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बॉलीवुड अभिनेत्री आलिया भट्ट आज उस मुकाम पर हैं जहां वे करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा हैं, लेकिन अपनी बेटी राहा के मामले में वे भी किसी भी सामान्य मां की तरह ही उलझनों और आशंकाओं से भरी रहती हैं। चेन्नई में एक कार्यक्रम के दौरान आलिया ने आध्यात्मिक गुरु सद् गुरु जग्गी वासुदेव के सामने मन की ऐसी बातें रखीं, जो आज के दौर के हर ‘चिड़चिड़े व चिंतित’ माता-पिता की कहानी है। मार्च अंत में हुए इस संवाद का वीडियो अब सामने आया है। आलिया की इन चिंताओं के लिए सद् गुरु ने कुछ समाधान भी सुझाए। यह अन्य पैरेंट्स के लिए भी मददगार हो सकते हैं, पढ़िए… आलिया- मुझे चिंता है, क्या मैं अच्छी मां हूं? सद् गुरु- चिंतित माता-पिता कभी अच्छे पैरेंट्स नहीं हो सकते। पैरेंटिंग का अर्थ यह नहीं है कि आप बच्चे को क्या ‘सिखाते’ हैं, बल्कि यह है कि आप उसके सामने खुद को कैसे ‘पेश’ करते हैं। यदि खुद तनाव और चिंता में हैं, तो बच्चा आपसे वही सीखेगा। आलिया- बेटी को भविष्य के लिए कैसे तैयार करें? सद् गुरु- आलिया आप शानदार महिला हैं, पर आपके और बेटी राहा के बीच, ज्यादा खुश कौन रहता है? आलिया ने कहा- ‘बेशक, राहा!’ इस पर सद् गुरु ने कहा- 3 से 6 साल की उम्र के बच्चे जीवन के सबसे करीब होते हैं। वे बिना वजह के खुश रहना जानते हैं। हम अक्सर मानते हैं कि हमें बच्चे को ‘सही’ और ‘गलत’ की घुट्टी पिलानी है। सिखाने के बजाय ‘अवलोकन’ करें। बच्चे को सिर्फ एक सुरक्षित और खुशहाल माहौल दें, बाकी वह अपनी प्रकृति के अनुसार खुद विकसित होगा। एक माता-पिता के तौर पर आपके पास उन्हें सिखाने के लिए क्या है? बल्कि सच तो यह है कि आपको उनसे सीखना चाहिए कि जीवन को इतनी सहजता और आनंद के साथ कैसे जिया जाए। आलिया- राहा हमेशा जीतना चाहती है, और उससे जीतने वाले को धोखेबाज बताती है। सद् गुरु- ऐसा करके वह निराशा जता रही होती है। इसे ईमानदारी का पैमाना न बनाएं। हम बच्चों को बहुत जल्दी ‘नैतिकता के पाठ’ पढ़ाने लगते हैं। राहा को ‘सही व्यवहार’ सिखाने के बजाय खुद उसके साथ बच्चे की तरह खेलें। जब वह आपको खेलते हुए व हार-जीत को सहजता से लेते हुए देखेगी, तो वह अपने आप सीख जाएगी। आलिया- बच्चे बिना तर्क के सवाल करते हैं.? सद् गुरु- जवाब ‘तथ्यों’ में देने के बजाय, उनकी ‘जिज्ञासा’ को जीवित रखें। अगर नहीं जानते, तो साफ कहें,‘मुझे नहीं पता, चलो मिलकर पता लगाते हैं।’ वैसे भी भविष्य में जानकारी की वैल्यू कम हो जाएगी क्योंकि एआई सब संभाल लेगा। ऐसे में बच्चे के पास सिर्फ उसकी ‘चेतना’ व ‘आनंद’ ही उसकी असली ताकत होगी। इसलिए उसे रटाने के बजाय ‘जागरूक’ बनाना जरूरी है। आलिया- बढ़ते बच्चों से तालमेल कैसे बिठाएं? सद् गुरु- ‘पैरेंटिंग’ शब्द दिमाग से निकाल दें। बस अच्छे दोस्त और मार्गदर्शक की तरह बच्चे के साथ रहें। जब ‘पैरेंट’ होने का बोझ उठाते हैं, तो आप अनजाने में तानाशाह बन जाते हैं। पैरेंटिंग कोई ‘परफेक्शन’ की दौड़ नहीं है। यह एक साथ बढ़ने की यात्रा है। अगर बेहतर इंसान बनने पर ध्यान देंगे, तो स्वतः ही बेहतर माता-पिता बन जाएंगे।
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