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जब से आशा जी गई हैं, कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब उनकी बात न हो या उनकी याद न आए। सोशल मीडिया, मीडिया, फिल्म इंडस्ट्री, दोस्त, घरवाले, हर कोई उन्हें याद कर रहा है। मुझे भी कई बातें याद आ रही हैं। कुछ तो मैंने पिछले हफ्ते के कॉलम में लिखी थीं। आज फिर सोचा कि उनकी कुछ और बातें, कुछ और यादें आपसे साझा करूं। लेकिन आज बात उनके गाने की नहीं। वह तो आप जिंदगी भर से सुनते आ रहे हैं और आगे भी सुनते रहेंगे। आज मैं बात उनके खाने की करूंगा। आशा जी को खाना बनाने और खिलाने का बहुत शौक था। बात 1996 की है। मेरी एक फिल्म बन रही थी ‘और प्यार हो गया’, जो ऐश्वर्या राय की पहली फिल्म थी। उसमें म्यूजिक डायरेक्टर थे नुसरत फतेह अली खान साहब। फेमस स्टूडियो में उस गाने की रिकॉर्डिंग होनी थी। आशा जी और उदित नारायण को गाना गाना था। चूंकि मुझे म्यूजिक का बहुत शौक रहा है, इसलिए मैं कोशिश करता था कि हर फिल्म की म्यूजिक सिटिंग में शामिल रहूं। पहले मैं जुहू में सनी साउंड गया। वहां उदित नारायण मेरी ही फिल्म ‘हीरो नंबर वन’ का गाना गा रहे थे। मैंने उनसे कहा कि आपको फेमस स्टूडियो में मेरी फिल्म का गाना भी गाना है। उन्होंने कहा कि यह खत्म करके वहां आते हैं। मैं फेमस स्टूडियो पहुंचा। वहां खान साहब, जावेद अख्तर साहब, राहुल रवैल जी सब मौजूद थे और उदित नारायण का इंतजार हो रहा था। आशा जी खान साहब के साथ बैठकर गाने की रिहर्सल कर रही थीं। इतनी सीनियर, इतनी मंझी हुई कलाकार होने के बावजूद वे पूरी शिद्दत से एक स्टूडेंट की तरह खान साहब को सुन रही थीं, सीख रही थीं। उन्हें रिहर्सल करते देख मैं खुद को बहुत खुशनसीब समझ रहा था। मन में यही विचार आ रहा था कि इतने बड़े मुकाम पर कोई यूं ही नहीं पहुंचता, वहां टिके रहने के लिए इतनी ही शिद्दत से काम करना पड़ता है।
फिर लंच का समय हुआ। आशा जी अपने घर से सबके लिए खाना लेकर आई थीं। हम सब जावेद साहब, खान साहब, खाने बैठे। खाना खाने के बाद खान साहब बोले, इतना अच्छा खाना मैंने बहुत कम घरों में खाया है, खासकर कबाब तो लाजवाब हैं। फिर उन्होंने मजाक में कहा कि इतने अच्छे कबाब तो मैंने पाकिस्तान में भी नहीं खाए। इस पर आशा जी मुस्कराकर बोलीं, यह हमारी हिंदुस्तानी ओरिजिनल रेसिपी है, पाकिस्तान में कैसे मिलेगी। सब हंस पड़े। फिर आशा जी ने बताया कि उन्होंने यह बड़ी मेहनत से सीखी है। उन्होंने बताया कि एक बार उनका बेटा किसी और के यहां कबाब खाकर आया और उसकी तारीफ करने लगा। उन्हें यह अच्छा नहीं लगा कि उनका बेटा किसी और के खाने की तारीफ करे। फिर वे मजरूह साहब की वाइफ के पास गईं, जो बहुत अच्छे कबाब बनाती थीं और उनसे यह रेसिपी सीखी। उसके बाद उन्होंने खुद कबाब बनाने शुरू किए। अपने बच्चों को अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाने की जो खूबी हिंदुस्तान की माताओं में होती है, वही खूबी आशा जी में भी थी। आशा जी ने एक और किस्सा सुनाया था। वे एक बार बनारस गई थीं। वहां गंगा दर्शन के लिए गईं। इसी दौरान उनके बेटे को भूख लगी। एक आदमी पूरी और आलू की सब्जी बेच रहा था। उन्होंने वह खरीदी और खाई। आलू इतने स्वादिष्ट लगे कि उन्होंने उस व्यक्ति से उसकी रेसिपी पूछी। उस व्यक्ति ने भी कहा कि वह रेसिपी बताने के भी पैसे लेगा। खैर, उन्होंने पैसे दिए और रेसिपी सीख ली। उनके हाथ के बनाए आलू भी इंडस्ट्री में काफी मशहूर रहे। इतने बड़े मुकाम पर पहुंचने के बाद भी आशा जी में जो सादगी थी, वह कमाल की थी। इसी बात पर मुझे जुनैद हज़ीं लारी का एक शेर याद आ रहा है :
वो सादगी में भी है अजब दिलकशी लिए इस वास्ते हम उस की तमन्ना में जी लिए। एक और किस्सा याद आता है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है। करीब डेढ़ साल पहले जावेद साहब का जन्मदिन था। हम उनके खंडाला वाले बंगले पर थे। आशा जी नहीं आ पाई थीं, लेकिन उन्होंने अपने मशहूर कबाब वहां भिजवाए। वे कबाब कुछ खास लोगों को परोसे गए, बाकी रख दिए गए। आशा जी के कबाब के लिए मैं अपनी जिंदगी में पहली बार इतना लालची हो गया। मैंने जावेद साहब और शबाना जी से कह दिया कि ये सारे कबाब मैं अपने साथ ले जा रहा हूं। मैं सचमुच सारे कबाब घर ले आया। घर पर भी मैंने अपनी पत्नी और बच्चों को सिर्फ एक-एक कबाब दिया, बाकी सारे कबाब मैंने खुद खाए। आज जब मैं यह लिख रहा हूं तो उन कबाब का स्वाद जैसे फिर से मुंह में आ गया है। जैसे उनके गानों का स्वाद जिंदगी भर मेरे जेहन में रहेगा, वैसे ही उनके बनाए खाने का स्वाद भी हमेशा बना रहेगा।
आज आशा जी की याद में आशा जी और उदित नारायण का फिल्म ‘और प्यार हो गया’ का वह गीत जरूर सुनिए, जो उन्होंने उस दिन फेमस स्टूडियो में गाया था: जागी हुई फिजाएं हैं तेरे लिए, तेरे लिए……
अपना ख्याल रखिए, खुश रहिए।
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