रसरंग में मायथोलॉजी:  किस तरह पर्वतों और नदियों से जुड़े हैं शिव और विष्णु!
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रसरंग में मायथोलॉजी: किस तरह पर्वतों और नदियों से जुड़े हैं शिव और विष्णु!

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देवदत्त पट्टनायक4 घंटे पहले

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कर्नाटक के ऐहोले स्थित करीब 1200 वर्ष पुराना वराह अवतार मंदिर।
यह विष्णु के वराह अवतार के दुर्लभ मंदिरों में से एक है। (फोटो साभार: साराह
वेल्च) - Dainik Bhaskar

कर्नाटक के ऐहोले स्थित करीब 1200 वर्ष पुराना वराह अवतार मंदिर। यह विष्णु के वराह अवतार के दुर्लभ मंदिरों में से एक है। (फोटो साभार: साराह वेल्च)

शक्ति पीठों के माध्यम से भी भारत के नक्शे को समझा जा सकता है। मान्यता है कि जब देवी सती अपने पिता दक्ष प्रजापति द्वारा शिव का अपमान सहन नहीं कर सकीं, तो उन्होंने यज्ञ वेदी में छलांग लगा दी। इस घटना से शोकाकुल होकर शिव सती के निर्जीव शरीर को लेकर भटकते रहे। उनके शरीर के अंग भारत के विभिन्न हिस्सों में गिरते गए और उन्हीं स्थानों पर शक्ति पीठों की स्थापना हुई।

कुछ इसी तरह की अवधारणा बौद्ध परंपरा में भी दिखाई देती है। बुद्ध के अंतिम संस्कार के बाद उनके अवशेष भारत के कई स्थानों पर ले जाए गए और उन्हें स्तूपों में प्रतिष्ठित किया गया। इस प्रकार, बुद्ध के अवशेषों से जुड़े तीर्थ स्थलों के माध्यम से भी भारत के भूगोल को समझा जा सकता है।

हिंदू आख्यानों में कई बार शरीर को आधार बनाकर क्षेत्रों की कल्पना की गई है। विष्णु पुराण के अनुसार, सृजन के समय योगनिद्रा में लीन विष्णु के कानों में मैल जमा हो गया, जिससे मधु और कैटभ नामक असुर पैदा हुए। उन्होंने सृष्टि की शांति भंग कर दी। तब विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल पर विराजमान ब्रह्मा ने उन्हें जागने का आग्रह किया। विष्णु के जागने पर असुरों से युद्ध हुआ। उस समय संपूर्ण सृष्टि जलमग्न थी और ठोस भूमि का अस्तित्व नहीं था। विष्णु ने मधु और कैटभ को अपनी जांघों पर रखकर उनका वध किया और उनके शरीर के अंगों से महाद्वीपों की रचना हुई। इस प्रकार ठोस भूमि को मधु और कैटभ का रूप माना गया। इसी क्रम में हिरण्याक्ष की कथा आती है, जिसने भू-देवी को समुद्र के नीचे छिपा दिया था। तब विष्णु ने वराह अवतार धारण कर उन्हें बचाया। भू-देवी को ऊपर लाते समय वराह ने उन्हें कसकर पकड़ा, जिससे उनकी सतह पर पर्वत और घाटियों का निर्माण हुआ।

गयासुर की कथा भी इसी परंपरा से जुड़ी है। उसकी तपस्या और पवित्रता से वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया था। विष्णु ने उसे लेटने के लिए कहा ताकि ब्रह्मा उसके शरीर पर यज्ञ कर सकें। यज्ञ के प्रभाव से गयासुर की हड्डियां धातु में परिवर्तित हो गईं, जिनका खनन आज भी किया जाता है। एक क्षेत्रीय दंतकथा के अनुसार, गयासुर का शरीर बिहार के गया नगर से लेकर ओडिशा के समुद्र तट तक फैला हुआ है। इसी क्षेत्र में लौह अयस्क पाया जाता है। माना जाता है कि इसी कारण लगभग 2300 वर्ष पहले सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था। इस कथा में आख्यान, इतिहास और भूगोल का अद्भुत मेल दिखाई देता है।

शिवलिंग को उत्तर की ओर झुके पत्ते के आकार के द्रोण पर स्थापित किया जाता है, जिससे शिव पर चढ़ाया गया जल सदैव उत्तर दिशा की ओर बहता है। यह संकेत करता है कि शिव का संबंध उत्तर भारत से है, क्योंकि वे कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। पार्वती पर्वतों की देवी हैं और उनके पिता हिमवान को भारत की समस्त पर्वत शृंखलाओं का जनक माना जाता है। विष्णु के ससुर सागर हैं, जो भारत के दक्षिण में स्थित हैं। सभी नदियों को सागर की पुत्रियां माना जाता है। इस प्रकार शिव और विष्णु भारत के पर्वतों, नदियों और सागरों से गहराई से जुड़े हुए हैं।

दुर्गा को पार्वती का ही एक रूप माना जाता है। चूंकि उन्होंने महिषासुर का वध किया था, इसलिए यह विश्वास है कि भारत भर के अनेक दुर्गों में देवी का वास है। इसका एक उदाहरण मैसूर है, जहां महिषासुर भी निवास करता था। यह नगर उन पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है जहां देवी ने चंड और मुंड नामक असुरों का वध किया था। इसी कारण देवी को चामुंडेश्वरी या चामुंडा कहा जाता है और मान्यता है कि उन्होंने ही महिषासुर का अंत किया था। पार्वती काशी से भी जुड़ी हैं, जहां वे अन्नपूर्णा के रूप में काशीवासियों का पालन-पोषण करती हैं।

दक्षिण भारत के घाटों और नदियों की उत्पत्ति से जुड़ी कथाएं भी अत्यंत रोचक हैं। मंदिर परंपराओं के अनुसार, एक समय पृथ्वी उत्तर दिशा की ओर झुकी हुई थी, क्योंकि समस्त भारत से ऋषि ज्ञान प्राप्त करने कैलाश पर्वत जाते थे। तब शिव के आग्रह पर अगस्त्य ऋषि पृथ्वी का संतुलन बनाए रखने हेतु वेदों का ज्ञान लेकर दक्षिण दिशा की ओर गए। मध्य भारत में स्थित विंध्य पर्वत उनके लिए झुक गए और मार्ग बना दिया, इसी कारण विंध्य पर्वत अपेक्षाकृत कम ऊंचे हैं। अगस्त्य ऋषि हिमालय से अपने साथ पर्वत और कमंडल में गंगाजल ले गए। ये पर्वत गिरकर पूर्वी और पश्चिमी घाट बने और गंगाजल से दक्षिण भारत की नदियों की उत्पत्ति हुई। इसी कारण गोदावरी जैसी नदियों को दक्षिण गंगा कहा जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार, कार्तिकेय और शिव के बीच मतभेद होने पर कार्तिकेय क्रोधित होकर कैलाश पर्वत छोड़कर दक्षिण की ओर चले गए। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की सीमा पर स्थित क्रौंच गिरि नामक पर्वत उनके मार्ग में आया, जिसे उन्होंने अपने भाले से चीर दिया। मान्यता है कि सूरपद्मन नामक असुर ने इस पर्वत का रूप धारण किया था। क्रौंच गिरि के पूर्व में मल्लिकार्जुन पर्वत स्थित है, जहां शिव ने कार्तिकेय से कैलाश लौटने का आग्रह किया था, किंतु कार्तिकेय ने मना कर दिया और तमिलनाडु की ओर आगे बढ़ गए।

अगले लेख में हम जानेंगे कि किस प्रकार अन्य देवी-देवता भी भारत की विभिन्न जगहों से जुड़े हुए हैं।



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