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क्रिकेटर सूर्यकुमार यादव टी-20 वर्ल्ड कप में अपने बेहतरीन फॉर्म को लेकर चर्चा में हैं… जब पहली बार मुंबई क्रिकेट टीम के ड्रेसिंग रूम में पहुंचा, तो जगह थी वानखेड़े स्टेडियम। मैं अंडर-22 से सीधे टीम में आया था और उस दिन थोड़ा लेट हो गया। जैसे ही अंदर गया तो देखा ड्रेसिंग रूम भरा हुआ है। चारों तरफ बड़े-बड़े नाम, अनुभवी खिलाड़ी… और मैं थोड़ा घबराया हुआ, थोड़ा उत्साहित। मन में बस एक सवाल था कि अब बैठूं कहां? मैं वॉर्मअप करने चला गया। जब नेट्स में बैटिंग की बारी आई, तो पैड पहनने के लिए जगह चाहिए थी। उसी वक्त मेरी नजर गई गणेश जी की मूर्ति के पास बैठे एक शख्स पर। वो सचिन तेंदुलकर थे। उन्होंने मुझे देखा और बहुत सहजता से कहा, यह कुर्सी ले लो, यहीं बैठ जाओ, जगह है। मैंने बस ‘ओके’ कहा और पैड पहनकर बैटिंग के लिए निकल गया। मैं इतना एक्साइटेड था कि कुछ और सोच ही नहीं पा रहा था। आज भी, जब मैं मुंबई के ड्रेसिंग रूम में जाता हूं, उसी जगह बैठता हूं। क्योंकि वो सिर्फ एक कुर्सी नहीं है, वो मेरी शुरुआत की एक खूबसूरत याद है।
लेकिन यह सफर हमेशा इतना आसान नहीं रहा। एक लंबा वक्त ऐसा भी आया, जब चयनकर्ताओं की तरफ से कोई संदेश नहीं था। न यह पता था कि मैं उनकी योजना में हूं, न यह कि बाहर हूं। बस एक लंबा, थकाने वाला इंतजार। उस दौर में खुद को हर दिन समझाना पड़ता था कि मेहनत करते रहो, मौका आएगा। लोग कहते मेहनत करो, सब ठीक होगा। हर साल कुछ नया करने की कोशिश करता था। कभी लगता, अगर यह करूं तो शायद बात बन जाए, अगर वह करूं तो शायद चयन हो जाए। 2017-18 के बाद, मैंने और मेरी पत्नी देविशा ने बैठकर तय किया कि अब सिर्फ मेहनत नहीं, समझदारी से मेहनत करनी होगी। बहुत काम कर लिया, अब कुछ अलग करना होगा। 2018 के बाद मैंने ऑफ-साइड पर ध्यान देना शुरू किया। डाइट पर कंट्रोल किया। ट्रेनिंग का तरीका बदला। धीरे-धीरे फर्क दिखने लगा। 2020 तक मेरा शरीर बदल चुका था। डेढ़ साल लगे समझने में कि मेरा शरीर कैसी ट्रेनिंग और डाइट स्वीकारता है। अब मुझे पता था क्या करना है, कितनी प्रैक्टिस करनी है, कैसे करनी है। इससे पहले भी प्रैक्टिस करता था, लेकिन क्वालिटी कम थी। 2018 के बाद क्वालिटी आई और हर फॉर्मेट में रन आने लगे। लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद आखिरकार वो दरवाजा टूटा, जिसका इंतजार था। सपने सच होते हैं, बस उन्हें वक्त दें और खुद पर यकीन रखें। दबाव में भी सही फैसले लिए जा सकते हैं
मैं यूट्यूब पर बेहतरीन टेस्ट इनिंग्स, शानदार वनडे पारियां और कमाल की टी20 बल्लेबाजी देखता रहता हूं। यह समझने की कोशिश करता रहता हूं कि उन हालात में बल्लेबाज ने क्या सोचा होगा, उसने क्या अलग किया होगा और मैं वहां क्या बेहतर कर सकता हूं। यह आदत 2010-11 में शुरू हुई, जब मैंने मुंबई के लिए डेब्यू किया था, और आज भी मेरे साथ है। मैं अपनी पारियां भी देखता हूं। खासकर तब, जब किसी मुश्किल स्थिति में कुछ अच्छा कर पाया। उसमें मुझे बहुत खुशी भी मिलती है और सीख भी। ये चीजें याद दिलाती हैं कि दबाव में भी सही फैसले लिए जा सकते हैं।
(तमाम इंटरव्यूज में…)
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