![]()
दस साल का जस्टिन रेस में भाग लेता है। बहुत मेहनत करता है, पर तीसरे स्थान पर आता है। जैसे ही ब्रोंज मेडल दिखाता है, पिता कहते हैं-‘तीसरा स्थान…? थोड़ी और मेहनत करते तो पहले पर आते। वहीं, मां कहती हैं- ‘अगली बार जीतोगे तो पार्टी करेंगे।’ मनोवैज्ञानिक शहरजाद जलाली कहती हैं, ‘इन बातों से जस्टिन ने सीखा कि उसकी कीमत सिर्फ जीत व मेडल से जुड़ी है और पिता की तुलना ने डराया कि वह कभी पर्याप्त नहीं है… इन सबने मिलकर उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंचाई।’ अक्सर पैरेंट्स बच्चों की मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे बच्चे हमेशा परफेक्शन तलाशते हैं, छोटी सी विफलता पर मानसिक रूप से टूट जाते हैं। एक्सपर्ट से जानिए पैरेंट्स क्या कर सकते हैं… बिना शर्त स्वीकार्यता बच्चे को यह भरोसा हो कि उसका मूल्य केवल जीत या हार पर नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व पर टिका है। डॉ. शहरजाद कहती हैं,‘बच्चा समझे कि गलती करने पर भी पैरेंट्स का प्यार बना रहेगा, तो वह विफलता से नहीं डरेगा व आत्मविश्वास से आगे बढ़ेगा। इसके उलट, जब प्यार शर्तों पर आधारित होता है, तो बच्चे बड़े होकर परफेक्शनिस्ट बन जाते हैं और हमेशा तनाव में रहते हैं। भावनाओं को मान्यता दें पैरेंट्स अक्सर बच्चों की भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। मनोवैज्ञानिक जॉन गॉटमैन कहते हैं, भावनाओं को दबाने से बच्चे बड़े होकर खुद पर शक करने लगते हैं और सहज बुद्धि पर भरोसा नहीं कर पाते। बच्चे की भावनाओं से सहमत होना जरूरी नहीं, लेकिन उन्हें समझना जरूरी है। उसे महसूस कराएं कि उसका गुस्सा या उदासी ‘नॉर्मल’ है। दूसरों की खुशी का बोझ न दें मनोवैज्ञानिक एलिस मिलर बताती हैं कि जब बच्चे अपने पैरेंट्स की भावनात्मक जरूरतें पूरी करने में लग जाते हैं, तो वे बचपन खो देते हैं। इस स्थिति को पैरेंटिफिकेशन कहते हैं। इससे बच्चा इतना संवेदनशील हो जाता है कि अपनी खुशी से पहले पैरेंट्स के चेहरे का तनाव पढ़ने लगता है। बड़े होकर जरूरतें बताना गलत समझने लगता है, क्योंकि दूसरों को संभालना उनकी आदत बन जाती है। बच्चों को दूसरों का दुख समझना सिखाएं, लेकिन उन्हें बड़ों की भावनात्मक उलझनों का बोझ न दें। मुश्किलें खुद हल करने दें अति-सुरक्षात्मक पैरेंट्स बच्चों की हर छोटी समस्या खुद सुलझा देते हैं, पर सही तरीका यह है कि होमवर्क व्यवस्थित करना या दोस्तों के झगड़े सुलझाना जैसे काम उन्हें खुद करने दें। मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बैंड्यूरा कहते हैं,‘इस स्थिति में पैरेंट्स को कहना चाहिए- चलो मिलकर सोचते हैं कि इसके क्या विकल्प हैं।’ इससे बच्चों में आत्मविश्वास आता है कि वे दबाव में भी बेहतर काम कर सकते हैं। खुद से संवाद सिखाएं ‘सब ठीक है’ या ‘तुम महान हो’ जैसे खोखले वादे बच्चों को चुनौतियों के लिए तैयार नहीं करते। डॉ. शहरजाद कहती हैं ‘उन्हें खुद से बात करना सिखाना जरूरी है, जैसे-यह मुश्किल है, पर मैं कर सकता हूं’ या ‘मुझसे गलती हुई है और मैं इसे सुधार सकता हूं।’ ऐसा आंतरिक संवाद उन्हें तनाव में टूटने से बचाता है। परवरिश का सबक यही है कि बच्चे समझें… उनकी भावनाएं सच हैं, उनकी वैल्यू कम नहीं होगी और वे हर चुनौती झेल सकते हैं। वहीं, पैरेंट्स व्यवहार में ये छोटे बदलाव लाकर बच्चे को मानसिक रूप से सशक्त वयस्क बना सकते हैं।
Source link








