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क्या बीमार होना किसी इंसान की निजी नाकामी, गलती या उसके चरित्र की कमजोरी है? सुनने में यह अजीब लग सकता है, लेकिन आज के दौर में ऐसी सोच तेजी से पैर पसार रही है, जिसमें बीमार को ही उसकी बीमारी के लिए जिम्मेदार माना जाने लगा है। अमेरिकी लेखक टॉम लेवेन्सन ने उस खतरनाक सोच पर सवाल उठाए हैं, जिसमें सेहत को ‘धार्मिक विश्वास, आचार-विचार’, खान-पान और कसरत से जोड़कर देखा जा रहा है। वैक्सीन विरोध और ‘सदाचारी जीवन’ के नाम पर बीमारों को दोषी ठहराना खतरनाक विचार है। ‘ए पॉक्स ऑन फूल्स’ के लेखक लेवेन्सन के मुताबिक, समाज में यह खतरनाक धारणा बनाई जा रही है कि अगर आप बीमार हैं, तो इसके जिम्मेदार आप खुद हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य मंत्री रॉबर्ट एफ. केंनेडी जूनियर जैसे नेताओं और ‘मेक अमेरिका हेल्दी अगेन’ (माहा) जैसे आंदोलनों का हवाला देते हुए लेवेन्सन कहते हैं कि जब नेता यह बयान देते हैं कि ‘एक स्वस्थ इंसान को खसरा नहीं मार सकता’, तो अनजाने में वे उन लोगों को दोषी ठहरा रहे होते हैं जो गंभीर रूप से बीमार पड़ जाते हैं। विज्ञान कहता है कि सिर्फ अच्छा खाना और कसरत करना ही किसी महामारी से बचने की गारंटी नहीं है, इसके लिए मेडिकल साइंस की जरूरत है। लेवेन्सन ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है कि क्रॉनिक ऑटोइम्यून बीमारी से पीड़ित उनकी बहन के साथ सैन फ्रांसिस्को के एक म्यूजियम पार्क में खांसी का दौरा पड़ने पर वहां मौजूद लोगों ने ऐसे देखा जैसे उन्होंने (बहन) कोई अपराध कर दिया हो। लोग गुस्से में वहां से उठकर चले गए। बीमार होने को आज ‘शर्मनाक’ मानने की गलत परंपरा बन रही है। व्यक्तिगत आदत को बीमारी की वजह मानना गलत टॉम लेवेन्सन बताते हैं कि 19वीं सदी के कवि वॉल्ट व्हिटमैन से लेकर 20वीं सदी के शुरुआती प्राकृतिक चिकित्सकों तक, सबने यही ज्ञान दिया कि ‘बीमारी की वजह बुरी आदतें हैं।’ आजकल हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स भी इसी ढर्रे पर चल रहे हैं। वे दावा करते हैं कि ‘सकारात्मक सोच’ और ‘प्राकृतिक नुस्खे’ ही सब कुछ हैं। जबकि न्यूरोसाइंटिस्ट्स और हेल्थ एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि खुद को अपनी किस्मत का कप्तान समझना एक मुगालता है। कोई भी सकारात्मक सोच या हरी सब्जियां आपको वायरस के जानलेवा हमले से पूरी तरह नहीं बचा सकतीं है।
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