रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  उस आवाज से गुरुदत्त को मिला था एक किरदार
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: उस आवाज से गुरुदत्त को मिला था एक किरदार

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रूमी जाफरी3 घंटे पहले

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‘प्यासा’ फिल्म के सुपरहिट गाने ‘सर जो तेरा चकराए’ के एक दृश्य में
जॉनी वॉकर। - Dainik Bhaskar

‘प्यासा’ फिल्म के सुपरहिट गाने ‘सर जो तेरा चकराए’ के एक दृश्य में जॉनी वॉकर।

पिछले महीने महान एक्टर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर गुरु दत्त की सौवीं जयंती मनाई गई थी। उनकी फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग रखी गई, जिसे देखने के लिए बहुत से लोग आए और नई पीढ़ी को भी गुरु दत्त की फिल्में बड़े परदे पर देखने का अवसर मिला। मीडिया और सोशल मीडिया पर गुरु दत्त की खूब चर्चा हो रही थी। उसी दौरान मुझे जॉनी वॉकर द्वारा सुनाए गए दो किस्से याद आ गए। तो सोचा इस काॅलम में आप सबके साथ भी साझे करने चाहिए। हुआ यूं कि कागज के फूल, जो गुरु दत्त के दिल के बेहद करीब थी, के फ्लॉप होने के बाद वे गहरे डिप्रेशन में चले गए। उस समय जॉनी वॉकर, जो उनके बहुत नजदीकी दोस्त भी थे, डायरेक्टर एम. सादिक को लेकर गुरु दत्त के पास आए और बोले, “अभी आप आराम कीजिए और फिल्म प्रोड्यूस कीजिए। इनकी कहानी मैंने सुनी है, बहुत जबरदस्त है। मेरी गारंटी है कि ये सुपरहिट होगी। आप बस इनके डायरेक्शन में फिल्म बनाइए, शूटिंग पर आराम से आइए, एक्टिंग कीजिए और किसी तरह का स्ट्रेस मत लीजिए।”

गुरु दत्त ने दोस्त की बात मानकर फिल्म (चौदहवीं का चांद) शुरू कर दी। लेकिन जब फिल्म पूरी हुई और रिलीज का समय आया तो उसी समय मुगल-ए-आजम भी कम्प्लीट होकर रिलीज के लिए तैयार थी। डिस्ट्रीब्यूटर्स ने गुरु दत्त से कहा कि मुगल-ए-आजम और चौदहवीं का चांद, दोनों लगभग साथ-साथ रिलीज होंगी। दोनों ही मुस्लिम कहानियां हैं। मुगल-ए-आजम आसिफ ने बहुत बड़े पैमाने पर और भारी खर्चे से बनाई है, जबकि चौदहवीं का चांद लखनऊ के एक छोटे नवाब की कहानी है। ऊपर से आपकी पिछली फिल्म कागज के फूल फ्लॉप हो चुकी है तो चौदहवीं का चांद बेचना मुश्किल हो रहा है। यह सुनकर जॉनी वॉकर ने गुरु दत्त से कहा, “ये फिल्म तो आपने मेरे कहने पर बनाई है। तो मैं एक काम कर सकता हूं कि एक टेरिटरी खरीद लूं।” और सचमुच जॉनी वॉकर ने सी.आई. (सेंट्रल इंडिया) टेरिटरी खरीद ली।

खैर, मुगल-ए-आजम और चौदहवीं का चांद कुछ ही दिनों के फासले पर रिलीज हुईं। मुगल-ए-आजम तो ब्लॉकबस्टर हुई ही, लेकिन चौदहवीं का चांद भी उस साल की सबसे हिट फिल्मों में शुमार हो गई। जॉनी वॉकर का एम. सादिक पर भरोसा और गुरु दत्त का जॉनी वॉकर पर भरोसा, दोनों काम आ गया। इसी बात पर मुझे सदा अम्बालवी का एक शेर याद आता है: तुम सितारों के भरोसे पे न बैठे रहना अपनी तदबीर से तकदीर बनाते जाओ।

जॉनी वॉकर अंकल ने खुद मुझे बताया था कि सी.आई. टेरिटरी से उन्हें जो मुझे मिले थे, उनसे उन्होंने ओशिवारा लिंक रोड स्थित गोरेगांव में सात एकड़ जमीन खरीद ली थी। अब दूसरा किस्सा। जब गुरु दत्त ने प्यासा की कहानी फाइनल की तो एक दिन वे अपने राइटर अबरार अल्वी के साथ एक गार्डन में बैठे कहानी पर चर्चा कर रहे थे। उस समय उन्होंने कहा कि इस कहानी में जॉनी वॉकर का कोई किरदार दिखाई नहीं दे रहा है। तो अबरार अल्वी ने जवाब दिया कि एक शायर की इस गंभीर और संजीदा कहानी में उनके लायक रोल लिखना मुश्किल है। जॉनी वॉकर छोटा-मोटा रोल करेंगे नहीं और जिस भी फिल्म में वे होते हैं, दर्शकों को उनसे गाने की उम्मीद भी होती है। मेरे ख्याल से प्यासा में उनका किरदार फिट करना मुश्किल है। इतने में पीछे से अचानक एक आवाज आई- “मालिश! तेल मालिश! चम्पी!”

ये सुनते ही गुरु दत्त उत्साहित होकर बोले कि अबरार साहब, जॉनी वॉकर का किरदार मिल गया। आप एक मालिश वाले का किरदार लिखिए। फिर हम बैठकर सोचेंगे कि इसे कहानी में कैसे पिरोया जाए। और इस तरह प्यासा का मशहूर मालिशिया ‘गफूर’ का किरदार बना, जो जॉनी वॉकर का एक सुपरहिट और यादगार रोल साबित हुआ। गुरु दत्त की वजह से जॉनी वॉकर का यह किरदार हमेशा याद किया जाता है। वैसे गुरु दत्त चाहते थे कि प्यासा में हीरो की भूमिका दिलीप कुमार करें। लेकिन दिलीप कुमार ने मना कर दिया। इसका अफसोस गुरु दत्त को तो जीवनभर रहा ही, पर दिलीप कुमार को भी हमेशा रहा कि इतनी बेहतरीन फिल्म उनके हाथ से निकल गई। आज गुरु दत्त को याद करते हुए, उनकी प्यासा का यह अमर गीत सुनिए और अपना खयाल रखिए, खुश रहिए। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…



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