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दुनिया पहले कभी इतनी कनेक्टेड नहीं थी। हर जेब में इंटरनेट, हाथ में स्मार्टफोन और हर पल नोटिफिकेशन हैं। लेकिन इंसान की पड़ोस, समाज और रिश्तों से दूरी बढ़ रही है। इसी चिंता के बीच ब्रिटेन में सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रमुख लोगों ने ‘राष्ट्रीय संवाद परियोजना’ (नेशनल कन्वर्सेशन प्रोजेक्ट) शुरू की है। लोगोें से पूछा जा रहा है- जनता को कौन-सी चीजें जोड़ती हैं, कौन-सी बांटती हैं, पड़ोसियों से जुड़ाव कैसे बढ़े और कौन-सी चीज देश को ‘घर’ जैसा महसूस कराती है।
इसके लिए ‘सामुदायिक एकता और सामाजिक सौहार्द’ पर स्वतंत्र आयोग बना है। इसके अध्यक्ष पूर्व कंजरवेटिव चांसलर साजिद जाविद और लेबर पार्टी के पूर्व नीति प्रमुख जॉन क्रुडास हैं। क्रुडास कहते हैं, ‘ब्रिटेन के सामाजिक ताने-बाने और समुदाय की भावना को मजबूत करने की इतनी जरूरत पहले कभी महसूस नहीं हुई। ये कैसे संभव है, देश ही बताएगा।’ अगस्त तक चलने वाले सर्वे में लोग फॉर्म भरेंगे और 60 सेकंड के वॉइस नोट में बताएंगे कि भविष्य का ब्रिटेन कैसा हो। इस पहल के पीछे डर सिर्फ बढ़ते राजनीतिक मतभेद का नहीं, बल्कि समाज के भीतर बढ़ती दूरी का है। ब्रिटिश रेड क्रॉस के हालिया अध्ययन में 75% लोगों ने कहा कि ब्रिटेन बंटा हुआ देश है। 72% मानते हैं कि पिछले पांच साल में यह दूरी और बढ़ी। सामाजिक बिखराव का यह ट्रेंड अकेले ब्रिटेन में नहीं है।अमेरिका में भी पड़ोसियों के बीच बातचीत तेजी से घट रही है। अमेरिकी थिंक टैंक एईआई के मुताबिक, 2012 में 59% अमेरिकी हफ्ते में कई बार पड़ोसियों से बात करते थे। लेकिन, 2025 में यह आंकड़ा करीब 40% रह गया। युवाओं में स्थिति ज्यादा गंभीर है। 18 से 29 साल के आयुवर्ग में पड़ोसियों से नियमित बातचीत 51% से घटकर 25% रह गई। रिपोर्ट कहती है कि तकनीक ने लोगों को आत्मनिर्भर तो बनाया, लेकिन सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया। अब मनोरंजन, खरीदारी, पता पूछना, सलाह लेना- ये सब काम मोबाइल स्क्रीन पर ही होते हैं। लोगों को किसी के दरवाजे पर दस्तक देने की जरूरत ही नहीं पड़ती। एईआई के शोध निदेशक डेनियल कॉक्स कहते हैं, ‘घर अब मनोरंजन बंकर बनकर रह गए हैं।’ विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अकेलेपन और सामाजिक अलगाव को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट मानने लगा है। उसके मुताबिक, सामाजिक दूरी सिर्फ मानसिक तनाव नहीं, बल्कि दिल की बीमारी, अवसाद और असमय मृत्यु का जोखिम भी बढ़ाती है। दुनिया में हर पांचवां व्यक्ति अक्सर अकेलापन महसूस करता है। विशेषज्ञ इसे ‘साइलेंट सोशल क्राइसिस’ कहते हैं। पहले समाज परिवार, पड़ोस, धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों और स्थानीय समूहों से जुड़ा रहता था। अब एल्गोरिद्म पहचान और बातचीत तय कर रहा है। इससे डिजिटल समूह बन रहे हैं, जहां लोग सिर्फ अपने जैसों को सुनते हैं। ब्रिटेन की पहल इसलिए अहम है, क्योंकि वह पूछ रही है कि आधुनिक समाज में लोगों को फिर कैसे जोड़ा जाए। असल चुनौती अब तकनीक से नहीं, रिश्तों से जुड़े रहने की है। भारत में 69% युवाओं को बुढ़ापे में अकेले पड़ने का डर सता रहा भारत में परिवार अब भी पश्चिमी देशों की तुलना में मजबूत माने जाते हैं। लेकिन, शहरी जीवन, नौकरी के दबाव और मोबाइल-आधारित दिनचर्या से रिश्तों की प्रकृति बदल रही है। हेल्प एज इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 69% युवा और 68% बुजुर्ग बुढ़ापे में अकेले पड़ने से डरते हैं। ये संकट सिर्फ बुजुर्गों का नहीं रहा। सबसे ज्यादा अकेलापन युवाओं में दिख रहा है। वे ऑनलाइन सबसे ज्यादा जुड़े हैं, लेकिन वास्तविक सामाजिक रिश्ते सबसे कमजोर हो रहे हैं।
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