‘हिटलर’ बॉस; सहानुभूति में शून्य:  शोध में खुलासा- दूसरों के काम का भी लेते हैं क्रेडिट, मुनाफे के फेर में होता है गलत चयन
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‘हिटलर’ बॉस; सहानुभूति में शून्य: शोध में खुलासा- दूसरों के काम का भी लेते हैं क्रेडिट, मुनाफे के फेर में होता है गलत चयन

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एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के वरिष्ठ प्रबंधक का उत्कृष्ट प्रदर्शन, शानदार कम्युनिकेटर, कंपनी बोर्ड का पसंदीदा। लेकिन उसकी टीम में लगातार इस्तीफे, डर का माहौल और अनैतिक फैसलों की शिकायतें। वजह- ऑफिस में बात-बात पर चिल्लाना। दूसरों के काम का क्रेडिट खुद लेना। कर्मचारियों की मजबूरियों पर हंसना। ऐसा ‘हिटलर’ बॉस ‘सख्त’ नहीं, ‘साइकोपैथ’ हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया की बॉन्ड यूनिवर्सिटी और सैन डिएगो यूनिवर्सिटी के साझा शोध में कॉर्पोरेट जगत के उस अंधेरे सच को उजागर किया गया है, जिसे अब तक सिर्फ काम का दबाव मानकर नजरअंदाज किया जाता रहा है। ऑस्ट्रेलियन साइकोलॉजिकल सोसाइटी के सालाना सम्मेलन में पेश की गई शोध रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों के शीर्ष पदों (सीईओ और वरिष्ठ कार्यकारी) पर बैठे हर पांच में से एक अधिकारी (करीब 21%) में गंभीर साइकोपैथिक लक्षण पाए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अपराधियों से भरी जेलों में भी साइकोपैथ का अनुपात बिल्कुल यही (21%) है। विशेषज्ञों ने इन्हें ‘सक्सेसफुल साइकोपैथ’ या टॉक्सिक लीडर नाम दिया है। शोधकर्ता फॉरेंसिक साइकोलॉजिस्ट नाथन ब्रूक्स ने अपनी टीम के साथ मिलकर इस व्यवहार के पीछे की वजहों को डिकोड किया है। नाथन ने बताया कि ये लोग बेहद शातिर और आकर्षक होते हैं। लेकिन इनके पास मौजूद इन 4 हथियार से सतर्क रहने की जरूरत है:

दिखावटी आकर्षण – ऐसे लीडर्स पहली मुलाकात में बेहद मिलनसार व प्रभावशाली लगते हैं। अति-आत्मविश्वास – इस तरह के टॉक्सिक लीडर संकट के समय भी ऐसा दिखावा करते हैं जैसे सब कुछ इनके नियंत्रण में हो। शानदार सोशल स्किल्स – लोगों को अपनी बातों के जाल में फंसाने की कला में माहिर होते हैं। सहानुभूति का शून्य स्तर – दूसरों के दुख-दर्द या कर्मचारी के थकान से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन्हें अपने काम से मतलब रहता है। चिंता – कंपनियां प्रतिभा देखती हैं, चरित्र को नहीं परखतीं मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ये ‘टॉक्सिक लीडर’ शुरुआत में कंपनियों को बड़ा मुनाफा दिलाते हैं, जिससे बोर्ड रूम में इनकी वाहवाही होती है। लेकिन असलियत में ये सहकर्मियों का मानसिक शोषण करते हैं। अपने फायदे के लिए किसी को भी मोहरा बना सकते हैं। अंततः इससे पूरी संस्था की साख और वर्क कल्चर तबाह हो जाता है। ब्रूक्स का कहना है कि इस समस्या के लिए कंपनियों की दोषपूर्ण भर्ती प्रक्रिया जिम्मेदार है। इंटरव्यू के दौरान कंपनियां केवल उम्मीदवार की तकनीकी योग्यता, अनुभव और लक्ष्य हासिल करने की क्षमता देखती हैं, लेकिन उसके असली चरित्र को नहीं परखती हैं।



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