रसरंग में मायथोलॉजी:  विजयनगर ने आगे बढ़ाया था रामराज्य की स्थापना का विचार
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रसरंग में मायथोलॉजी: विजयनगर ने आगे बढ़ाया था रामराज्य की स्थापना का विचार

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देवदत्त पट्टनायक5 घंटे पहले

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हम्पी स्थित प्रसिद्ध विरुपक्षा मंदिर। - Dainik Bhaskar

हम्पी स्थित प्रसिद्ध विरुपक्षा मंदिर।

अगले दो लेखों के माध्यम से हम आधुनिक कर्नाटक राज्य के पिछली तीन सहस्राब्दियों के इतिहास के बारे में जानेंगे।

एक किंवदंती के अनुसार, लगभग 700 वर्ष पहले इस क्षेत्र में तुंगभद्रा नदी के तट पर हरिहर और बुक्का नामक भाइयों ने एक विचित्र दृश्य देखा: भेड़ियों द्वारा शिकार किए जा रहे खरगोश उलटा भेड़ियों पर वार कर रहे थे। वे समझ गए कि इस भूमि में विरोध करने की प्रवृत्ति है। इसलिए उन्होंने वहां विजयनगर नामक शहर बसाया। आगे चलकर इस शहर ने उत्तर भारत को वश में करने वाले ‘तुर्कु धर्म’ के दक्षिण में विस्तार का विरोध किया। उत्तरकालीन किंवदंतियों के अनुसार, हरिहर और बुक्का ने शृंगेरी मठ के प्रमुख विद्यारण्य से प्रेरित होकर विजयनगर की स्थापना की थी। कहा जाता है कि शृंगेरी मठ के संस्थापक आदि शंकराचार्य ने 1300 वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाया था कि हिंदू धर्म को चुनौती देने वाला धर्म भारत में आएगा।

आज हम्पी के पास स्थित विजयनगर के केवल खंडहर बचे हैं। विजयनगर 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच फला-फूला। इस शहर में विशाल चट्टानें बिखरी हुई हैं। कहा जाता है कि श्रीराम की वानर सेना ने रावण की लंका तक राम सेतु इन्हीं चट्टानों से बनाया था। इस क्षेत्र के पहाड़ किष्किंधा के वन से जुड़े हैं, जहां हनुमान, सुग्रीव और बाली निवास करते थे। इतिहासकार मानते हैं कि भारत के क्षेत्रों को रामायण से जोड़ना लगभग 1000 वर्ष पहले तमिल रामायण की रचना के बाद शुरू हुआ। इसलिए रामराज्य स्थापित करने के इच्छुक हरिहर और बुक्का ने विजयनगर की स्थापना कर इस विचार को पुष्ट किया था।

संभव है कि विजयनगर साम्राज्य को ही ‘कर्णाटक’ राज्य कहा गया हो और वह दक्खन तथा तमिल भाषी क्षेत्रों के बीच स्थित रहा हो। ध्यान रहे कि ‘कर्णाटक’ नाम आधुनिक भारत के कर्नाटक राज्य से अलग है। पहले ‘कर्णाटक’ शब्द पूरे दक्खन क्षेत्र के लिए प्रयुक्त होता था, जो पश्चिम में सह्याद्रि पर्वत और पूर्व में कोरोमंडल समुद्रतट तक फैला था। काली मिट्टी वाला यह क्षेत्र कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों और उनकी अनेक उपनदियों से सिंचित था। आधुनिक कर्नाटक राज्य के तीन क्षेत्र माने जाते हैं: तटीय क्षेत्र, जहां कदम्ब राजाओं का वर्चस्व था और जो अरब सागर से व्यापार करता था; उत्तर का सूखा व समतल क्षेत्र, जो पूर्व की ओर उतरता है और जहां भीमा व कृष्णा नदियां बहती हैं तथा जहां चालुक्य राजाओं का राज था; और दक्षिण का असमतल क्षेत्र मैसूर, जहां गंग राजवंश का प्रभुत्व था।

उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों के बीच तुंगभद्रा नदी बहती है। सम्राट अशोक का साम्राज्य इस नदी के उत्तर तक सीमित था। 2000 वर्ष पहले अशोक ने उत्तरी क्षेत्र में आदेशपत्र और बौद्ध स्तूप स्थापित किए, जबकि दक्षिणी क्षेत्र में जैन मठ उभरे। विजयनगर की स्थापना से पूर्व पहले राष्ट्रकूट और फिर होयसलों ने इस नदी के दोनों ओर के क्षेत्रों पर शासन किया। दिल्ली की सल्तनत ने भी केवल दक्खन के उत्तरी भाग पर नियंत्रण किया। 500 वर्ष पहले यानी विजयनगर काल में उत्तरी भाग पर बीदर, बेरार और बीजापुर के दक्खनी सुल्तानों का राज था, जो बहमनी सल्तनत से अलग हुए थे। स्वयं बहमनी सल्तनत दिल्ली सल्तनत से अलग हुई थी। स्पष्ट है कि आधुनिक कर्नाटक राज्य के उत्तरी और दक्षिणी भागों में संस्कृति अलग थी, क्योंकि वहां का भूगोल भिन्न होने के साथ-साथ वहां अलग-अलग राजवंशों का भी शासन रहा। संभव है कि लगभग 500 ईस्वी के आसपास दक्खन के अनेक समुदाय प्राचीन कन्नड़ भाषा बोलते रहे होंगे। लगभग 1000 ईस्वी तक इस क्षेत्र में और भाषाएं उभरीं: उत्तर में मराठी, जहां गोदावरी नदी बहती थी; गोदावरी और कृष्णा नदियों के संगम क्षेत्रों में तेलुगु; पश्चिमी समुद्रतट पर कोंकणी और दक्षिण में तुलु तथा मलयालम। शुरुआत में विजयनगर साम्राज्य में कन्नड़ प्रमुख भाषा थी। लेकिन जब कृष्णदेवराय ने ओडिशा के गजपति राजाओं को हराकर समृद्ध तेलुगु भाषी कृषक क्षेत्रों पर अधिकार किया, तब तेलुगु विजयनगर की प्रमुख भाषा बन गई। आज भी कन्नड़ और तेलुगु विद्वानों में इस बात पर मतभेद है कि विजयनगर साम्राज्य का श्रेय किस भाषा को दिया जाना चाहिए। संस्कृत भाषा वहां केवल कुलीन ब्राह्मण वर्ग द्वारा बोली जाती थी। वह प्रशासनिक भाषा न होते हुए भी धार्मिक अनुष्ठानों तथा राजाओं और विद्वानों द्वारा प्रयुक्त होती थी। अगले लेख में हम इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कर्नाटक राज्य के अन्य राजवंशों के बारे में जानेंगे।



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