रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  जब केवल एक सीन करने राजी हो गए थे शत्रुघ्न सिन्हा
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: जब केवल एक सीन करने राजी हो गए थे शत्रुघ्न सिन्हा

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रूमी जाफरी3 घंटे पहले

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मेरे हिस्से के किस्से में आज बात उस स्टार की, जिसने फिल्म इंडस्ट्री में हीरो बनने के तय मापदंडों (जैसे खूबसूरत होना, गोरा-चिट्टा होना, अच्छी बॉडी और अच्छा डांसर होना) के बिल्कुल विपरीत रहते हुए भी अपनी आवाज, अपने एटिट्यूड और अपने अभिनय के अलग अंदाज के दम पर न सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री, बल्कि राजनीति में भी अपनी जगह बनाई और शिखर तक पहुंचे। मगर आज हम सिर्फ उनके फिल्मी जीवन की ही बात करेंगे। जी हां, वह स्टार हैं खलनायक से नायक बने महान अभिनेता, जिन्हें रजनीकांत भी अपना गुरु और आइडियल मानते हैं – शत्रुघ्न सिन्हा जी।

मैं आज आपको उनके बिल्कुल शुरुआती दिनों का एक यादगार किस्सा सुनाता हूं। बात 1966-67 की है, जब एफटीआईआई से पास होने के बाद शत्रु जी बॉम्बे आए। वे विले पार्ले वेस्ट में कृष्णा कुंज नाम के एक गेस्ट हाउस में रहने लगे। उन्हीं के बैच के एक एक्टर थे प्रेमेन्द्र। शत्रु जी बताते हैं कि वे बहुत ही खूबसूरत थे, एकदम मनोज कुमार की तरह लगते थे। पास होने से पहले ही उन्हें प्रोड्यूसर और डायरेक्टर पुणे आकर मिलने लगे थे कि बंबई आते ही वे उन्हें साइन करेंगे। बंबई आते ही प्रेमेन्द्र जी को कई फिल्में मिल गईं, बतौर हीरो, वो भी बड़े फिल्ममेकर्स की। शत्रु जी और प्रेमेन्द्र दोनों एफटीआईआई में पढ़े थे, इसलिए अच्छे दोस्त भी थे। शत्रु जी ने प्रेमेन्द्र से कहा कि तू तो आते ही बिजी हो गया, मुझे भी अपनी फिल्मों में काम दिला दे। तो प्रेमेन्द्र जी ने कुछ डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स से शत्रु जी को मिलवाया। उनमें विजय भट्ट जी भी थे।

विजय भट्ट जी ने शत्रु जी से कहा, मेरी फिल्म में सिर्फ एक ही दिन का रोल है, सिर्फ एक ही सीन है, करोगे? शत्रु जी ने कहा, मैं तो एक्टिंग करने आया हूं। चाहे एक सीन का रोल हो या एक घंटे का, मेरा काम एक्टिंग करना है। उन्होंने तुरंत हां कर दी। जब उन्होंने सीन शूट किया तो विजय भट्ट बहुत प्रभावित हुए और बोले, इस लड़के में कुछ अलग और खास बात तो है। फिर कुछ ऐसा हुआ कि जो किरदार माला सिन्हा के पति का था, उसे निभाने वाले अभिनेता डेट वगैरह को लेकर प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को परेशान करने लगे। तब कहानी में थोड़ा बदलाव किया गया। जो जुल्म माला सिन्हा पर पति से करवाया जा रहा था, वही बेटे से करवाने का फैसला लिया गया। प्रेमेन्द्र से कहा गया कि अपने उस दोस्त शत्रु को भेजो, उसका रोल बढ़ गया है। बेटे का रोल शत्रु जी को दे दिया गया और उनके सीन बढ़ते गए।

शत्रु जी इतनी अच्छी एक्टिंग कर रहे थे कि डायरेक्टर और प्रोड्यूसर उनके रोल लगातार बढ़ाते गए और प्रेमेन्द्र के सीन कम होते गए। फिर एक वक्त ऐसा आया कि दोनों का रोल बराबर का हो गया। इधर धर्मेंद्र और वैजयंती माला की फिल्म ‘प्यार ही प्यार’ रिलीज हुई। उसमें शत्रु जी का सिर्फ एक ही सीन था, वह भी टेलीफोन पर और उस एक सीन में भी उन्हें तालियां मिलीं। शत्रु जी कहते हैं, रोल अच्छा या बुरा नहीं होता, एक्टर अच्छा या बुरा होता है। एक एक्टर अपने हुनर से एक ही सीन में दिखा सकता है कि वह कितना अच्छा कलाकार है। इसी बात पर मुझे बशीर बद्र का एक शेर याद आता है :

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

यह जो प्रेमेन्द्र, माला सिन्हा और शत्रु जी की फिल्म थी, उसका नाम था ‘होली आई रे’। फिल्म पूरी होने के बाद इसी दौरान शत्रु जी के गेस्ट हाउस में कोई समस्या हो गई, इसलिए उन्हें गेस्ट हाउस छोड़ना पड़ा। वे प्रेमेन्द्र के घर जाकर रहने लगे, क्योंकि दोनों खास दोस्त थे। अब शत्रु जी की फिल्म इंडस्ट्री में तारीफ होने लगी। प्रोड्यूसर और डायरेक्टर उनसे घर आकर मिलने लगे, उन्हें ऑफर देने लगे।

चूंकि शत्रु जी प्रेमेन्द्र के साथ रहते थे, इसलिए ये सारी मीटिंग्स प्रेमेन्द्र के घर पर ही होती थीं। यह प्रेमेन्द्र को अच्छा नहीं लगता था। उन्हें लगता था कि एक तो ‘होली आई रे’ में मेरा रोल छोटा हो गया, इसका बड़ा हो गया, और ऊपर से ये सारी मीटिंग्स मेरे ही घर में कर रहा है। फिर एक दिन प्रेमेन्द्र जी ने शत्रु जी से कहा, देखो शत्रु, एक म्यान में दो तलवार और एक घर में दो हीरो नहीं रह सकते। तुम कहीं और रहने का इंतजाम कर लो। शत्रु जी उसी वक्त घर से निकल गए। और कुदरत का खेल देखिए- शत्रु जी हीरो बने, और टॉप के हीरो बने। आज तक उनका नाम फिल्म इंडस्ट्री और राजनीति, दोनों में इज्जत के साथ कायम है।

मेरी दुआ है कि शत्रु जी हमेशा स्वस्थ रहें, खुश रहें। आज उनकी फिल्म ‘कालीचरण’ का यह गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए, खुश रहिए:

एक बटा दो, दो बटे चार …



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