पाकिस्तान इन दिनों सेंसरशिप के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। सरकारी संस्थाओं के दबाव में पांच से अधिक टीवी एंकरों को ऑफ-एयर कर दिया गया है। कई लोग पाकिस्तान छोड़कर जा चुके हैं। पाकिस्तान में बस कहने मात्र को लोकतंत्र है, जबकि हकीकत तो यह है कि विपक्ष
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लेखकों, पत्रकारों और राजनेताओं के लिए अब एकमात्र विकल्प लिटरेचर फेस्टिवल (साहित्यिक उत्सव) रह गए हैं। ये सरकारी दमन के खिलाफ नागरिक प्रतिरोध के नए मंच बनते जा रहे हैं। पिछले हफ्ते लाहौर में एक के बाद एक दो लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित हुए, जहां युवा पाकिस्तानियों को शब्दों की आजादी का अहसास हुआ, जब उन्हें कुछ प्रमुख पाकिस्तानी और भारतीय हस्तियों के गैर-सरकारी नजरिये को सुनने व जानने का मौका नसीब हुआ।
इस साल एक तरफ जहां लाहौर में चैम्पियंस ट्रॉफी आयोजित हो रही थी तो दूसरी ओर फैज लिटरेरी फेस्टिवल और लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल भी हो रहे थे। फैज लिटरेरी फेस्टिवल में भारतीय अभिनेत्री और निर्देशक नंदिता दास फोकस में रहीं। वे कई सालों बाद पाकिस्तान आई थीं।

लाहौर में आयोजित फैज लिटरेरी फेस्टिवल में अपनी प्रशंसक के साथ नंदिता दास (बाएं)।
उन्होंने 2018 में फिल्म ‘मंटो’ का निर्माण किया था, लेकिन बदकिस्मती से यह फिल्म पाकिस्तान में बैन कर दी गई थी। नंदिता दास से पहले पाकिस्तानी निर्देशक बाबर जावेद ने भी 2015 में ‘मंटो’ नाम की ही एक फिल्म बनाई थी। लेकिन पाकिस्तान में नंदिता दास की बनाई गई मंटो को अधिक तारीफ मिली। उनकी यह फिल्म मंटो की असल दास्तान के बहुत करीब थी, जिन्हें पाकिस्तान में अपनी लेखनी के कारण उत्पीड़न और सेंसरशिप का सामना करना पड़ा था।
फैज लिटरेरी फेस्टिवल में नंदिता दास की मौजूदगी मेरे जैसे पत्रकारों के लिए बहुत संतोषजनक थी, जो मंटो की तरह ही राजद्रोह और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के आरोपों का सामना करते आए हैं। फैज अहमद फैज और सआदत हसन मंटो, दोनों ही पत्रकार थे। जब मंटो पर अपनी कहानी ‘ठंडा गोश्त’ के लिए अश्लीलता का मुकदमा चलाया गया था तो फैज अदालत में गवाह के रूप में पेश हुए थे।
उन्होंने अपनी गवाही में कहा था कि ‘ठंडा गोश्त’ को कोई बहुत ऊंचे दर्जे का साहित्य तो नहीं कहा जा सकता, मगर बेशक यह अश्लील भी नहीं है। मैं अक्सर लाहौर, इस्लामाबाद और कराची के साहित्य उत्सवों में फैज की इस भूमिका के बारे में बात करता हूं। फैज ने अपने मित्र मंटो को बचाने की कोशिश की थी, लेकिन आज के लेखकों और पत्रकारों में इस तरह का चरित्र नहीं दिखता। वे एक-दूसरे की मदद करने के बजाय अक्सर एक-दूसरे के लिए गड्ढे खोदते रहते हैं।
बहरहाल, पाकिस्तान और भारत एक-दूसरे के मुल्कों में क्रिकेट नहीं खेल रहे हैं, लेकिन उनके लेखक और फिल्म निर्माता साहित्यिक उत्सवों में भाग ले रहे हैं। किश्वर नाहीद, मोनी मोहसिन और फातिमा भुट्टो जैसे अनेक पाकिस्तानी लेखकों ने कई बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भाग लिया है। मैंने भारतीय इतिहासकार रोमिला थापर, जावेद अख्तर और गुलजार से कई बार लाहौर और कराची के लिटरेचर फेस्टिवल्स में मुलाकात की है।
पिछले हफ्ते लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल में मेरी एक भारतीय पत्रकार से मुलाकात हुई, जो शाहिद सिद्दीकी की एक उर्दू किताब (जिसके कवर पर मो. रफी, साहिर लुधियानवी, देव आनंद और गुलजार के स्केचेस बने थे) में गहरी रुचि ले रहे थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि इस किताब का नाम क्या है। मैंने उन्हें बताया कि इसका नाम ‘आसमान-दर-आसमान’ है और यह किताब उन प्रमुख भारतीय हस्तियों के बारे में है, जो पाकिस्तान से ताल्लुकात रखते थे और यहां से चले गए थे। उन्होंने यह सुनकर कहा, ‘उपमहाद्वीप के महान कवियों, गायकों और अभिनेताओं को श्रद्धांजलि देने के लिए क्या खूबसूरत नाम है!’
ये भारतीय पत्रकार चैम्पियंस ट्रॉफी मैचों की कवरेज के लिए लाहौर आए थे और साथ ही लिटरेचर फेस्टिवल का भी आनंद ले रहे थे। उन्होंने इस किताब के अंग्रेजी संस्करण के बारे में पूछा, लेकिन दुर्भाग्यवश इसका कोई अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध नहीं था। अगले दिन मुझे अपने पुराने शिक्षण संस्थान गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी (जीसीयू) में आमंत्रित किया गया था।
इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों को ‘रवियन्स’ कहा जाता है। कुछ पुराने रवियन्स ने इकबाल हॉस्टल में एक बैठक आयोजित की। यह वही हॉस्टल है, जहां जाने-माने कवि डॉ. मुहम्मद इकबाल और प्रसिद्ध भारतीय अभिनेता देव आनंद बतौर छात्र रहते थे।
इस कॉलेज के एक वरिष्ठ शिक्षक असगर नदीम सैयद मेरे अच्छे मित्र हैं। उन्होंने मुझे बताया कि देव आनंद 1943 में इस संस्थान के छात्र थे। 1999 में जब तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक शांति प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान आया तो देव आनंद भी उसका हिस्सा बने थे।
एक दिन उन्होंने जीसीयू प्रशासन से संपर्क करके गुजारिश की कि वे भारत लौटने से पहले अपने पुराने शिक्षण संस्थान में आना चाहते हैं। उसी शाम असगर नदीम सैयद ने जीसीयू में देव आनंद की अगवानी की। देव आनंद अपनी पुरानी कक्षा को देखना चाहते थे। जब वे अंग्रेजी विभाग में पहुंचे तो उन्होंने अपनी कक्षा को पहचान लिया और वे वहां की दीवार पर हाथ रखकर रोने लगे।
अब ओल्ड रवियन्स यूनियन देव आनंद के बेटे सुनील आनंद को जीसीयू आमंत्रित करना चाहती है। चूंकि सुनील आनंद को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करना उनके लिए मुश्किल होता। इसलिए उन्होंने लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों से गुजारिश करने का फैसला किया, क्योंकि साहित्य उत्सव ही एकमात्र ऐसा मंच है जो शांति और स्वतंत्रता की आशा जगाता है, जहां पाकिस्तानी और भारतीय खुलकर मिल सकते हैं और एक-दूसरे का अभिवादन कर सकते हैं।
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