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कभी आपने सोचा है कि शरीर की चर्बी (फैट) को भविष्य के लिए सहेज सकते हैं। सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन सौंदर्य जगत में यह आज की हकीकत बन चुकी है। कॉस्मेटिक सर्जन अब ‘फैट बैंकिंग’ के बढ़ते अनुरोधों का सामना कर रहे हैं, जहां मरीज भविष्य की सुंदरता के लिए बॉडी फैट का निवेश कर रहे हैं। न्यूयॉर्क की ‘न्यू लुक न्यू लाइफ’ की सीएमओ डॉ. क्लाउडिया किम कहती हैं, ‘फैट बैंकिंग ऐसी प्रक्रिया है जिसमें लिपोसक्शन के जरिए मरीज के शरीर से अतिरिक्त चर्बी निकाली जाती है। आमतौर पर यह चर्बी पेट, जांघों या कूल्हों से ली जाती है। इसे आधुनिक तकनीकों से फ्रीज (क्रायोप्रिजर्वेशन) करके स्टोर कर लिया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि भविष्य में जब भी मरीज को चेहरे की झुर्रियां भरने, गालों को उभारने या किसी अंग को सुडौल बनाने की जरूरत पड़े, तो उसे दोबारा दर्दनाक लिपोसक्शन से न गुजरना पड़े। उसके पास अपने ही ‘जीवित टिश्यू’ का भंडार मौजूद होता है। अमेरिकी डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. कैरिन ग्रॉसमैन कहती हैं, मरीज इस ओर इसलिए आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि वे सिंथेटिक फिलर्स या सिलिकॉन इंप्लांट्स के बजाय अपने ही शरीर के हिस्से का इस्तेमाल करना ज्यादा सुरक्षित व प्राकृतिक मानते हैं। वे कहती हैं,‘मरीजों को यह विचार पसंद आता है कि वे बाहरी तत्व के बजाय खुद की चर्बी इस्तेमाल कर रहे हैं। डॉ. किम कहती हैं,‘चर्बी ‘जीवित टिश्यू’ है, इसलिए इसे फ्रीज करना जोखिम भरा हो सकता है। यदि स्टोर की गई सेल्स मर जाती हैं, तो शरीर में गांठ, संक्रमण या टेढ़ापन जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। चुनौती यह है कि भविष्य में यह चर्बी शरीर के साथ सही से घुल-मिल पाएगी या नहीं। कई बार मरीजों को मनचाहा परिणाम नहीं मिल पाता। मृत व्यक्तियों का फैट ले रहे अमेरिका समेत कई देशों में अब मृत व्यक्तियों द्वारा दान की गई चर्बी का इस्तेमाल इंजेक्टेबल फिलर्स के रूप में किया जा रहा है। हालांकि, यह आपकी अपनी चर्बी की तरह काम नहीं करती। लंबे समय तक शरीर का हिस्सा नहीं बन पाती।डॉ. किम कहती हैं,‘यह ऐसी सुविधा तो है जो आपको बार-बार सर्जरी से बचा सकती है, पर इसके वैज्ञानिक आधार अभी भी विकसित हो रहे हैं। इसलिए सोच-विचार कर ही आगे बढ़ें।’ शुरुआती लागत 10 लाख, हर साल स्टोरेज फीस अलग से देनी होगी अमेरिकी फर्म हेल्थ कैपिटल के अनुसार फैट बैंकिंग के लिए हार्वेस्टिंग (लिपोसक्शन) से पेट या जांघ की वसा निकाली जाती है, फिर सेंट्रीफ्यूज मशीन से इसे शुद्ध किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण चरण क्रायोप्रिजर्वेशन का है। इसमें फैट को खास रसायनों के साथ माइनस 190° डिग्री में स्टोर किया जाता है। शुरुआती लागत 5 से 10 लाख रु. तक हो सकती है। वहीं सालाना स्टोरेज फीस 50 हजार से 1 लाख रु. के बीच है। दोबारा इंजेक्ट करवाने का खर्च 1.5 से 4 लाख रु. है। अमेरिका में बायो-बैंकिंग के कड़े नियमों और बीमा के कारण प्रोसेसिंग कॉस्ट बढ़ जाती है।
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