुष्य को जो यातनाएं सहनी पड़ती हैं, उन्हें देखकर किसी बड़े-से-बड़े साधु के मन में भी करुणा नहीं उपजती। मानव निरंतर ऐसे जीता है, मानो अदालत के कटघरे में खड़ा हो। वह स्पष्टीकरण भी ऐसे देता है, जैसे गवाही दे रहा हो। हमारे जीवन की चाबी हमेशा दूसरों के हाथ में क्यों लगी रहती है? कौन-सा भय हमें लगातार डराता रहता है? इसका एकमात्र उत्तर है- इज्जत खो देने का डर।
अगर हमारा बस चले, तो हम अपनी मस्ती में खलल डालने वालों से साफ कह दें – ‘यू शट अप! दिस इज माई लाइफ।’ जो कोई हमारे निर्मल आनंद में बाधा डालता है, वही खलनायक है। खलनायकों की बुरी आदत होती है कि वे निजता की लक्ष्मण रेखा लांघकर हमारी मस्ती लूट लेते हैं।
संवेदनशील व्यक्ति को कुचल देने में आनंद लेने वाले दुष्टों की मानव इतिहास में कभी कमी नहीं रही। अब तो ये दुष्ट लोग भद्रता का मुखौटा पहनकर घूमने लगे हैं, इसलिए उनसे मिलने वाली पीड़ा भी छिपी रहती है। गुमनाम पत्र जितना कष्ट पहुंचाता है, उससे कई गुना अधिक पीड़ा किसी दुष्ट व्यक्ति का टेलीफोन पहुंचा सकता है।
ऐसा लगता है कि विज्ञान के उपकरण अधिकतर आतंकवादियों के ही काम आते हैं। पुलिस के पास पुरानी बंदूकें होती हैं, जबकि माफिया गिरोह रॉकेट लांचर से हमला करते हैं। वैज्ञानिक निष्फल हो सकते हैं, लेकिन माफिया गिरोह कभी विफल नहीं होता। उन्हें नाकामयाबी से चिढ़ होती है, इसलिए वे बहुत करीब से निशाना साधते हैं और किसी को मौत की नींद सुलाकर भाग जाते हैं। हमारे बचपन से ही गुप्त गुलामी शुरू हो जाती है। हर मां प्यार के नाम पर बच्चे की इच्छा के खिलाफ उसके मुंह में खाने का कौर ठूंसती रहती है। बच्चा रो-रोकर मना करना चाहता है, लेकिन मां उसकी असली भूख का अधिकार स्वीकार नहीं करती। बच्चे को मोटा-तगड़ा देखकर माता-पिता खुश होते हैं। सुखी घरों में कभी-कभी ‘हाइब्रिड’ बच्चे दिखाई देते हैं, जो अपेक्षाकृत अधिक भरे-पूरे होते हैं। उन पर अभिभावकों की अपेक्षाओं का भारी बोझ होता है। माता-पिता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्हें बड़े व महंगे स्कूलों में भेजा जाता है। अगर बच्चे का बस चले, तो वह भी कह सकता है – यू शट अप! दिस इज माई लाइफ।
कुछ बच्चों को दूध पीना अच्छा नहीं लगता, फिर भी वे पीते हैं। दूसरी ओर कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें दूध पीना अच्छा लगता है, लेकिन उन्हें दूध नसीब नहीं होता। उपदेशों के बोझ तले दबे लोगों की जीवन का आनंद लेने की आकांक्षा किसी न किसी कारण से अपमानित होती ही रहती है। उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है, इन्हीं दो हिस्सों में बंटे जीवन में सहजता की एक चुटकी भी न बचे, ऐसी आबोहवा धर्म के नाम पर सदियों से बनाई गई है। जब सहजता विलुप्त हो जाती है, तब समाज में मुस्कान का अकाल पड़ जाता है। असली मुस्कान खो चुके धनाढ्य लोगों को बनावटी मुस्कान से ही काम चलाना पड़ता है। देश में सहज मुस्कान की मालकिन कितनी नारियां हैं? जीवन स्तर भी मुस्कान स्तर के बिना टिकता नहीं है। सहज मुस्कान बच्चों और आदिवासियों से भी दूर होती जा रही है। एयर होस्टेस के चेहरे पर जो मुस्कान होती है, वह ‘पेड’ यानी वेतनभोगी मुस्कान होती है। उसमें भीतर की सच्ची ऊष्मा नहीं होती। मुस्कान के बिना चेहरा ऐसा लगता है, जैसे बिना लौ की मोमबत्ती।
दूर रह जाता है कल्पित ‘स्वतंत्रता का स्वर्ग’ सामान्य मनुष्य पर चारों दिशाओं से मतों, मान्यताओं, पूर्वग्रहों, मूल्यों और अपेक्षाओं के तीर चलते रहते हैं। परंपरा के ये तीखे तीर वह सहता रहता है। हर तरह से गुलाम बना यह आदमी अपने आंसू पोंछता जाता है और साथ ही अपनी मुस्कान भी बिखेरता रहता है। कहीं उसकी स्वाभाविक आकांक्षाओं को स्वीकार नहीं किया जाता, कहीं उसकी प्रत्यक्ष और पीड़ादायक गुलामी पर करुणा का लेप नहीं किया जाता। रवींद्रनाथ टैगोर के नाटक ‘क्षुधिते पाषाण’ यानी भूखे पत्थर में चौकीदार के शब्द वह अपनी निजी मजबूरी के साथ मन ही मन दोहराता रहता है – सब ठीक है। रवींद्रनाथ द्वारा कल्पित ‘स्वतंत्रता का स्वर्ग’ बहुत दूर रह जाता है, जहां चित्त भयमुक्त हो और सिर ऊंचा रखकर चला जा सके।








